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ज्ञान बिंदु वाले रौशन आनंद सर की रिहाई को लेकर जनाक्रोश, हर प्रखंड में कैंडल मार्च कर रहे लोग. रौशन आनंद की रिहाई खान की गिरफ्तारी की मांग

Kahara, Saharsa | Jun 11, 2026

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घर लौटने के बाद भी सुरक्षित रहेंगे नवजात, एसएनसीयू में माताओं को मिल रही विशेष ट्रेनिंग
• एफपीसी केयर से नवजातों को मिल रही नई जिंदगी
• कंगारू मदर केयर और एफपीसी मॉडल से मजबूत हो रही नवजात स्वास्थ्य सेवा
• एसएनसीयू में भर्ती नवजातों की देखभाल में परिवार की बढ़ रही भागीदारी
छपरा। छपरा। समय से पहले जन्म लेने वाले, कम वजन वाले अथवा बीमार नवजात शिशुओं की बेहतर देखभाल के लिए सदर अस्पताल, छपरा के विशेष नवजात शिशु देखभाल इकाई (एसएनसीयू) में परिवार की सहभागितापूर्ण देखभाल (एफपीसी- फैमिली पार्टिसिपेटरी केयर) को प्रभावी ढंग से लागू किया जा रहा है। इस पहल के तहत एसएनसीयू में भर्ती नवजातों की माताओं और परिवार के सदस्यों को प्रशिक्षित कर शिशु की देखभाल में सक्रिय भागीदारी के लिए तैयार किया जा रहा है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि केवल अस्पताल में इलाज पर्याप्त नहीं है, बल्कि नवजात के घर पहुंचने के बाद भी उसकी देखभाल सही तरीके से हो, इसके लिए परिवार का प्रशिक्षित और जागरूक होना जरूरी है। इसी उद्देश्य से एफपीसी मॉडल के तहत माताओं को स्तनपान, कंगारू मदर केयर, संक्रमण से बचाव, तापमान की निगरानी और नवजात में खतरे के लक्षणों की पहचान संबंधी प्रशिक्षण दिया जाता है।
क्या है एफपीसी केयर?
एफपीसी यानी फैमिली पार्टिसिपेटरी केयर एक ऐसी प्रणाली है जिसमें एसएनसीयू में भर्ती नवजात शिशु की देखभाल में माता-पिता और परिवार के सदस्यों को भी सक्रिय रूप से शामिल किया जाता है। इस मॉडल का उद्देश्य परिवार को इतना सक्षम बनाना है कि अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद भी नवजात को गुणवत्तापूर्ण देखभाल मिलती रहे।
एफपीसी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा कंगारू मदर केयर (केएमसी) है। इसके तहत मां या परिवार का कोई सदस्य नवजात को अपनी छाती से सटाकर रखता है। इससे बच्चे को आवश्यक गर्माहट, सुरक्षा और भावनात्मक जुड़ाव मिलता है। यह प्रक्रिया विशेष रूप से कम वजन वाले और समय पूर्व जन्मे बच्चों के लिए बेहद लाभकारी मानी जाती है।
माताओं को सिखाई जाती हैं देखभाल की तकनीकें
एसएनसीयू में प्रशिक्षित नर्सें और चिकित्सक माताओं को सही तरीके से स्तनपान कराने, बच्चे को सुरक्षित तरीके से गोद में रखने, शरीर का तापमान मापने, हाथों की स्वच्छता बनाए रखने और संक्रमण से बचाव के उपायों की जानकारी देते हैं। साथ ही नवजात में किसी भी खतरे के संकेत की पहचान करने का प्रशिक्षण भी दिया जाता है।
मानसिक रूप से भी मजबूत होते हैं अभिभावक
एफपीसी मॉडल का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि इससे माता-पिता अपने बच्चे की बीमारी और उपचार प्रक्रिया को बेहतर ढंग से समझ पाते हैं। बच्चे के साथ अधिक समय बिताने से उनका आत्मविश्वास बढ़ता है और वे तनाव, चिंता तथा असहायता की भावना से काफी हद तक उबर जाते हैं।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ
डॉ. संदीप यादव, शिशु रोग विशेषज्ञ, सदर अस्पताल, छपरा ने कहा "एफपीसी मॉडल नवजात शिशुओं की देखभाल में एक महत्वपूर्ण बदलाव लेकर आया है। जब माता-पिता को अस्पताल में ही प्रशिक्षण मिल जाता है तो वे घर जाने के बाद भी बच्चे की बेहतर देखभाल कर पाते हैं। इससे संक्रमण का खतरा कम होता है, स्तनपान की दर बढ़ती है और नवजात के स्वस्थ विकास में मदद मिलती है।"
