मौत का जाल बनी रायगढ़ की सड़कें!धृतराष्ट्र बना सिस्टम और बदहाल सड़कें,जनता के कब्र पर बांधा विकास का पुल #viral #viralvideo #cg #raigarh #ambikapur @pmoindia @bjp @amitshahofficial @chhattisgarhcmo @bjp4india
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*विशेष संपादकीय*
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*_मौत का जाल बनी रायगढ़ की_*
*_सड़के.............................?_*
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https://youtu.be/ufKU4cBWluc
https://www.instagram.com/reel/DcvxuMYtog0/?igsi=MXM2MGpmb3E4dTY1aA==
♦छत्तीसगढ़ की ऊर्जाधानी और औद्योगिक मानचित्र पर चमकता रायगढ़ आज एक विडंबना का जीवंत दस्तावेज बन चुका है। आकाश छूती चिमनियों से निकलता धुआं एवं आर्थिक समृद्धि के बड़े-बड़े दावे शहर की इस हकीकत के आगे बेमानी साबित हो रहे हैं जहां आम आदमी सुरक्षित दो कदम चलने के लिए भी मोहताज है। सवाल केवल डामर उखड़ने या कंक्रीट टूटने भर का नहीं है,उस संवेदनशील अंतरात्मा का भी है जो कागजी फाइलों के भारी बोझ तले दबकर दम तोड़ चुकी है जब शहर की सड़कें अपने ही लोगों के लिए मौत का खुला मैदान बन जाएं, तो उस तथाकथित विकास का अर्थ ही क्या रह जाता है, जो जनता को जीवन देने के बजाय असमय काल के गाल में धकेल रहा हो ? ढिमरापुर से कोतरा रोड व आवागमन की सभी मुख्य धमनियों तक में पसरा कीचड़ और गड्ढों का साम्राज्य चीख- चीख कह रहा है कि होने वाली दुर्घटनाएं महज एक हादसा नहीं बल्कि सरकारी मशीनरी की संवेदनहीनता और लापरवाही की सुनियोजित इबारतें हैं जो हर रोज किसी हंसते-खेलते परिवार को उजाड़ देती हैं जरा सोचिए उस विचलित करने वाले मंज़र को, जब स्कूटी का पहिया किसी अनदेखे गड्ढे या कीचड़ के दलदल में फिसलता है,ओर वाहन पर सवार व्यक्ति असंतुलित होकर सड़क पर गिरता है और चंद सेकंड के भीतर तेज रफ्तार ट्रक के पहिए उसके वजूद को कुचल कर सड़क को खून से लाल कर देते हैं ढिमरापुर रोड पर एक महिला और कोतरा रोड में एक अन्य नागरिक की वीभत्स मौतें केवल आंकड़े नहीं हैं, बल्कि यह समाज और व्यवस्था के माथे पर लगा ऐसा कलंक है,जो मानवीय जीवन के प्रति गिरती सरकारी सोच को दिखाती है कि मनुष्य का जीवन कितना सस्ता और बदतर हो चुका है ? जिसकी कोई कीमत नहीं है विडंबना यह है कि जब शहर इन खस्ताहाल पटरियों पर खून के आंसू रो रहा होता है, तब सत्ता के गलियारों में 'बजट स्वीकृति' का जश्न मनाया जाता है। हुक्मरानों का रवैया ऐसा है मानों राशि की घोषणा मात्र से गड्ढे खुद-ब-खुद भर जाते हों और कीचड़ रातों-रात मखमली रास्तों में तब्दील हो जाता हो। प्रशासनिक तंत्र की यह भूलने की बीमारी या जानबूझकर बरती जाने वाली टालमटोल प्रवृत्ति इस बात का प्रमाण है कि उन्हें आम आदमी के पसीने और खून की कोई कीमत नहीं है। टेंडर की लंबी फाइलें, दफ्तरों के चक्कर और कागजी घोड़े दौड़ने में प्रशासनिक औपचारिकताएं जब तक पूरी होंगी, तब तक न जाने कितने और घरों के चिराग बुझ चुके होंगे। यह