#राजस्थान_चुनाव_निकाय2026 कांग्रेस-BJP के जीत के दावे, फिर #बाड़ाबंदी क्यों? जानिए 10 बड़े कारण
संगरिया की आवाज़।
राजस्थान में नगर निकाय चुनाव के लिए मतदान पूरा हो चुका है और अब सभी की नजर नतीजों पर है। भाजपा और कांग्रेस दोनों अपने-अपने प्रदर्शन को लेकर जीत का दावा कर रही हैं। लेकिन इसी बीच कई जगह पार्षद प्रत्याशियों की बाड़ाबंदी ने चुनाव के बाद की राजनीति को चर्चा में ला दिया है।
#सवाल_सीधा_है- जब दोनों दलों को अपनी जीत का भरोसा है, तो फिर अपने पार्षदों को एक साथ रखने की जरूरत क्यों पड़ रही है? इसकी वजह सिर्फ चुनाव जीतना नहीं है। असली वजह नतीजों के बाद बनने वाला बोर्ड, बहुमत का आंकड़ा, निर्दलीय पार्षदों की भूमिका और मेयर या सभापति के चुनाव का राजनीतिक गणित है।
चुनाव खत्म, राजनीतिक मुकाबला अभी बाकी
निकाय चुनाव में मतदान के साथ जनता का काम पूरा हो जाता है। मतदाता अपना वोट डालकर लौट जाता है। EVM में फैसला दर्ज हो जाता है। इसके बाद राजनीतिक दलों का एक अलग दौर शुरू होता है। यही वजह है कि निकाय चुनाव विधानसभा या लोकसभा चुनाव से कुछ अलग दिखाई देता है। विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा सीट जीतने वाली पार्टी सीधे सरकार बनाने की स्थिति में आती है। नगर निकाय में मामला कई बार इतना सीधा नहीं होता।
किसी पार्टी को सबसे ज्यादा पार्षद मिल सकते हैं। फिर भी जरूरी नहीं कि वह आसानी से बोर्ड बना ले। अगर बहुमत से कुछ सीट कम रह गईं तो निर्दलीय और दूसरे राजनीतिक दलों के पार्षद महत्वपूर्ण हो जाते हैं। यहीं से बाड़ाबंदी का महत्व बढ़ जाता है।
भाजपा कांग्रेस के जीत के दावे
चुनाव के बाद दोनों प्रमुख दल अपने-अपने आंकड़ों के आधार पर जीत का दावा करते हैं। पार्टी कार्यकर्ताओं को भरोसा दिलाया जाता है कि जनता ने उनके पक्ष में मतदान किया है। लेकिन राजनीतिक संगठन सिर्फ अपने अनुमान पर निर्भर नहीं रहते।
कई वार्डों में मुकाबला बेहद करीबी हो सकता है। कुछ सीटों पर जीत और हार का अंतर बहुत कम हो सकता है। कुछ जगह निर्दलीय प्रत्याशी मजबूत स्थिति में हो सकते हैं। नतीजे आने के बाद यही छोटे अंतर पूरे नगर निकाय की सत्ता का समीकरण बदल सकते हैं। इसलिए बाड़ाबंदी को सिर्फ यह कहकर नहीं देखा जा सकता कि किसी पार्टी को अपनी जीत पर भरोसा नहीं है।
जानिए बाड़ाबंदी के 10 बड़े कारण
1. सबसे बड़ा कारण है बहुमत का आंकड़ा
किसी नगर निकाय में सबसे पहले सवाल होता है कि बोर्ड बनाने के लिए कितने पार्षद चाहिए। मान लीजिए किसी निकाय में 100 पार्षद हैं। बोर्ड बनाने के लिए 51 का समर्थन चाहिए। अगर BJP को 48 सीट मिलती हैं और Congress को 45 सीट, तो चुनाव में BJP आगे जरूर रहेगी। लेकिन बोर्ड बनाने के लिए उसे 3 और पार्षदों की जरूरत होगी।