ज्योति आइजक, एसएनसीयू इंचार्ज ने बताया "हमारी टीम नियमित रूप से एसएनसीयू में भर्ती नवजातों की माताओं को एफपीसी के विभिन्न पहलुओं का प्रशिक्षण देती है। विशेष रूप से कंगारू मदर केयर, स्तनपान और संक्रमण से बचाव पर जोर दिया जाता है। इससे परिवार का आत्मविश्वास बढ़ता है और नवजातों की रिकवरी में सकारात्मक परिणाम देखने को मिल रहे हैं।"
शोध में भी साबित हुए हैं सकारात्मक परिणाम
भारतीय बाल रोग अकादमी (Indian Pediatrics) में प्रकाशित एक बहु-राज्यीय अध्ययन में पाया गया कि एफपीसी मॉडल अपनाने वाले एसएनसीयू में नवजातों की देखभाल की गुणवत्ता में सुधार हुआ और परिवारों की भागीदारी उल्लेखनीय रूप से बढ़ी। अध्ययन में यह भी सामने आया कि प्रशिक्षित माता-पिता घर लौटने के बाद बच्चों की बेहतर देखभाल कर सके।
वहीं BMC Pediatrics में प्रकाशित शोध के अनुसार फैमिली पार्टिसिपेटरी केयर मॉडल से स्तनपान की दर बढ़ती है, माता-पिता का तनाव कम होता है तथा नवजातों की रिकवरी प्रक्रिया में सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। शोधकर्ताओं ने इसे कम लागत वाला लेकिन अत्यधिक प्रभावी हस्तक्षेप बताया है।
विशेषज्ञों के अनुसार भारत जैसे देशों में, जहां हर वर्ष बड़ी संख्या में कम वजन और समय पूर्व जन्मे बच्चे पैदा होते हैं, वहां एफपीसी मॉडल नवजात मृत्यु दर कम करने और शिशुओं के समग्र स्वास्थ्य में सुधार लाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।
रिसर्च क्या कहती है?
• 38 एसएनसीयू पर हुए अध्ययन में 95% केंद्रों पर नियमित एफपीसी सत्र आयोजित हुए। 
• 97.3% माताओं ने एफपीसी प्रशिक्षण प्राप्त किया। 
• 93.3% माताएं विशेष स्तनपान करा रही थीं। 
• 93.2% परिवार कंगारू मदर केयर का पालन कर रहे थे। 
• 97% स्वास्थ्यकर्मियों ने माना कि एफपीसी से नवजात देखभाल की गुणवत्ता बेहतर हुई। 
• बिहार अध्ययन में एफपीसी को नवजातों के बेहतर जीवित रहने और देखभाल से जोड़ा गया।
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Bihar Health Department 
Information & Public Relations Department, Government of Bihar

घर लौटने के बाद भी सुरक्षित रहेंगे नवजात, एसएनसीयू में माताओं को मिल रही विशेष ट्रेनिंग • एफपीसी केयर से नवजातों को मिल रही नई जिंदगी • कंगारू मदर केयर और एफपीसी मॉडल से मजबूत हो रही नवजात स्वास्थ्य सेवा • एसएनसीयू में भर्ती नवजातों की देखभाल में परिवार की बढ़ रही भागीदारी छपरा। छपरा। समय से पहले जन्म लेने वाले, कम वजन वाले अथवा बीमार नवजात शिशुओं की बेहतर देखभाल के लिए सदर अस्पताल, छपरा के विशेष नवजात शिशु देखभाल इकाई (एसएनसीयू) में परिवार की सहभागितापूर्ण देखभाल (एफपीसी- फैमिली पार्टिसिपेटरी केयर) को प्रभावी ढंग से लागू किया जा रहा है। इस पहल के तहत एसएनसीयू में भर्ती नवजातों की माताओं और परिवार के सदस्यों को प्रशिक्षित कर शिशु की देखभाल में सक्रिय भागीदारी के लिए तैयार किया जा रहा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि केवल अस्पताल में इलाज पर्याप्त नहीं है, बल्कि नवजात के घर पहुंचने के बाद भी उसकी देखभाल सही तरीके से हो, इसके लिए परिवार का प्रशिक्षित और जागरूक होना जरूरी है। इसी उद्देश्य से एफपीसी मॉडल के तहत माताओं को स्तनपान, कंगारू मदर केयर, संक्रमण से बचाव, तापमान की निगरानी और नवजात में खतरे के लक्षणों की पहचान संबंधी प्रशिक्षण दिया जाता है। क्या है एफपीसी केयर? एफपीसी यानी फैमिली पार्टिसिपेटरी केयर एक ऐसी प्रणाली है जिसमें एसएनसीयू में भर्ती नवजात शिशु की देखभाल में माता-पिता और परिवार के सदस्यों को भी सक्रिय रूप से शामिल किया जाता है। इस मॉडल का उद्देश्य परिवार को इतना सक्षम बनाना है कि अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद भी नवजात को गुणवत्तापूर्ण देखभाल मिलती