कौन सा विकास मॉडल है जो निर्माण के नाम पर मौजूदा नागरिकों को मौत के मुहाने पर खड़े होने के लिए मजबूर कर देता है? हम कब तक इस आपराधिक उदासीनता को बर्दास्त एवं सहन करते रहेंगे सड़कों का निर्माण अपनी गति से चले, इस पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती, किंतु उस लंबी प्रक्रिया के बीच नागरिकों को भगवान भरोसे छोड़ देना कतई न्याय संगत नहीं होगा इसे स्वीकार्य नहीं किया जा सकता जरूरत इस बात की है कि जिला प्रशासन हकीकत को समझे और कागजी दावों से बाहर निकले, युद्ध स्तर पर तात्कालिक मरम्मत (पैच वर्क) और समतलीकरण का अभियान चलाए कीचड़ एवं जल भराव के इस अभिशाप से शहर को मुक्ति दिलाए। जब तक हुक्मरान जनता के दर्द को अपनी धड़कन नहीं बनाएंगे, तब तक रायगढ़ की सड़कें यूं ही खून से लाल होती रहेंगी अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि प्रशासन किसी और जनाक्रोश या बड़ी दुर्घटना के घटने का इंतजार करेगा या फिर कुशल सर्जन की तरह शहर की जर्जर धमनियों के गड्ढों से भरे कीचड़ को साफ कर उसका इलाज करेगा ? यह तो हिंदुस्तान है जहां कोई भी कुछ भी करता है ओर लोग उसको नोटिस नहीं करते सरकार की कोताही से यदि यही मौते अमेरिका या दूसरे देशों में हुई होती तो अब तक सरकार के खिलाफ कोर्ट में मुकदमा दायर हो चुका होता ओर सरकार को इंसानी जिंदगी की कीमत हजारों डालर के रुप में चुकानी पड़ती साथ में दोषी लोग जेल की हवा खा रहे होते लेकिन हमारे यहां ऐसा नहीं होता ? इसलिए हमारी संवेदनशीलता का बेज़ा फायदा उठाने की अनुमति भी किसी को नहीं दी जानी चाहिए बात सिर्फ रायगढ़ की नहीं है पूरे छत्तीसगढ़ में सड़को की हालत खराब है अंबिकापुर हो बलौदाबाजार हो बिलासपुर हो या धमतरी हो दुर्ग हो या राजनांदगांव कोरबा हो सभी जगह जर्जर सड़कों ने लोगो का जीना मुहाल कर दिया है हर कोई सड़को की बदतर हालत को लेकर परेशान है ओर सरकार को कोसने के साथ इस दुरावस्था पर अपने तरीकों से विरोध भी दर्ज करा रहे है कोई यमराज बन कर सड़क पर मौत का तांडव कर रहा है तो कोई गोविंदा का डांस कर सरकार को कोस रहा है कोई नरेंद्र मोदी और गडकरी की माला जप रहा है कोई अमरीका की जैसी सड़क बनाने का मखोल उड़ा रहा है लेकिन बेशर्मी की हद है कि इसके बाद भी सिस्टम धृतराष्ट्र बने शुतुरमुर्ग की तरह बहियाई से रेत में गर्दन गड़ाए हुए हैं सरकार व प्रशासन को उन एजेंसियों की जवाबदेही तय करनी होगी जो लाखों करोड़ों रुपए डकार कर घटीया सड़के बना लोगो की जान से खिलवाड़ कर रहे हैं इस अघोषित "मर्डर लाइंसेस" को अब बंद करने का वक्त आ गया है, सब्र की इंतहा हो चुकी है यदि यह फटा तो आने वाला जलजला शहर के अमन चैन व शांत फिजाओं को झकझोर कर रख देगा इसे रोकना है तो सरकार व प्रशासन को अभी से डेमेज कंट्रोल करना पड़ेगा वरना जो होगा उसके लिए सरकार व नौकरशाही ही जिम्मेदार मानी जाएगी ।
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*🔴वरिष्ठ पत्रकार रमेश अग्रवाल*
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