जीवन में आध्यात्मिक और बौद्धिक यात्रा की शुरुआत का प्रतीक है। इस संस्कार के माध्यम से बालक को गायत्री मंत्र की दीक्षा दी जाती है और उसे ‘द्विज’ यानी दूसरा जन्म प्राप्त करने वाला माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यज्ञोपवीत धारण करने के बाद बालक को वेद अध्ययन, यज्ञ कर्म और धार्मिक अनुष्ठानों का अधिकार मिल जाता है। यह संस्कार जीवन में महत्वपूर्ण है।