13 अक्टूबर 2024 की वह खौफनाक रात, जब सूरजपुर में ड्यूटी पर तैनात प्रधान आरक्षक की पत्नी और 11 साल की मासूम बेटी की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। इस जघन्य वारदात ने न सिर्फ पूरे छत्तीसगढ़ को दहला दिया, बल्कि कानून के इकबाल को खुली चुनौती दी थी। कोई चश्मदीद गवाह नहीं था, लेकिन अदालत ने मुख्य साजिशकर्ता कुलदीप साहू समेत तीन दोषियों को सीधे फांसी और एक को उम्रकैद की सजा सुनाई। सवाल यह है कि बिना किसी आई-विटनेस के पुलिस ने इस 'रेयरेस्ट ऑफ द रेयर' केस को अंजाम तक कैसे पहुंचाया?
इस पूरे मामले की असली ताकत बनी वैज्ञानिक विवेचना। तत्कालीन आईजी अंकित गर्ग के नेतृत्व और विवेचना अधिकारी विमलेश दुबे की सटीक रणनीति के तहत डीएनए प्रोफाइलिंग, दरवाजों से मिले फिंगरप्रिंट्स और सीसीटीवी-सीडीआर के तकनीकी साक्ष्यों का ऐसा अभेद्य जाल बुना गया कि कोर्ट में दरिंदों की सारी दलीलें धरी की धरी रह गईं। गवाहों को टूटने नहीं दिया गया और विशेष अभियोजक ने अदालत में हर सबूत को मजबूती से साबित किया। मीडिया के सामने अकड़ने वाले कातिलों की हेकड़ी कैसे कोर्ट के एक फैसले से हवा हो गई। देखिए इस ऐतिहासिक न्याय की पूरी इनसाइड स्टोरी!
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