बाप बनने की बीमारी और पत्रकारिता की असली औकात…!
बैतूल की पत्रकारिता में इन दिनों एक नया चलन देखने को मिल रहा है—कुछ लोग खबरों से नहीं, अपनी हैसियत के किस्से सुनाकर बड़ा बनने की कोशिश कर रहे हैं।
अधिकारियों के सामने दूसरे संस्थानों के पत्रकारों को छोटा बताना, अपने चैनल का नंबर गिनाना और कहना कि “हमारे सामने ये क्या हैं…” — भाई साहब, चैनल का आकार बड़ा होने से पत्रकार की सोच बड़ी नहीं हो जाती।
मजेदार बात तो यह है कि जिस छोटे पत्रकार को सामने बैठकर छोटा बताया जाता है, उसी की ग्राउंड जीरो से निकली खबर देखकर फोन अधिकारियों को लगाए जाते हैं।
यानी खबर किसी और की मेहनत की, फोन किसी और का, और फिर खुद को पत्रकारिता का बाप बताने का दावा! 😏
सच तो यह है कि पत्रकारिता में बाप वह नहीं होता जो दूसरों को बाप कहलवाने के लिए मजबूर करे।
बाप वह होता है जिसकी खबर देखकर अधिकारी कार्रवाई करें, जिसकी मेहनत से जनता की आवाज ऊपर तक पहुंचे और जिसके पास दिखाने के लिए काम हो, केवल नाम नहीं।
जिनकी अपनी खबरें सप्ताह में एक-दो बार बड़ी मुश्किल से दिखाई देती हैं, वे अगर रोज दूसरों की औकात नापने निकल पड़ें तो यह पत्रकारिता कम और कुंठा का सार्वजनिक प्रदर्शन ज्यादा लगता है।
और हां…
किसी संस्थान का नाम नहीं लिया गया है।
किसी व्यक्ति का नाम नहीं लिया गया है।
जिसे लगे कि बात उसी के लिए है, वह इसे संयोग समझे… या फिर आईना। 😉
हमने संस्कारों में यह नहीं सीखा कि अपनी जगह बनाने के लिए दूसरे की रोटी छीनी जाए।
प्रतिस्पर्धा खबरों से होनी चाहिए, पत्रकारों का पेट काटकर नहीं।
क्योंकि अंत में जनता सब देखती है—
कौन मैदान में मेहनत करता है,
कौन खबर उठाता है,
और कौन सिर्फ अपना कद दूसरों को छोटा करके बढ़ाता है।
पत्रकारिता में कोई किसी का बाप नहीं होता…
सिर्फ खबर बड़ी होती है और मेहनत उसका असली बाप होती है। 🔥
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