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सीजेआई के ‘एक साल’ के लक्ष्य के बीच जालौन में न्यायिक बहिष्कार पर सवाल पेंडेंसी घटाने की मुहिम में बार-बेंच की साझी जिम्मेदारी जरूरी, रिंकू राही के पत्र से गरमाई बहस #जालाौन #वायरल #कोंच #उरई #instagram #highlightseveryone #highlights #dmjalaun ,#disticcourt #highcourtallhabad #sachivbci #barcouncilofdelhi #barcouncilifindia #सच #देरी #समयनमिलान्याय #अन्यायकेसमान #बारकाउंसिल #बातसिर्फअधिवक्ताकेहितकी ? #वादकारीकेलिएकरेगाकोईन्याय ! उरई। देश की सर्वोच्च अदालत में लंबित मुकदमों के बोझ को कम करने के लिए जब मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के नेतृत्व में पुराने मामलों के त्वरित निस्तारण की रणनीति पर जोर दिया जा रहा है, उसी दौर में जालौन में न्यायिक कार्य के बहिष्कार को लेकर उठे विवाद ने बार और बेंच की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सीजेआई की पहल का मूल संदेश है कि मुकदमों की लंबित संख्या कम करना केवल न्यायाधीशों की जिम्मेदारी नहीं है। न्यायिक व्यवस्था से जुड़े प्रत्येक पक्ष—न्यायपालिका, अधिवक्ता, बार, जांच एजेंसियां और न्यायालयी स्टाफ—को अपनी भूमिका निभानी होगी। ऐसे में जालौन में न्यायिक कार्य से विरत रहने का मुद्दा महज स्थानीय बार राजनीति का विषय नहीं रह जाता। यह सीधे उस बड़े सवाल से जुड़ जाता है कि जब वादकारी वर्षों से न्याय की प्रतीक्षा कर रहा हो तो न्यायिक कार्य का बहिष्कार उसकी परेशानी को कितना बढ़ाता है? सवाल यह नहीं कि पेंडेंसी के लिए कौन जिम्मेदार, सवाल यह कि जिम्मेदारी कौन लेगा ? लेकिन बार भी न्यायिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में बार की ओर से होने वाले कार्य बहिष्कार, अनावश्यक स्थगन अथवा न्यायिक कार्य में व्यवधान की स्थिति में पेंडेंसी पर उसके प्रभाव को लेकर आत्ममंथन होना स्वाभाविक है। रिंकू राही के पत्र ने बहस को दिया नया आयाम संयुक्त मजिस्ट्रेट/एसडीएम (न्यायिक) रिंकू सिंह राही की ओर से बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश को भेजे गए पत्र में न्यायिक कार्य के बहिष्कार पर आपत्ति जताते हुए उच्च न्यायालय एवं बार काउंसिल के निर्देशों का हवाला दिया गया है। पत्र में वादकारियों के हित और न्यायिक कार्य की निरंतरता का मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया है। राही के रुख को व्यक्तिगत टकराव के बजाय यदि ‘वादकारी पहले’ की कसौटी पर देखा जाए तो बहस का स्वरूप ही बदल जाता है। न्यायालय आने वाला व्यक्ति न बार की राजनीति का हिस्सा है और न बार-बेंच के मतभेदों का। उसकी अपेक्षा केवल इतनी है कि उसकी सुनवाई हो और उसे लगातार तारीखों से राहत मिले। बार में बदलाव चाहिए तो एजेंडा भी स्पष्ट होना चाहिए जिसका वास्तविक अर्थ केवल वर्तमान नेतृत्व का विरोध नहीं हो सकता। अधिवक्ताओं के चैंबर, परिसर की व्यवस्थाएं, पार्किंग, यातायात, बैठने की सुविधा, प्रशासनिक समस्याएं और युवा अधिवक्ताओं के हित जैसे मुद्दे यदि सामने हैं तो उन्हें ठोस प्रस्ताव के साथ प्रशासन और संबंधित संस्थाओं के समक्ष रखना अधिक प्रभावी रास्ता हो सकता है। इसी संदर्भ में सक्रिय अधिवक्ता और बार की राजनीति में अपनी भूमिका रखने वाले संजीव तिवारी ‘सीटू’ के लिए भी यह समय आत्ममंथन का है। नेतृत्व को चुनौती देना लोकतांत्रिक अधिकार है, लोकप्रियता नहीं, काम की कसौटी पर तय हो नेतृत्व बार की राजनीति में सक्रिय रहने वाले प्रत्येक चेहरे के सामने अब यही परीक्षा है कि वह अधिवक्ताओं के वास्तविक मुद्दों पर कितना काम किया गया जिसका का लाभ पूरी बार को मिल सकता है। वहीं न्यायिक अधिकारियों की भी जिम्मेदारी है कि अधिवक्ताओं की वास्तविक कठिनाइयों को संवाद के माध्यम से सुना जाए । जहां प्रशासनिक एक साल का लक्ष्य, जालौन के लिए भी संदेश देश की सर्वोच्च अदालत लंबित मुकदमों के बोझ को कम करने के लिए समयबद्ध रणनीति पर आगे बढ़ रही है। ऐसे में स्थानीय न्याय व्यवस्था के सामने भी यही सवाल खड़ा है—क्या बार और बेंच मिलकर पेंडेंसी घटाने का अपना स्थानीय मॉडल तैयार करेंगे या मतभेद न्यायिक कार्य पर भारी पड़ते रहेंगे? बार की राजनीति अपनी जगह है, लोकतांत्रिक असहमति भी जरूरी है लेकिन इन सबके बीच वादकारी का न्याय पाने का अधिकार सबसे ऊपर होना चाहिए।

