हल्दीघाटी युद्ध की 450वीं वर्षगांठ पर समर्पित सिटी पैलेस में स्मृति प्रदर्शनी
उदयपुर, 18 जून।
मेवाड़ की गौरवशाली ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण में समर्पित महाराणा मेवाड़ चैरिटेबल फाउंडेशन द्वारा मेवाड़ तथा भारत के इतिहास की एक निर्णायक घटना ‘हल्दीघाटी युद्ध’ के 450वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में ‘‘450 वर्ष: हल्दीघाटी युद्ध‘‘ नामक प्रदर्शनी का शुभारंभ किया गया। इस विशेष प्रदर्शनी का उद्घाटन मेवाड़ राजपरिवार के 77वें श्री एकलिंग दीवान श्रीजी हुजूर डॉ. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़, अध्यक्ष एवं प्रबंध न्यासी, महाराणा मेवाड़ चैरिटेबल फाउंडेशन के करकमलों से हुआ।
फाउण्डेशन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. मयंक गुप्ता ने बताया कि प्रदर्शनी सिटी पैलेस संग्रहालय के छोटा दरीखाना में 18 जून 2026 से 28 अगस्त 2026 तक आमजन के लिए खुली रहेगी। फाउण्डेशन द्वारा प्रदर्शित प्रदर्शनी के माध्यम से ‘हल्दीघाटी युद्ध’ वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की अमर विरासत तथा मेवाड़ की अदम्य आत्मा को समर्पित है, जिसकी सम्मान, कर्तव्य, स्वाभिमान और स्वाधीनता के प्रति अटूट निष्ठा, आज भी विश्वभर की पीढ़ियों को प्रेरित करती है।
हल्दीघाटी: इतिहास, स्वाभिमान और संघर्ष का प्रतीक:
वर्ष 1576 ईस्वी में मेवाड़ के महाराणा प्रताप और आमेर के कुंवर मानसिंह के नेतृत्व वाली मुगल सेना के मध्य लड़ा गया हल्दीघाटी का युद्ध राजस्थान की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक चेतना का अभिन्न अंग रहा है। यह युद्ध सदियों से साहस, त्याग, स्वाभिमान, सम्मान और स्वाधीनता की रक्षा के प्रतीक के रूप में स्मरण किया जाता रहा है। लोक परंपराओं, साहित्य, लोककथाओं तथा कला के विविध माध्यमों ने इस स्मृति को जीवंत बनाए रखा है।
डॉ. गुप्ता ने बताया कि वर्ष 1576 से 2026 तक के 450 वर्षों की इस ऐतिहासिक यात्रा को चिह्नित करती यह प्रदर्शनी दो शताब्दियों से अधिक समय में विकसित हुई कलात्मक व्याख्याओं का एक अद्वितीय दृश्य-आख्यान प्रस्तुत करती है।
प्रदर्शनी में मेवाड़ दरबार के विख्यात चित्रकार चोखा द्वारा उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में महाराणा भीम सिंह (1778-1828 ई.) के शासनकाल में निर्मित हल्दीघाटी युद्ध विषयक पाँच दुर्लभ चित्रों को प्रदर्शित किया गया है। इनके साथ वर्ष 1935 में कलाकार चतुर्भुज द्वारा निर्मित एक विशाल कलाकृति तथा वर्ष 2026 में आर्टिस्ट राहुल माली द्वारा विशेष रूप से निर्मित नवीन चित्रकला भी प्रदर्शित की गई है।
ये सभी कलाकृतियाँ सामूहिक रूप से दर्शाती हैं कि किस प्रकार हल्दीघाटी की स्मृति को पीढ़ी-दर-पीढ़ी संरक्षित, पुनर्परिभाषित और पुनर्सृजित किया जाता