रहे। एफपीसी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा कंगारू मदर केयर (केएमसी) है। इसके तहत मां या परिवार का कोई सदस्य नवजात को अपनी छाती से सटाकर रखता है। इससे बच्चे को आवश्यक गर्माहट, सुरक्षा और भावनात्मक जुड़ाव मिलता है। यह प्रक्रिया विशेष रूप से कम वजन वाले और समय पूर्व जन्मे बच्चों के लिए बेहद लाभकारी मानी जाती है। माताओं को सिखाई जाती हैं देखभाल की तकनीकें एसएनसीयू में प्रशिक्षित नर्सें और चिकित्सक माताओं को सही तरीके से स्तनपान कराने, बच्चे को सुरक्षित तरीके से गोद में रखने, शरीर का तापमान मापने, हाथों की स्वच्छता बनाए रखने और संक्रमण से बचाव के उपायों की जानकारी देते हैं। साथ ही नवजात में किसी भी खतरे के संकेत की पहचान करने का प्रशिक्षण भी दिया जाता है। मानसिक रूप से भी मजबूत होते हैं अभिभावक एफपीसी मॉडल का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि इससे माता-पिता अपने बच्चे की बीमारी और उपचार प्रक्रिया को बेहतर ढंग से समझ पाते हैं। बच्चे के साथ अधिक समय बिताने से उनका आत्मविश्वास बढ़ता है और वे तनाव, चिंता तथा असहायता की भावना से काफी हद तक उबर जाते हैं। क्या कहते हैं विशेषज्ञ डॉ. संदीप यादव, शिशु रोग विशेषज्ञ, सदर अस्पताल, छपरा ने कहा "एफपीसी मॉडल नवजात शिशुओं की देखभाल में एक महत्वपूर्ण बदलाव लेकर आया है। जब माता-पिता को अस्पताल में ही प्रशिक्षण मिल जाता है तो वे घर जाने के बाद भी बच्चे की बेहतर देखभाल कर पाते हैं। इससे संक्रमण का खतरा कम होता है, स्तनपान की दर बढ़ती है और नवजात के स्वस्थ विकास में मदद मिलती है।" ज्योति आइजक, एसएनसीयू इंचार्ज ने बताया "हमारी टीम नियमित रूप से एसएनसीयू में भर्ती नवजातों की माताओं को एफपीसी के विभिन्न पहलुओं का प्रशिक्षण देती है। विशेष रूप से कंगारू मदर केयर, स्तनपान और संक्रमण से बचाव पर जोर दिया जाता है। इससे परिवार का आत्मविश्वास बढ़ता है और नवजातों की रिकवरी में सकारात्मक परिणाम देखने को मिल रहे हैं।" शोध में भी साबित हुए हैं सकारात्मक परिणाम भारतीय बाल रोग अकादमी (Indian Pediatrics) में प्रकाशित एक बहु-राज्यीय अध्ययन में पाया गया कि एफपीसी मॉडल अपनाने वाले एसएनसीयू में नवजातों की देखभाल की गुणवत्ता में सुधार हुआ और परिवारों की भागीदारी उल्लेखनीय रूप से बढ़ी। अध्ययन में यह भी सामने आया कि प्रशिक्षित माता-पिता घर लौटने के बाद बच्चों की बेहतर देखभाल कर सके। वहीं BMC Pediatrics में प्रकाशित शोध के अनुसार फैमिली पार्टिसिपेटरी केयर मॉडल से स्तनपान की दर बढ़ती है, माता-पिता का तनाव कम होता है तथा नवजातों की रिकवरी प्रक्रिया में सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। शोधकर्ताओं ने इसे कम लागत वाला लेकिन अत्यधिक प्रभावी हस्तक्षेप बताया है। विशेषज्ञों के अनुसार भारत जैसे देशों में, जहां हर वर्ष बड़ी संख्या में कम वजन और समय पूर्व जन्मे बच्चे पैदा होते हैं, वहां एफपीसी मॉडल नवजात मृत्यु दर कम करने और शिशुओं के समग्र स्वास्थ्य में सुधार लाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। रिसर्च क्या कहती है? • 38 एसएनसीयू पर हुए अध्ययन में 95% केंद्रों पर नियमित एफपीसी सत्र आयोजित हुए। • 97.3% माताओं ने एफपीसी प्रशिक्षण प्राप्त किया। • 93.3% माताएं विशेष स्तनपान करा रही थीं। • 93.2% परिवार कंगारू मदर केयर का पालन कर रहे थे। • 97% स्वास्थ्यकर्मियों ने माना कि एफपीसी से नवजात देखभाल की गुणवत्ता बेहतर हुई। • बिहार अध्ययन में एफपीसी को नवजातों के बेहतर जीवित रहने और देखभाल से जोड़ा गया। #NewbornCare #childcare #healthcare #SNCU #chapra #saran Bihar Health Department Information & Public Relations Department, Government of Bihar

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