Orai, Jalaun | Aug 8, 2026

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छोटे भाई अबान का जनाज़ा अपने आंखों के सामने देख फूट फूट कर रो पड़े बाहुबली माफिया अतीक अहमद के तीनों वारिस अली, उमर और अज़हम...देखिए वीडियो

वीडियो में तीनों भाई एक साथ गले मिलते और रोते हुए नजर आ रहे हैं। इस दौरान, एक बच्चे को भी गोद में लेकर अली और उमर ने दुलार किया। ये सब तब हुआ जब उनके चारों ओर बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी तैनात थे।

छोटे भाई अबान का जनाज़ा अपने आंखों के सामने देख फूट फूट कर रो पड़े बाहुबली माफिया अतीक अहमद के तीनों वारिस अली, उमर और अज़हम...देखिए वीडियो वीडियो में तीनों भाई एक साथ गले मिलते और रोते हुए नजर आ रहे हैं। इस दौरान, एक बच्चे को भी गोद में लेकर अली और उमर ने दुलार किया। ये सब तब हुआ जब उनके चारों ओर बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी तैनात थे।

Orai, Jalaun | Aug 8, 2026

अतीक अहमद के तीनों बेटे अपने भाई अबान के जनाजे में हुए शामिल, तीनों भाई कब्रिस्तान में फूट फूट कर रोए

हजारों की संख्या में लोग हुए शामिल, सुरक्षा में पुलिस रही मुस्तैद

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अतीक अहमद के तीनों बेटे अपने भाई अबान के जनाजे में हुए शामिल, तीनों भाई कब्रिस्तान में फूट फूट कर रोए हजारों की संख्या में लोग हुए शामिल, सुरक्षा में पुलिस रही मुस्तैद #AtiqAhmed #AbanAhmed #UmarAhmed #AliAhmed #Prayagraj #PrayagrajNews #UttarPradesh #UPNews #BreakingNews #LatestNews #PoliceSecurity #NewsUpdate #BolDoBharat

Orai, Jalaun | Aug 8, 2026

श्मशान नहीं मिला तो सड़क किनारे जली चिता, बारिश के पानी में खड़े होकर निभानी पड़ी अंतिम रस्में

कोंच। किसी इंसान की जिंदगी का आखिरी पड़ाव भी अगर सम्मानजनक न हो, तो यह सिर्फ एक परिवार का दर्द नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर सवाल है। कोंच तहसील के नदीगांव ब्लॉक के गिदवासा गांव में शुक्रवार को ऐसा ही मंजर सामने आया, जिसने ग्रामीण व्यवस्था की हकीकत उजागर कर दी।

