15 साल की उम्र में थामा मिट्टी का हुनर, 41 साल बाद भी जारी है राम प्रसाद का सफर
खरसिया। उम्र 56 साल, लेकिन हाथों में आज भी वही हुनर और जुनून है, जो करीब 41 साल पहले एक किशोर के हाथों में था। सोडका निवासी राम प्रसाद डनसेना की कहानी मिट्टी से शुरू हुई और मिट्टी ही उनकी पहचान बन गई।
महज 15 साल की उम्र में, जब वे कक्षा 9वीं में पढ़ते थे, तब उन्होंने मिट्टी से मूर्तियां बनाना शुरू किया था। तब शायद उन्होंने भी नहीं सोचा होगा कि यही शौक एक दिन उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा हुनर बन जाएगा।
▪️चार दशक में बन गए क्षेत्र के जाने-माने मूर्तिकार
आज चार दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद राम प्रसाद क्षेत्र के जाने-पहचाने मूर्तिकार बन चुके हैं। वे भगवान गणेश, मां दुर्गा, भगवान विश्वकर्मा, मां शाकंभरी, मां काली और राधा-कृष्ण सहित विभिन्न देवी-देवताओं की प्रतिमाएं तैयार करते हैं।
उनके हाथों से बनी प्रतिमाएं खरसिया और आसपास के क्षेत्रों में आस्था का केंद्र हैं। उनकी कला की पहचान बनी हैं -
- डीबी पावर प्लांट में स्थापित भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा
- उल्दा झरिया में स्थापित राधा-कृष्ण की प्रतिमा
- बसनाझर की प्रसिद्ध काली पूजा में स्थापित मां काली की प्रतिमा
▪️मिट्टी से गढ़ते हैं वर्षों का अनुभव
राम प्रसाद के लिए मिट्टी सिर्फ एक सामग्री नहीं, बल्कि साधना है। मिट्टी को तैयार करने, उसका सही मिश्रण बनाने और धीरे-धीरे उसे मनचाहा आकार देने तक की हर प्रक्रिया में उनके वर्षों का अनुभव झलकता है।
खास बात यह है कि वे आज भी मुख्य रूप से मिट्टी की ही प्रतिमाएं बनाते हैं। यह न केवल पारंपरिक शिल्प को जीवित रख रहा है, बल्कि पर्यावरण के अनुकूल मूर्तिकला की परंपरा को भी आगे बढ़ा रहा है।
▪️बदलते दौर में भी कायम है परंपरा
आज जब मूर्ति निर्माण में आधुनिक तकनीक और पीओपी जैसी सामग्रियों का चलन बढ़ रहा है, ऐसे दौर में भी राम प्रसाद 41 साल से अपने पारंपरिक हुनर पर टिके हुए हैं।
15 साल की उम्र में शुरू हुआ यह सफर आज 56 साल की उम्र तक अनवरत जारी है। मिट्टी को आकार देते-देते उन्होंने न सिर्फ देवी-देवताओं की प्रतिमाएं बनाईं, बल्कि अपने गांव सोडका और पूरे खरसिया क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान भी गढ़ ली।