अब ये 3 पार्षद कौन होंगे, यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है। यहीं से निर्दलीय पार्षदों की राजनीतिक कीमत बढ़ जाती है। यानी चुनाव में एक सीट सिर्फ एक वार्ड का परिणाम नहीं रह जाती। वह पूरे नगर निकाय की सत्ता का हिस्सा बन सकती है।
2. निर्दलीय पार्षद बदल सकते हैं पूरा खेल
निकाय चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार हमेशा महत्वपूर्ण रहे हैं। कई वार्डों में स्थानीय स्तर पर किसी निर्दलीय उम्मीदवार की अपनी मजबूत पकड़ होती है। कभी वह किसी पार्टी के बागी उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ता है। कभी स्थानीय समीकरणों के कारण उसे पार्टी प्रत्याशी से ज्यादा समर्थन मिल जाता है। नतीजे आने के बाद यही निर्दलीय पार्षद सत्ता के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
अगर BJP और Congress दोनों बहुमत से दूर रहती हैं तो निर्दलीय पार्षदों के समर्थन के बिना बोर्ड बनाना मुश्किल हो सकता है। ऐसी स्थिति में दोनों दल पहले से अपने पार्षदों को एकजुट रखने की कोशिश करते हैं। कारण साफ है- पहले अपने लोग सुरक्षित रखो, फिर दूसरे खेमे से बातचीत करो।
3. पार्षद सिर्फ पार्षद नहीं, बोर्ड का वोट बनता है
चुनाव के दौरान किसी पार्षद की लड़ाई अपने वार्ड तक सीमित होती है। लेकिन नतीजे के बाद उसका वोट पूरे नगर निकाय के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। मेयर, सभापति या अध्यक्ष के चुनाव में पार्षदों की संख्या निर्णायक होती है।
अगर किसी पार्टी के पास बहुमत है तो स्थिति आसान होती है। अगर बहुमत नहीं है तो हर पार्षद महत्वपूर्ण हो जाता है। ऐसे समय में एक-दो पार्षदों का राजनीतिक रुख भी परिणाम बदल सकता है। इसलिए चुनाव जीतने के बाद भी राजनीतिक दल पार्षदों को लेकर सतर्क रहते हैं।
4. असली नजर मेयर और सभापति की कुर्सी पर
नगर निकाय चुनाव का सबसे बड़ा राजनीतिक लक्ष्य केवल वार्ड जीतना नहीं होता। बड़ी लड़ाई बोर्ड के नेतृत्व की होती है। नगर निगम में मेयर की कुर्सी होती है। नगर परिषद में सभापति और नगर पालिका में अध्यक्ष का पद महत्वपूर्ण होता है। जिस पार्टी का बोर्ड बनता है, उसके पास इन पदों पर अपना उम्मीदवार बैठाने की संभावना बढ़ जाती है।
यही वजह है कि चुनाव परिणाम से पहले ही राजनीतिक दल आगे के समीकरण पर नजर रखने लगते हैं। किस पार्टी के पास कितने पार्षद होंगे?कितने निर्दलीय होंगे? कौन किसके करीब है? किस वार्ड में पार्टी के अंदर नाराजगी है? किस पार्षद का स्थानीय नेतृत्व से अच्छा संबंध है? इन सवालों के जवाब नतीजों के बाद बहुत महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
5. सिर्फ विपक्ष नहीं, अपनी पार्टी के अंदर भी खतरा !