गांव की 63 वर्षीय रामश्री के निधन के बाद परिजनों के सामने अंतिम संस्कार के लिए जगह तक नहीं थी। गांव में श्मशान की व्यवस्था न होने के कारण मजबूर होकर परिजनों और ग्रामीणों को कोंच-रावतपुरा मार्ग के किनारे पानी से भरे स्थान पर ही अंतिम संस्कार करना पड़ा।

बारिश के बीच ग्रामीण पानी में खड़े होकर अंतिम संस्कार की रस्में निभाते रहे। एक ओर अपनों को खोने का गम था, तो दूसरी ओर व्यवस्था की बेरुखी का दर्द। जिस वक्त परिवार को सहारे और संवेदना की जरूरत थी, उस वक्त उन्हें श्मशान की जगह सड़क का किनारा तलाशना पड़ा। इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। हालांकि उरई दर्शन इस वायरल वीडियो की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

ग्रामीणों का आरोप है कि गांव में श्मशान की व्यवस्था को लेकर अधिकारियों से कई बार शिकायत की जा चुकी है, लेकिन समस्या का समाधान नहीं हुआ। श्मसान के न होने का मुख्य कारण क्षेत्र में चकबंदी न होना बताया जा रहा है। जिस कारण कुछ गांव श्मसान, खेल मैदान जैसी सुविधाओं से वंचित हैं।

आज एक वृद्धा की अंतिम यात्रा सड़क किनारे पूरी हुई है। कल फिर किसी परिवार को इसी पीड़ा से गुजरना पड़े, उससे पहले प्रशासन को जागना होगा। क्या किसी गांव को अपने मृतकों को अंतिम सम्मान देने के लिए भी सड़क किनारे जगह तलाशनी पड़ेगी?

गिदवासा की यह तस्वीर सिर्फ एक गांव की समस्या नहीं, बल्कि उन दावों पर भी सवाल है जिनमें गांवों में मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने की बात कही जाती है। अब जरूरत है कि प्रशासन मामले का संज्ञान लेकर स्थायी श्मशान स्थल की व्यवस्था करे, ताकि किसी परिवार को दोबारा ऐसी बेबसी न झेलनी पड़े।

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श्मशान नहीं मिला तो सड़क किनारे जली चिता, बारिश के पानी में खड़े होकर निभानी पड़ी अंतिम रस्में कोंच। किसी इंसान की जिंदगी का आखिरी पड़ाव भी अगर सम्मानजनक न हो, तो यह सिर्फ एक परिवार का दर्द नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर सवाल है। कोंच तहसील के नदीगांव ब्लॉक के गिदवासा गांव में शुक्रवार को ऐसा ही मंजर सामने आया, जिसने ग्रामीण व्यवस्था की हकीकत उजागर कर दी। गांव की 63 वर्षीय रामश्री के निधन के बाद परिजनों के सामने अंतिम संस्कार के लिए जगह तक नहीं थी। गांव में श्मशान की व्यवस्था न होने के कारण मजबूर होकर परिजनों और ग्रामीणों को कोंच-रावतपुरा मार्ग के किनारे पानी से भरे स्थान पर ही अंतिम संस्कार करना पड़ा। बारिश के बीच ग्रामीण पानी में खड़े होकर अंतिम संस्कार की रस्में निभाते रहे। एक ओर अपनों को खोने का गम था, तो दूसरी ओर व्यवस्था की बेरुखी का दर्द। जिस वक्त परिवार को सहारे और संवेदना की जरूरत थी, उस वक्त उन्हें श्मशान की जगह सड़क का किनारा तलाशना पड़ा। इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। हालांकि उरई दर्शन इस वायरल वीडियो की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। ग्रामीणों का आरोप है कि गांव में श्मशान की व्यवस्था को लेकर अधिकारियों से कई बार शिकायत की जा चुकी है, लेकिन समस्या का समाधान नहीं हुआ। श्मसान के न होने का मुख्य कारण क्षेत्र में चकबंदी न होना बताया जा रहा है। जिस कारण कुछ गांव श्मसान, खेल मैदान जैसी सुविधाओं से वंचित हैं। आज एक वृद्धा की अंतिम यात्रा सड़क किनारे पूरी हुई है। कल फिर किसी परिवार को इसी पीड़ा से गुजरना पड़े, उससे पहले प्रशासन को जागना होगा। क्या किसी गांव को अपने मृतकों को अंतिम सम्मान देने के लिए भी सड़क किनारे जगह तलाशनी पड़ेगी? गिदवासा की यह तस्वीर सिर्फ एक गांव की समस्या नहीं, बल्कि उन दावों पर भी सवाल है जिनमें गांवों में मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने की बात कही जाती है। अब जरूरत है कि प्रशासन मामले का संज्ञान लेकर स्थायी श्मशान स्थल की व्यवस्था करे, ताकि किसी परिवार को दोबारा ऐसी बेबसी न झेलनी पड़े। #orai #jalaun #konch #kalpi #madhaugadh

