प्रेस नोट
प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी दिनांक 18/09/2026 से 20/09/2026 तक उदासीनाचार्य श्री श्रीचन्द्र शिला मंदिर, चौगान मोहल्ला, चम्बा में श्री श्रीचन्द्र भगवान उदासीन सम्प्रदाय के आचार्य भगवान श्री चन्द्र जयंती आयोजित की जाएगी।
इस अवसर पर देश-विदेश से संत-महंत एवं हजारों श्रद्धालु उपस्थित होंगे तथा भजन-कीर्तन, अखंड रामायण पाठ और भंडारे का आयोजन होगा, व मणिमहेश के यात्री भी इस कार्यक्रम में सम्मिलित होते हैं।
भगवान श्री चन्द्र जी क जन्म भाद्रपद शुदी 1551 ई. के सुल्तानपुर लोधी, जिला कपूरथला, पंजाब में हुआ था। आप श्री गुरू नानक देव जी माता सुलक्खनी के बड़े पुत्र थे। बाबा जी शिव अवतारी थे जन्म से उनके सिर पर सुनहरी जटांए, कान में मास का मुदंरा और तन पर भस्म थी। आप बचपन से ही कई 2 दिन समाधि में बैठे रहते और बाल लीलांए करते थे। आप ने संसार के दूर दूर स्थानों का भ्रमण किया। जनमानस को जागरूक किया। बाबा जी ने बारठ साहिब, पठानकोट में 62 वर्ष तपस्या की। वहां धार्मिक स्थान स्थापित है कहा जाता है।
पंजाब में टाहली साहिब, गुरदासपुर और नानक चक्क को भी अपनी चरण धूल अपर्ण की। जिन स्थानों पर बाबा जी ने समय बिताया, वहां-वहां धार्मिक स्थान स्थापित है। बाबा जी 150 वर्ष तक दर्शन देते रहे परन्तु उनका रूप 15 वर्षीय बालक का ही रहा, इस लिए इन्हें बालयति भी कहा जाता है। बारठ साहिब में तपस्या करने बाद भाई कमलीया के साथ ममून, पठानकोट से होते हुए 1643 पौष कृष्ण पंचमी को चम्बा पहुंचे। उस समय चम्बा में राजा पृथ्वी सिंह का राज्य था। राजा अपने गुरु को बहुत मानते थे। रावी के किनारे बाबा जी ने नाविक को कहा कि हमें रावी के पार उत्तार दो परन्तु नाविक ने मना कर दिया क्योंकि राजा का आदेश था। राजा की आज्ञा के बिना चम्बा में प्रवेश नहीं हो सकता था। तब बाबा जी पुल के पास पड़ी चट्टान पर बैठ गए और चट्टान को आज्ञा दी। हमें रावी पार करवाओ, चट्टान ने तैर कर बाबा जी का चम्बा पहुंचा दिया, फिर बाबा जी ने चट्टान पर उड़ते हुए पूरे शहर का भ्रमण किया यह कौतक देखकर चम्बावासी हैरान हो गए कि कैसे एक सन्त चट्टान उड़ा रहे है। बाबा जी ने पूरे चम्बा के तीन चक्कर लगाए। सतों की फरियाद सुनकर शिला को नीचे उत्तारा, चम्बा के राजा बाबा जी के चरणों में गिर पड़े और क्षमा मांगी तब बाबा जी की आयु 149 वर्ष थी।
बाबा जी ने राजा को कहा कि कुछ मांग लो राजा ने कहा कि कृप्या मुझे एक पुत्र का आर्शीवाद दें। बाबा जी ने कहा राजा, आपके एक नहीं दो पुत्र होंगे। कुछ समय पश्चात् राजा के दो पुत्र हुए। राजा ने अपनी जमीन बाबा जी के धूने के नाम कर दी। राजा ने बाबा का मन्दिर बनवाया। 5 मई 1998 को बाबा जी की सुन्दर मूर्ति स्थापित की गई। बाबा जी की यह अंतिम यात्रा थी। इस यात्रा के दौरान बाबा जी ने अपनी शिला, चिमटा, झोली, खड़ावों की देखभाल करने की आज्ञा राजा को दी जो आज भी इस मंदिर में सुशोभित हैं। संगत दूर दूर से दर्शानार्थ आती है। बाबा जी 150 वर्ष की आयु में भरमौर से आगे मणिमहेश की पहाड़ियों में गए। बाबा जी के साथ राजा और संगत भी गई, कुछ दूर जाकर बाबा जी ने राजा को कहा कि अब आप वापस जाओ, हमारी संसारिक यात्रा यहीं तक थी हम अभी मणिमहेश कैलाश पर्वत जा रहे है। बाबा की ने वचन किया कि जो प्राणी हमें श्रद्धा, प्रेम से याद करेंगे हम उन्हें दर्शन देंगे और सबकी मनोकामनाएं पूर्ण करेंगे। बाबा जी ने राजा को आर्शीवाद दिया और आलोप हो गए। भगवान श्री चन्द्र जी आज भी अपने वचन की पालना करते हुए हाज़िर नाजिर हो कर कल्याण करते है।
यहां चालिया (40 दिन आने से) करने से मनोकामना पूर्ण होती है।
देश विदेश से श्रद्धालु प्रकटोत्सव में भाग लेने हेतु आ रहे हैं। चम्बा की प्रबुद्ध जनता से निवेदन है कि 20 तारीख को भारी संख्या में आकर कृतार्थ करें।
श्रीचंद्रशिला मंदिर ट्रस्ट स्थानीय विधायक, प्रशासन व नगरपरिषद का उनके सहयोग हेतु आभार व्यक्त करता है। देश के चौथे स्तंभ प्रेस बंधुओं का उनके सहयोग हेतु आभार करते हैं।
Chamba, Chamba | Sep 3, 2026