निकाय चुनाव में पार्टी का टिकट मिलने के बाद भी सभी प्रत्याशी एक ही राजनीतिक पृष्ठभूमि से नहीं आते। कई लोग पहली बार चुनाव लड़ते हैं। कुछ पुराने स्थानीय नेता होते हैं। कुछ लंबे समय से पार्टी संगठन में सक्रिय होते हैं। कुछ टिकट नहीं मिलने पर निर्दलीय चुनाव लड़ते हैं।
नतीजे के बाद अगर पार्टी को बोर्ड बनाने के लिए ऐसे पार्षदों की जरूरत पड़ती है तो अंदरूनी समीकरण भी सामने आते हैं। इसीलिए बाड़ाबंदी का एक उद्देश्य अपने निर्वाचित पार्षदों को एक साथ रखना भी माना जाता है। यह केवल विपक्ष से बचने का मामला नहीं है। यह अपने खेमे में एकजुटता बनाए रखने की रणनीति भी है।
6. क्रॉस वोटिंग का डर
निकाय राजनीति में क्रॉस वोटिंग हमेशा चर्चा का विषय रहती है। मान लीजिए किसी पार्टी के पास पर्याप्त संख्या है। लेकिन उसके पार्षद अलग-अलग राजनीतिक समूहों या स्थानीय नेताओं के प्रभाव में हैं। ऐसी स्थिति में नेतृत्व को चिंता हो सकती है कि महत्वपूर्ण चुनाव के समय कोई पार्षद पार्टी के उम्मीदवार के खिलाफ वोट न कर दे।
बाड़ाबंदी इसी तरह की संभावित राजनीतिक स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश हो सकती है। हालांकि किसी भी खास पार्षद के बारे में बिना प्रमाण यह कहना सही नहीं होगा कि वह पार्टी बदलने वाला है या क्रॉस वोटिंग करेगा। लेकिन राजनीतिक दलों की रणनीति को समझने के लिए यह संभावना महत्वपूर्ण है।
7. नतीजे के बाद सामने आ सकती है टिकट की नाराजगी
निकाय चुनाव में टिकट वितरण सबसे कठिन चरणों में से एक होता है। एक वार्ड से पार्टी के कई दावेदार होते हैं। टिकट एक को मिलता है। बाकी दावेदारों में से कुछ प्रचार से दूरी बना सकते हैं। कुछ निर्दलीय चुनाव लड़ सकते हैं। कुछ पार्टी के साथ बने रहते हैं।
अगर ऐसे क्षेत्र से पार्टी प्रत्याशी जीत जाता है तो उसके बाद भी स्थानीय राजनीति में मतभेद खत्म हो जाएं, यह जरूरी नहीं है। और अगर बागी या निर्दलीय जीत जाता है तो उसकी भूमिका और बढ़ जाती है। इसलिए नतीजे के बाद पार्टी नेतृत्व को सिर्फ विपक्षी पार्षदों की चिंता नहीं होती। उसे अपने ही संगठन के भीतर के समीकरण भी संभालने पड़ते हैं।
8. बाड़ाबंदी का सवाल इसलिए भी बड़ा है क्योंकि खर्च होता है
बाड़ाबंदी सिर्फ एक राजनीतिक शब्द नहीं है। इसके साथ होटल या रिसॉर्ट में ठहरने, भोजन, यात्रा और अन्य व्यवस्थाओं का खर्च जुड़ सकता है। अगर बड़ी संख्या में पार्षदों को कई दिनों तक एक जगह रखा जाता है तो खर्च बढ़ना स्वाभाविक है। यहीं आम आदमी का सवाल आता है।
यह पैसा कौन खर्च कर रहा है? क्या पूरा खर्च पार्टी उठा रही है? क्या स्थानीय नेता व्यवस्था कर रहे हैं? क्या प्रत्याशी या उनके समर्थक योगदान दे रहे हैं? क्या इसका कोई आधिकारिक हिसाब रखा जा रहा है?
इन सवालों के जवाब सार्वजनिक चर्चा के लिए महत्वपूर्ण हैं। लेकिन केवल किसी होटल में पार्षदों के ठहरने से यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि उसमें अवैध पैसा लगा है। अगर खर्च में कोई अनियमितता है तो उसका प्रमाण और दस्तावेज जरूरी हैं।
9. पार्षद के पद की असली ताकत क्या है?