Orai, Jalaun | Aug 8, 2026

पिता अतीक की कब्र के बगल में सुपुर्द-ए-खाक अबान अहमद, कंधा देते ही फूट-फूट कर रो पड़े भाई उमर-अली-अहजम

6 अगस्त को प्रयागराज से झांसी जाते समय एक दर्दनाक सड़क हादसे में जान गंवाने वाले अतीक अहमद के पांचवें बेटे अबान को आज सुपुर्द-ए-खाक कर दिया गया है. भारी सुरक्षा के बीच उसे पिता अतीक अहमद की कब्र के ठीक बगल में दफनाया गया, जहां अपने छोटे भाई को खोने का दर्द उमर, अली और अहजम के चेहरों पर साफ नजर आया.

आपको बता दें कि प्रयागराज के कसारी-मसारी कब्रिस्तान में पहुंचे माफिया अतीक अहमद के दोनों बेटों, मोहम्मद उमर और अली अहमद को पुलिस की कड़ी सुरक्षा के बीच प्रिजन वैन से लाया गया था. इलाहाबाद हाईकोर्ट से सशर्त कस्टडी पैरोल मिलने के बाद दोनों भाई अपने छोटे भाई आबान के जनाजे में शामिल होने के लिए यहां लाए गए थे.  मोहम्मद उमर लखनऊ जेल में बंद है, जबकि अली अहमद झांसी जेल में बंद है. दोनों को इलाहाबाद हाईकोर्ट से कस्टडी पैरोल मिली थी. इसी के बाद दोनों अपने छोटे भाई के जनाजे में शामिल होने प्रयागराज पहुंचे.

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पिता अतीक की कब्र के बगल में सुपुर्द-ए-खाक अबान अहमद, कंधा देते ही फूट-फूट कर रो पड़े भाई उमर-अली-अहजम 6 अगस्त को प्रयागराज से झांसी जाते समय एक दर्दनाक सड़क हादसे में जान गंवाने वाले अतीक अहमद के पांचवें बेटे अबान को आज सुपुर्द-ए-खाक कर दिया गया है. भारी सुरक्षा के बीच उसे पिता अतीक अहमद की कब्र के ठीक बगल में दफनाया गया, जहां अपने छोटे भाई को खोने का दर्द उमर, अली और अहजम के चेहरों पर साफ नजर आया. आपको बता दें कि प्रयागराज के कसारी-मसारी कब्रिस्तान में पहुंचे माफिया अतीक अहमद के दोनों बेटों, मोहम्मद उमर और अली अहमद को पुलिस की कड़ी सुरक्षा के बीच प्रिजन वैन से लाया गया था. इलाहाबाद हाईकोर्ट से सशर्त कस्टडी पैरोल मिलने के बाद दोनों भाई अपने छोटे भाई आबान के जनाजे में शामिल होने के लिए यहां लाए गए थे. मोहम्मद उमर लखनऊ जेल में बंद है, जबकि अली अहमद झांसी जेल में बंद है. दोनों को इलाहाबाद हाईकोर्ट से कस्टडी पैरोल मिली थी. इसी के बाद दोनों अपने छोटे भाई के जनाजे में शामिल होने प्रयागराज पहुंचे. #atikahmad #PrayagrajNews #AtiqAhmad #abaanahmed #viral

Orai, Jalaun | Aug 8, 2026

थाना समाधान दिवस में डीएम की दो टूक—कागजों में नहीं, मौके पर दिखे शिकायतों का समाधान

