संस्कृत भविष्य की सुधारक, भारत की शक्ति और विश्व बंधुत्व का आधार : सोडाणी
वसुधैव कुटुम्बकम् का भाव केवल संस्कृत से संभव : परमानंद शर्मा
संस्कृत भारत की जड़ है, इससे जुड़कर ही होगी उन्नति : प्रो. सारंगदेवोत
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उदयपुर, 7 जून। संस्कृत भारत की सांस्कृतिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक शक्ति का मूल स्रोत है। संस्कृत न केवल विश्व की प्राचीनतम एवं वैज्ञानिक भाषा है, बल्कि भविष्य की सुधारक भाषा भी है। संस्कृत से ही अच्छे नागरिकों का निर्माण, सांस्कृतिक मूल्यों का संरक्षण और राष्ट्र की उन्नति संभव है। यह विचार संस्कृत भारती उदयपुर विभाग द्वारा आयोजित छह दिवसीय आवासीय संस्कृत भाषा बोधन वर्ग के समारोप समारोह में मुख्य अतिथि राज्यपाल सलाहकार (उच्च शिक्षा) एवं पूर्व कुलपति प्रो. कैलाश सोडाणी ने व्यक्त किये।
संस्कृत भारती उदयपुर विभाग द्वारा आयोजित छह दिवसीय आवासीय संस्कृत भाषा बोधन वर्ग का समारोप समारोह रविवार को उत्साह, गरिमा एवं संस्कृतमय वातावरण में सम्पन्न हुआ। छह दिनों तक चले इस आवासीय वर्ग में संस्कृत संभाषण, योगाभ्यास, प्रातःस्मरण, विभक्ति-अभ्यास, भाषा-क्रीड़ा, संस्कृत गीत, श्लोक, चर्चा-सत्र, प्रतिभा प्रदर्शन एवं सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से प्रतिभागियों में संस्कृत के प्रति आत्मीयता और व्यवहारिक दक्षता विकसित की गई।
समारोह के मुख्य अतिथि राज्यपाल सलाहकार (उच्च शिक्षा) एवं पूर्व कुलपति प्रो. कैलाश सोडाणी ने कहा कि संस्कृत केवल अतीत की भाषा नहीं, बल्कि भविष्य की सुधारक भाषा है। भारत की वास्तविक शक्ति उसकी संस्कृति और संस्कृत भाषा में निहित है। उन्होंने विद्यार्थियों एवं युवाओं का आह्वान करते हुए कहा कि वे पढ़ने की आदत विकसित करें, क्योंकि अध्ययन ही ज्ञान और व्यक्तित्व विकास का आधार है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में मोबाइल के अत्यधिक उपयोग से दूरी बनाकर खेलकूद एवं रचनात्मक गतिविधियों को जीवन का हिस्सा बनाना चाहिए। संस्कृत और भारतीय संस्कृति के निकट रहने से व्यक्ति में स्वतः ही अच्छे नागरिक के गुण विकसित होते हैं। उन्होंने कहा कि संस्कृत का अध्ययन आज के समय का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है, क्योंकि यही भारत की शक्ति, पहचान और सांस्कृतिक आत्मा है।
प्रो. सोडाणी ने संस्कृत को विश्व की प्राचीनतम एवं वैज्ञानिक भाषा बताते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा, दर्शन, साहित्य, गणित, आयुर्वेद और विज्ञान का विशाल भंडार संस्कृत में सुरक्षित है। संस्कृत भारती द्वारा जनसामान्य को संस्कृत संभाषण से जोड़ने का अभियान भारतीय संस्कृति के पुनर्जागरण का प्रभावी माध्यम बन रहा है। उन्होंने वर्ग की अनुशासित व्यवस्था, शिक्षण पद्धति एवं संस्कृतमय वातावरण की सराहना करते हुए इसे समाज के लिए प्रेरणादायी पहल बताया।
मुख्य वक्ता परमानंद शर्मा ने कहा कि ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का सार्वभौमिक भाव संस्कृत भाषा और भारतीय चिंतन की ही देन है। संस्कृत केवल संवाद की भाषा नहीं, बल्कि विश्व बंधुत्व और मानवता की भाषा है। उन्होंने बताया कि संस्कृत भारती के प्रयासों से आज देशभर में छह हजार से अधिक संस्कृत परिवार सक्रिय रूप से संस्कृत का व्यवहार कर रहे हैं तथा एक करोड़ से अधिक लोग संस्कृत संभाषण करने लगे हैं। यह संस्कृत के पुनर्जागरण का जीवंत प्रमाण है।
उन्होंने कहा कि संस्कृत को केवल पूजा-पाठ तक सीमित समझना एक बड़ी भ्रांति है। संस्कृत भारती के संभाषण वर्गों ने सिद्ध कर दिया है कि संस्कृत सहज, सरल और व्यवहार की भाषा बन सकती है। उन्होंने प्रतिभागियों का आह्वान किया कि वे संस्कृत को अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाएं तथा परिवार एवं समाज में संस्कृत संभाषण का वातावरण निर्मित करें।
समारोह की अध्यक्षता करते हुए जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ के कुलपति प्रो. (मानद) कर्नल शिवसिंह सारंगदेवोत ने कहा कि संस्कृत ज्ञान का अथाह खजाना है। भारतीय दर्शन, साहित्य, विज्ञान, चिकित्सा, गणित और संस्कृति का विशाल वैभव संस्कृत में सुरक्षित है। उन्होंने कहा कि संस्कृत भारतोपीय भाषा परिवार की जननी है और अनेक आधुनिक भाषाओं की आधारशिला भी है।
