सीजेआई के ‘एक साल’ के लक्ष्य के बीच जालौन में न्यायिक बहिष्कार पर सवाल
पेंडेंसी घटाने की मुहिम में बार-बेंच की साझी जिम्मेदारी जरूरी, रिंकू राही के पत्र से गरमाई बहस
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उरई। देश की सर्वोच्च अदालत में लंबित मुकदमों के बोझ को कम करने के लिए जब मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के नेतृत्व में पुराने मामलों के त्वरित निस्तारण की रणनीति पर जोर दिया जा रहा है, उसी दौर में जालौन में न्यायिक कार्य के बहिष्कार को लेकर उठे विवाद ने बार और बेंच की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सीजेआई की पहल का मूल संदेश है कि मुकदमों की लंबित संख्या कम करना केवल न्यायाधीशों की जिम्मेदारी नहीं है। न्यायिक व्यवस्था से जुड़े प्रत्येक पक्ष—न्यायपालिका, अधिवक्ता, बार, जांच एजेंसियां और न्यायालयी स्टाफ—को अपनी भूमिका निभानी होगी।
ऐसे में जालौन में न्यायिक कार्य से विरत रहने का मुद्दा महज स्थानीय बार राजनीति का विषय नहीं रह जाता। यह सीधे उस बड़े सवाल से जुड़ जाता है कि जब वादकारी वर्षों से न्याय की प्रतीक्षा कर रहा हो तो न्यायिक कार्य का बहिष्कार उसकी परेशानी को कितना बढ़ाता है?
सवाल यह नहीं कि पेंडेंसी के लिए कौन जिम्मेदार, सवाल यह कि जिम्मेदारी कौन लेगा ?
लेकिन बार भी न्यायिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में बार की ओर से होने वाले कार्य बहिष्कार, अनावश्यक स्थगन अथवा न्यायिक कार्य में व्यवधान की स्थिति में पेंडेंसी पर उसके प्रभाव को लेकर आत्ममंथन होना स्वाभाविक है।
रिंकू राही के पत्र ने बहस को दिया नया आयाम
संयुक्त मजिस्ट्रेट/एसडीएम (न्यायिक) रिंकू सिंह राही की ओर से बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश को भेजे गए पत्र में न्यायिक कार्य के बहिष्कार पर आपत्ति जताते हुए उच्च न्यायालय एवं बार काउंसिल के निर्देशों का हवाला दिया गया है। पत्र में वादकारियों के हित और न्यायिक कार्य की निरंतरता का मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया है।
राही के रुख को व्यक्तिगत टकराव के बजाय यदि ‘वादकारी पहले’ की कसौटी पर देखा जाए तो बहस का स्वरूप ही बदल जाता है। न्यायालय आने वाला व्यक्ति न बार की राजनीति का हिस्सा है और न बार-बेंच के मतभेदों का। उसकी अपेक्षा केवल इतनी है कि उसकी सुनवाई हो और उसे लगातार तारीखों से राहत मिले।
बार में बदलाव चाहिए तो एजेंडा भी स्पष्ट होना चाहिए
जिसका वास्तविक अर्थ केवल वर्तमान नेतृत्व का विरोध नहीं हो सकता। अधिवक्ताओं के चैंबर, परिसर की व्यवस्थाएं, पार्किंग, यातायात, बैठने की सुविधा, प्रशासनिक समस्याएं और युवा अधिवक्ताओं के हित जैसे मुद्दे यदि सामने हैं तो उन्हें ठोस प्रस्ताव के साथ प्रशासन और संबंधित संस्थाओं के समक्ष रखना अधिक प्रभावी रास्ता हो सकता है।
इसी संदर्भ में सक्रिय अधिवक्ता और बार की राजनीति में अपनी भूमिका रखने वाले संजीव तिवारी ‘सीटू’ के लिए भी यह समय आत्ममंथन का है। नेतृत्व को चुनौती देना लोकतांत्रिक अधिकार है,
लोकप्रियता नहीं, काम की कसौटी पर तय हो नेतृत्व
बार की राजनीति में सक्रिय रहने वाले प्रत्येक चेहरे के सामने अब यही परीक्षा है कि वह अधिवक्ताओं के वास्तविक मुद्दों पर कितना काम किया गया जिसका का लाभ पूरी बार को मिल सकता है।
वहीं न्यायिक अधिकारियों की भी जिम्मेदारी है कि अधिवक्ताओं की वास्तविक कठिनाइयों को संवाद के माध्यम से सुना जाए । जहां प्रशासनिक
एक साल का लक्ष्य, जालौन के लिए भी संदेश
देश की सर्वोच्च अदालत लंबित मुकदमों के बोझ को कम करने के लिए समयबद्ध रणनीति पर आगे बढ़ रही है। ऐसे में स्थानीय न्याय व्यवस्था के सामने भी यही सवाल खड़ा है—क्या बार और बेंच मिलकर पेंडेंसी घटाने का अपना स्थानीय मॉडल तैयार करेंगे या मतभेद न्यायिक कार्य पर भारी पड़ते रहेंगे?
बार की राजनीति अपनी जगह है, लोकतांत्रिक असहमति भी जरूरी है लेकिन इन सबके बीच वादकारी का न्याय पाने का अधिकार सबसे ऊपर होना चाहिए।
Orai, Jalaun | Aug 8, 2026