जालौन में 69 फरियादियों ने रखीं समस्याएं, 27 मामलों का तत्काल निस्तारण; बाकी शिकायतों के लिए पुलिस-राजस्व की संयुक्त टीमें गठित

जालौन। थाना समाधान दिवस के दौरान फरियादियों की समस्याओं के निस्तारण को लेकर जिलाधिकारी राजेश कुमार पाण्डेय ने अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि शिकायतों का समाधान सिर्फ सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज करने तक सीमित न रहे, बल्कि उसका असर मौके पर भी दिखाई देना चाहिए। जालौन कोतवाली में आयोजित समाधान दिवस में डीएम और पुलिस अधीक्षक विनय कुमार सिंह ने लोगों की शिकायतें सुनीं और संबंधित अधिकारियों को समयबद्ध कार्रवाई के निर्देश दिए।

जनपद के सभी थानों में आयोजित समाधान दिवस के दौरान कुल 69 शिकायतें प्राप्त हुईं। इनमें से 27 मामलों का मौके पर ही निस्तारण कर दिया गया। जिन शिकायतों का तत्काल समाधान नहीं हो सका, उनके लिए पुलिस और राजस्व विभाग की संयुक्त टीमें गठित कर संबंधित स्थानों पर जांच और कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं।

जालौन कोतवाली में आईं पांच शिकायतें: जालौन कोतवाली में आयोजित समाधान दिवस में कुल पांच फरियादी अपनी समस्याएं लेकर पहुंचे। इनमें से तीन मामलों का अधिकारियों ने मौके पर ही समाधान करा दिया। यहां चकरोड, नाली निर्माण, जलभराव और बारिश से जुड़ी समस्याएं प्रमुख रूप से सामने आईं।

डीएम ने अधिकारियों को निर्देशित किया कि भूमि और राजस्व से जुड़े विवादों में केवल दोनों पक्षों की बात सुनना पर्याप्त नहीं है। संबंधित स्थल का निरीक्षण कर वास्तविक स्थिति का पता लगाया जाए और नियमानुसार निष्पक्ष निर्णय लिया जाए।

शिकायतकर्ता की संतुष्टि के बाद ही माना जाए निस्तारण: जिलाधिकारी ने अधिकारियों को खास तौर पर निर्देश दिया कि शिकायत के निस्तारण के बाद संबंधित फरियादी से फीडबैक भी लिया जाए। शिकायतकर्ता की समस्या वास्तव में दूर होने और उसकी संतुष्टि के बाद ही प्रकरण को निस्तारित माना जाए।

उन्होंने कहा कि विरासत, खतौनी में नाम की त्रुटि, हदबंदी और अन्य भूमि संबंधी मामलों में अनावश्यक देरी से आम लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। ऐसे मामलों को प्राथमिकता के आधार पर निर्धारित समय-सीमा में निस्तारित किया जाए।

लापरवाही पर होगी कार्रवाई: डीएम ने अधिकारियों को चेताया कि समाधान दिवस में आने वाली शिकायतों के निस्तारण में किसी भी स्तर पर लापरवाही या शिथिलता स्वीकार नहीं की जाएगी। निष्पक्ष निस्तारण हेतु पुलिस और राजस्व विभाग के अधिकारी आपसी समन्वय से कार्य करें।