उन्होंने कहा कि आज विश्व की प्रतिष्ठित संस्थाएं भी संस्कृत के महत्व को स्वीकार कर रही हैं। नासा जैसे संस्थान भी संस्कृत को भावी ज्ञान पद्धति के लिए महत्वपूर्ण भाषा मानने लगे हैं। उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इतनी आधारभूत एवं समृद्ध भाषा होने के बावजूद संस्कृत बोलने वालों का अनुपात अभी भी अपेक्षाकृत कम है, जिसे बढ़ाना समय की आवश्यकता है। यदि संस्कृत का व्यवहार बढ़ेगा तो भारत की उन्नति भी कई गुना बढ़ेगी।
प्रो. सारंगदेवोत ने कहा कि नेपाल सहित कई देशों में आज भी संस्कृत की सशक्त उपस्थिति है। जो समाज और राष्ट्र अपनी जड़ों से दूर हो जाते हैं, वे अंततः खोखले हो जाते हैं। संस्कृत भारत की जड़ है और इससे जुड़े रहना राष्ट्र की निरंतर उन्नति के लिए आवश्यक है। उन्होंने संस्कृत भारती के इस प्रयास को राष्ट्र निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान बताया।
समारोह से पूर्व अतिथियों ने वर्ग का अवलोकन कर विभिन्न सत्रों, संस्कृत संभाषण अभ्यास, योग, भाषा-क्रीड़ा, प्रतिभा प्रदर्शन तथा शिक्षण पद्धति का निरीक्षण किया। अतिथियों ने वर्ग की व्यवस्थाओं, अनुशासन एवं संस्कृतमय वातावरण की मुक्तकंठ से प्रशंसा की।
इस अवसर पर अंतिम दिन वर्ग अवलोकन के लिए आपदा राहत विभाग के भाजपा प्रदेश संयोजक एवं राजस्थान गौरव सम्मान प्राप्त डॉ. जिनेन्द्र शास्त्री, भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष श्रीमती अलका मूंदड़ा, प्रतापनगर थानाधिकारी पूरणसिंह राजपुरोहित, आलोक विद्यालय हिरणमगरी सेक्टर-11 के प्राचार्य शशांक टांक, गहरीलाल पाटीदार, संस्कृत शिक्षा विभाग राजस्थान सरकार के विशेष अधिकारी अभयसिंह राठौड़ तथा कनक डायनिंग हॉल के रमेश श्रीमाली सहित अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। सभी अतिथियों ने संस्कृत भारती के इस अभिनव प्रयास की सराहना करते हुए इसे समाजोपयोगी और प्रेरणादायी पहल बताया।
वर्गार्थियों महिमा शर्मा एवं झरनेश पालीवाल ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि मात्र छह दिनों के अल्पकाल में ही वे संस्कृत बोलने, समझने और व्यवहार में प्रयोग करने में सक्षम हुए हैं। अनुभव कथन एवं प्रतिभा प्रदर्शन ने उपस्थित जनसमूह को विशेष रूप से प्रभावित किया।
समारोप कार्यक्रम का शुभारंभ विशाल द्वारा प्रस्तुत वैदिक मंगलाचरण से हुआ। दिव्यांशु ने ध्येय मंत्र एवं सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। प्रांत संपर्क प्रमुख डॉ. यज्ञ आमेटा ने अतिथियों का परिचय एवं स्वागत कराया। लारा उपाध्याय ने सामूहिक गीत प्रस्तुत किया। वर्ग संयोजक संजय शांडिल्य ने वर्ग प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। दिव्यांशु जोशी एवं ध्रुव पालीवाल ने अनुभव कथन प्रस्तुत किए, जबकि मुकेश कुमावत ने व्यक्तिगत गीत की प्रस्तुति दी।
दुष्यंत नागदा ने अतिथियों, विद्याभारती संस्था के पदाधिकारियों, मीडिया प्रतिनिधियों, शिक्षकों, प्रबंधकों एवं सहयोगकर्ताओं के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम का समापन गौरव साहू द्वारा कल्याण मंत्र एवं वैदिक मंगलकामनाओं के साथ हुआ। इस अवसर पर सम्पूर्ण परिसर संस्कृत वंदना, गीतों एवं जयघोषों से गुंजायमान रहा।
वर्ग में मुख्य शिक्षक के रूप में श्रीयांश कंसारा तथा सह-शिक्षक के रूप में गौरव साहू, दिव्यांशु, मेहरान, विशाल शर्मा, लक्ष्मण, आंचल चौधरी, लारा उपाध्याय, ईशा पालीवाल एवं दिव्यांशी पालीवाल ने दायित्व निभाया। वर्ग संचालन एवं व्यवस्थाओं में डॉ. यज्ञ आमेटा, दुष्यंत नागदा, नरेंद्र शर्मा, चैन शंकर दशोरा, डॉ. रेनू पालीवाल, कुलदीप जोशी, मीनाक्षी द्विवेदी, केशव नागदा, पहल सहित अनेक कार्यकर्ताओं ने सक्रिय योगदान दिया।
समापन अवसर पर विभाग संयोजक एवं कार्यकर्ताओं ने बताया कि संस्कृत भारती का उद्देश्य संस्कृत को जन-जन की भाषा बनाना तथा भारतीय संस्कृति एवं जीवन मूल्यों को समाज में पुनः प्रतिष्ठित करना है। वर्ग के माध्यम से संस्कृत संभाषण के साथ-साथ व्यक्तित्व निर्माण, राष्ट्रभावना, संस्कार एवं सामाजिक समरसता के मूल्यों का भी विकास किया जाता है। उपस्थित जनों ने ऐसे वर्गों के नियमित आयोजन की आवश्यकता पर बल देते हुए संस्कृत भारती के प्रयासों की सराहना की।
Girwa, Udaipur | Jun 7, 2026