यह सवाल भी बाड़ाबंदी को समझने में मदद करता है। एक सामान्य पार्षद को मिलने वाला आधिकारिक मानदेय या भत्ता बहुत बड़ा नहीं होता। फिर भी निकाय चुनाव में पार्षद बनने के लिए भारी राजनीतिक मेहनत होती है। क्यों? क्योंकि पद का महत्व सिर्फ मानदेय से तय नहीं होता।
पार्षद अपने वार्ड का निर्वाचित प्रतिनिधि होता है। नगर निगम या नगर निकाय में सड़क, सफाई, नाली, स्ट्रीट लाइट, पार्क, कचरा प्रबंधन और स्थानीय विकास जैसे मुद्दों पर उसकी राजनीतिक भूमिका होती है।
उसकी स्थानीय प्रशासन तक पहुंच बढ़ती है। पार्टी संगठन में उसका कद बढ़ सकता है। आगे चलकर वह नगर निकाय के बड़े पदों के लिए दावेदार बन सकता है। इसलिए पार्षद की राजनीतिक कीमत उसके मासिक भत्ते से कहीं ज्यादा होती है।
10. 'नतीजे के बाद का इंतजार'
मतदान और नतीजे के बीच का समय राजनीतिक दलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है। पार्टी को अपने संभावित परिणामों का अनुमान होता है।स्थानीय नेताओं के पास बूथ और वार्ड स्तर की रिपोर्ट होती है। प्रत्याशियों से फीडबैक लिया जाता है।
कहां मुकाबला मजबूत है और कहां कमजोर, इसका आकलन किया जाता है। लेकिन जब तक आधिकारिक परिणाम नहीं आता, तब तक अंतिम तस्वीर साफ नहीं होती। इसी अनिश्चितता में राजनीतिक दल अपनी रणनीति बनाते हैं।
अगर पार्टी को लगता है कि उसका बहुमत आराम से आ सकता है तो भी वह अपने पार्षदों को सुरक्षित रखना चाहती है। अगर बहुमत का आंकड़ा संदिग्ध है तो बाड़ाबंदी की जरूरत और बढ़ जाती है।
क्या अपनी जीत पर भरोसा नहीं?
जरूरी नहीं। राजनीति में एक साथ दो बातें सच हो सकती हैं। पहली, पार्टी को अपनी जीत का भरोसा हो। दूसरी, पार्टी अपने पार्षदों को लेकर कोई जोखिम न लेना चाहे।
निकाय चुनाव में सीटों का अंतर कम होने की स्थिति में एक-दो पार्षद पूरे बोर्ड का समीकरण बदल सकते हैं। इसलिए बाड़ाबंदी को सीधे हार के डर से जोड़ना सही राजनीतिक विश्लेषण नहीं होगा।
क्या बाड़ाबंदी का संबंध पार्षदों की खरीद-फरोख्त से है?
यह सबसे संवेदनशील सवाल है। राजनीतिक दल अक्सर बाड़ाबंदी को अपने पार्षदों को सुरक्षित रखने की रणनीति बताते हैं। दूसरी तरफ विपक्ष इसे सत्ता के लिए पार्षदों को नियंत्रित करने की कोशिश बता सकता है।
लेकिन 'horse trading' या खरीद-फरोख्त का आरोप तभी तथ्य के रूप में लिखा जाना चाहिए जब उसके समर्थन में ठोस प्रमाण हों। किसी पार्षद को होटल में रखना और किसी पार्षद को पैसे देकर समर्थन हासिल करना दो अलग बातें हैं।
अगर बहुमत नहीं, तो असली Power Game शुरू
निकाय चुनाव में सबसे दिलचस्प स्थिति तब बनती है जब कोई भी पार्टी स्पष्ट बहुमत हासिल नहीं कर पाती। ऐसे में चुनाव का दूसरा चरण शुरू होता है। यह चरण जनता के बीच नहीं, बल्कि राजनीतिक कमरों में चलता है।
कौन किसके संपर्क में है? कौन किसे समर्थन दे सकता है? किस निर्दलीय की शर्तें क्या हैं? कौन सा स्थानीय नेता किस पार्षद के करीब है? किसे मेयर या सभापति पद का उम्मीदवार बनाया जा सकता है? किस पार्टी के पास संख्या ज्यादा है?
इन सवालों पर बातचीत शुरू हो सकती है।
यही वजह है कि मतदान खत्म होने के बावजूद निकाय चुनाव की राजनीतिक कहानी अभी खत्म नहीं हुई है।
संगरिया की आवाज़
District Collector & Magistrate - Hanumangarh