थाना समाधान दिवस में डीएम की दो टूक—कागजों में नहीं, मौके पर दिखे शिकायतों का समाधान जालौन में 69 फरियादियों ने रखीं समस्याएं, 27 मामलों का तत्काल निस्तारण; बाकी शिकायतों के लिए पुलिस-राजस्व की संयुक्त टीमें गठित जालौन। थाना समाधान दिवस के दौरान फरियादियों की समस्याओं के निस्तारण को लेकर जिलाधिकारी राजेश कुमार पाण्डेय ने अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि शिकायतों का समाधान सिर्फ सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज करने तक सीमित न रहे, बल्कि उसका असर मौके पर भी दिखाई देना चाहिए। जालौन कोतवाली में आयोजित समाधान दिवस में डीएम और पुलिस अधीक्षक विनय कुमार सिंह ने लोगों की शिकायतें सुनीं और संबंधित अधिकारियों को समयबद्ध कार्रवाई के निर्देश दिए। जनपद के सभी थानों में आयोजित समाधान दिवस के दौरान कुल 69 शिकायतें प्राप्त हुईं। इनमें से 27 मामलों का मौके पर ही निस्तारण कर दिया गया। जिन शिकायतों का तत्काल समाधान नहीं हो सका, उनके लिए पुलिस और राजस्व विभाग की संयुक्त टीमें गठित कर संबंधित स्थानों पर जांच और कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं। जालौन कोतवाली में आईं पांच शिकायतें: जालौन कोतवाली में आयोजित समाधान दिवस में कुल पांच फरियादी अपनी समस्याएं लेकर पहुंचे। इनमें से तीन मामलों का अधिकारियों ने मौके पर ही समाधान करा दिया। यहां चकरोड, नाली निर्माण, जलभराव और बारिश से जुड़ी समस्याएं प्रमुख रूप से सामने आईं। डीएम ने अधिकारियों को निर्देशित किया कि भूमि और राजस्व से जुड़े विवादों में केवल दोनों पक्षों की बात सुनना पर्याप्त नहीं है। संबंधित स्थल का निरीक्षण कर वास्तविक स्थिति का पता लगाया जाए और नियमानुसार निष्पक्ष निर्णय लिया जाए। शिकायतकर्ता की संतुष्टि के बाद ही माना जाए निस्तारण: जिलाधिकारी ने अधिकारियों को खास तौर पर निर्देश दिया कि शिकायत के निस्तारण के बाद संबंधित फरियादी से फीडबैक भी लिया जाए। शिकायतकर्ता की समस्या वास्तव में दूर होने और उसकी संतुष्टि के बाद ही प्रकरण को निस्तारित माना जाए। उन्होंने कहा कि विरासत, खतौनी में नाम की त्रुटि, हदबंदी और अन्य भूमि संबंधी मामलों में अनावश्यक देरी से आम लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। ऐसे मामलों को प्राथमिकता के आधार पर निर्धारित समय-सीमा में निस्तारित किया जाए। लापरवाही पर होगी कार्रवाई: डीएम ने अधिकारियों को चेताया कि समाधान दिवस में आने वाली शिकायतों के निस्तारण में किसी भी स्तर पर लापरवाही या शिथिलता स्वीकार नहीं की जाएगी। निष्पक्ष निस्तारण हेतु पुलिस और राजस्व विभाग के अधिकारी आपसी समन्वय से कार्य करें।

