ओम प्रकाश राजभर जिस दर्द के साथ अपनी बात रख रहे हैं,वह यूपी की गठबंधन राजनीति की एक बड़ी सच्चाई को फिर सामने ला रहा है।उनका कहना है कि अखिलेश यादव ने उन्हें 16 सीटों की बात कही थी!
लेकिन उन सीटों में से 12 पर सपा ने अपने उम्मीदवार उतार दिए।
यही नहीं,चंद्रशेखर रावण को भी महज 2 सीटों के लिए नेशनल टीवी पर अपनी बात रखते हुए भावुक होना पड़ा था।
सवाल यह है कि आखिर अखिलेश यादव के साथ गठबंधन करने वाले छोटे दलों को बार-बार अपनी राजनीतिक हैसियत साबित क्यों करनी पड़ती है?
जयंत चौधरी हों,पल्लवी पटेल हों,स्वामी प्रसाद मौर्य हों या फिर ओम प्रकाश राजभर,गठबंधन की राजनीति में इन नेताओं के अनुभव और बाद में बने हालात कई सवाल खड़े करते हैं।
राजनीति में गठबंधन सिर्फ सीटों का समझौता नहीं,बल्कि सम्मान भरोसे और साझेदारी का नाम भी है।अगर बड़े दल अपने सहयोगियों को बराबरी का दर्जा नहीं देंगे,तो गठबंधन ज्यादा दिन टिकना मुश्किल है।
फिलहाल सपा और कांग्रेस के बीच भी सीटों को लेकर खींचतान की खबरें चर्चा में हैं।इस बार कांग्रेस भी अपने पुराने अंदाज में समझौता करने के मूड में नजर नहीं आ रही।
अखिलेश यादव के सामने चुनौती साफ है या तो सहयोगियों को सम्मान देकर साथ लेकर चलें,या फिर गठबंधन की राजनीति में अकेले पड़ने का जोखिम उठाएं।
क्योंकि राजनीति में ताकत सिर्फ बड़ी पार्टी होने से नहीं आती, सहयोगियों का भरोसा भी उतना ही जरूरी होता है।
सवाल सीधा है—क्या अखिलेश यादव गठबंधन को साझेदारी मानते हैं या अपनी शर्तों पर चलने वाला राजनीतिक समझौता?