Orai, Jalaun | Aug 8, 2026

सीजेआई के ‘एक साल’ के लक्ष्य के बीच जालौन में न्यायिक बहिष्कार पर सवाल पेंडेंसी घटाने की मुहिम में बार-बेंच की साझी जिम्मेदारी जरूरी, रिंकू राही के पत्र से गरमाई बहस #जालाौन #वायरल #कोंच #उरई #instagram #highlightseveryone #highlights #dmjalaun ,#disticcourt #highcourtallhabad #sachivbci #barcouncilofdelhi #barcouncilifindia #सच #देरी #समयनमिलान्याय #अन्यायकेसमान #बारकाउंसिल #बातसिर्फअधिवक्ताकेहितकी ? #वादकारीकेलिएकरेगाकोईन्याय ! उरई। देश की सर्वोच्च अदालत में लंबित मुकदमों के बोझ को कम करने के लिए जब मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के नेतृत्व में पुराने मामलों के त्वरित निस्तारण की रणनीति पर जोर दिया जा रहा है, उसी दौर में जालौन में न्यायिक कार्य के बहिष्कार को लेकर उठे विवाद ने बार और बेंच की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सीजेआई की पहल का मूल संदेश है कि मुकदमों की लंबित संख्या कम करना केवल न्यायाधीशों की जिम्मेदारी नहीं है। न्यायिक व्यवस्था से जुड़े प्रत्येक पक्ष—न्यायपालिका, अधिवक्ता, बार, जांच एजेंसियां और न्यायालयी स्टाफ—को अपनी भूमिका निभानी होगी। ऐसे में जालौन में न्यायिक कार्य से विरत रहने का मुद्दा महज स्थानीय बार राजनीति का विषय नहीं रह जाता। यह सीधे उस बड़े सवाल से जुड़ जाता है कि जब वादकारी वर्षों से न्याय की प्रतीक्षा कर रहा हो तो न्यायिक कार्य का बहिष्कार उसकी परेशानी को कितना बढ़ाता है? सवाल यह नहीं कि पेंडेंसी के लिए कौन जिम्मेदार, सवाल यह कि जिम्मेदारी कौन लेगा ? लेकिन बार भी न्यायिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में बार की ओर से होने वाले कार्य बहिष्कार, अनावश्यक स्थगन अथवा न्यायिक कार्य में व्यवधान की स्थिति में पेंडेंसी पर उसके प्रभाव को लेकर आत्ममंथन होना स्वाभाविक है। रिंकू राही के पत्र ने बहस को दिया नया आयाम संयुक्त मजिस्ट्रेट/एसडीएम (न्यायिक) रिंकू सिंह राही की ओर से बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश को भेजे गए पत्र में न्यायिक कार्य के बहिष्कार पर आपत्ति जताते हुए उच्च न्यायालय एवं बार काउंसिल के निर्देशों का हवाला दिया गया है। पत्र में वादकारियों के हित और न्यायिक कार्य की निरंतरता का मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया है। राही के रुख को व्यक्तिगत टकराव के बजाय यदि ‘वादकारी पहले’ की कसौटी पर देखा जाए तो बहस का स्वरूप ही बदल जाता है। न्यायालय आने वाला व्यक्ति न बार की राजनीति का हिस्सा है और न बार-बेंच के मतभेदों का। उसकी अपेक्षा केवल इतनी है कि उसकी सुनवाई हो और उसे लगातार तारीखों से राहत मिले। बार में बदलाव चाहिए तो एजेंडा भी स्पष्ट होना चाहिए जिसका वास्तविक अर्थ केवल वर्तमान नेतृत्व का विरोध नहीं हो सकता। अधिवक्ताओं के चैंबर, परिसर की व्यवस्थाएं, पार्किंग, यातायात, बैठने की सुविधा, प्रशासनिक समस्याएं और युवा अधिवक्ताओं के हित जैसे मुद्दे यदि सामने हैं तो उन्हें ठोस प्रस्ताव के साथ प्रशासन और संबंधित संस्थाओं के समक्ष रखना अधिक प्रभावी रास्ता हो सकता है। इसी संदर्भ में सक्रिय अधिवक्ता और बार की राजनीति में अपनी भूमिका रखने वाले संजीव तिवारी ‘सीटू’ के लिए भी यह समय आत्ममंथन का है। नेतृत्व को चुनौती देना लोकतांत्रिक अधिकार है, लोकप्रियता नहीं, काम की कसौटी पर तय हो नेतृत्व बार की राजनीति में सक्रिय रहने वाले प्रत्येक चेहरे के सामने अब यही परीक्षा है कि वह अधिवक्ताओं के वास्तविक मुद्दों पर कितना काम किया गया जिसका का लाभ पूरी बार को मिल सकता है। वहीं न्यायिक अधिकारियों की भी जिम्मेदारी है कि अधिवक्ताओं की वास्तविक कठिनाइयों को संवाद के माध्यम से सुना जाए । जहां प्रशासनिक एक साल का लक्ष्य, जालौन के लिए भी संदेश देश की सर्वोच्च अदालत लंबित मुकदमों के बोझ को कम करने के लिए समयबद्ध रणनीति पर आगे बढ़ रही है। ऐसे में स्थानीय न्याय व्यवस्था के सामने भी यही सवाल खड़ा है—क्या बार और बेंच मिलकर पेंडेंसी घटाने का अपना स्थानीय मॉडल तैयार करेंगे या मतभेद न्यायिक कार्य पर भारी पड़ते रहेंगे? बार की राजनीति अपनी जगह है, लोकतांत्रिक असहमति भी जरूरी है लेकिन इन सबके बीच वादकारी का न्याय पाने का अधिकार सबसे ऊपर होना चाहिए। - Orai News