17 दिन बाद पुलिस पहरे में उठा शहर का कचरा
- लोगों की परवाह नहीं, कोर्ट का डर: 17 दिन बाद जागा शासन-प्रशासन
- आज कुरुक्षेत्र में सरकार और कर्मचारी नेताओं की बातचीत
सिरसा। सिरसा टुडे | महेश शर्मा
शहर की सड़कों, बाजारों और गलियों में 17 दिन से सड़ रहे कचरे ने आखिरकार शासन-प्रशासन को कार्रवाई के लिए मजबूर कर दिया। दिलचस्प यह है कि जिस सफाई व्यवस्था को लेकर आम लोग लगातार परेशान थे, उसकी सुध प्रशासन ने तब ली, जब मामला हाईकोर्ट तक पहुंच गया और सरकार को अदालत में जवाब देना है। शनिवार सुबह शहर में पुलिसबल की मौजूदगी में कचरा उठाने का अभियान शुरू हुआ। ट्रैक्टर-ट्रॉलियों और जेसीबी से विभिन्न स्थानों से कचरा हटाया गया। कई जगह सफाई कर्मचारी मौके पर पहुंचे और इसका विरोध किया, जिसके बाद पुलिस और कर्मचारियों के बीच नोकझोंक भी हुई।
मामले ने शासन-प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 17 दिन तक शहरवासियों को गंदगी, दुर्गंध और बीमारी के खतरे के बीच छोड़ने वाला प्रशासन अचानक एक ही सुबह सक्रिय हो गया। सवाल यही है कि अगर कचरा उठाने की व्यवस्था इतनी जल्दी बहाल की जा सकती थी तो 17 दिन तक शहर को कूड़े के ढेर में बदलने की नौबत क्यों आने दी गई?
हाईकोर्ट पहुंची बात तो रातों-रात शुरू हुआ सफाई अभियान
सिरसा के कांग्रेस विधायक गोकुल सेतिया ने सफाई कर्मचारियों की हड़ताल और प्रदेश में ठप सफाई व्यवस्था को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। 18 अगस्त को दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने स्थिति को गंभीरता से लिया। अदालत के आदेश में साफ कहा गया कि केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि सेवाएं बहाल करने के प्रयास किए जा रहे हैं। शहरी स्थानीय निकाय विभाग के सचिव को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा गया कि सफाई सेवाएं तत्काल बहाल हों। साथ ही, गतिरोध की स्थिति में कचरे के जमाव को रोकने के लिए कानून के तहत उचित कदम उठाने की बात कही गई। अदालत ने अगली सुनवाई पर संबंधित सचिव से स्थिति रिपोर्ट भी मांगी है। यानी अदालत के सख्त रुख के बाद अब प्रशासन के सामने शहर की सफाई व्यवस्था को लेकर जवाब देने की चुनौती है। यही वजह है कि शनिवार सुबह अचानक कार्रवाई दिखाई देने लगी।
विधायक बोले—हाईकोर्ट में रिट डाली तो शुरू हो गया काम
विधायक गोकुल सेतिया ने प्रशासन की इस कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए सोशल मीडिया पर कचरा उठाने की तस्वीरें साझा कीं। उनका कहना है कि हाईकोर्ट में याचिका दायर होते ही रातों-रात सफाई का काम शुरू हो गया, क्योंकि अब सरकार को अदालत के सामने जवाब पेश करना है। उनका आरोप है कि यदि प्रशासन आम जनता की परेशानी को लेकर इतना ही गंभीर था तो 17 दिन तक शहर को कूड़े के हवाले क्यों रखा गया? विधायक ने सफाई कर्मचारियों के अधिकारों की लड़ाई जारी रखने की बात भी कही है।
पुलिस पहरे में उठा कचरा, कर्मचारी नेताओं को हिरासत में लिया
शनिवार सुबह शुरू हुए अभियान के दौरान भारी पुलिसबल तैनात रहा। सब्जी मंडी, गुरु नानक स्कूल सहित कई स्थानों से कचरा उठाया गया। कार्रवाई के दौरान सफाई कर्मचारी भी मौके पर पहुंच गए और उन्होंने कचरा उठाने का विरोध किया। पुलिस ने कर्मचारियों को पीछे हटाया। इस दौरान पुलिस और कर्मचारियों के बीच नोकझोंक की स्थिति बनी। वहीं, नगर पालिका कर्मचारी संघ से जुड़े नेताओं को हिरासत में लिए जाने की भी सूचना है। इससे मामला केवल सफाई व्यवस्था तक सीमित न रहकर सरकार और सफाई कर्मचारियों के बीच टकराव का रूप लेता दिखाई दे रहा है।
जनता पूछ रही—17 दिन तक किसका इंतजार था?
शहर में लंबे समय से जमा कचरे के कारण लोगों में बीमारी फैलने का डर बना हुआ था। बाजारों और रिहायशी इलाकों में जगह-जगह कचरे के ढेर प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रहे थे। आम नागरिकों का सवाल सीधा है—क्या जनता की परेशानी दिखाई नहीं दे रही थी या प्रशासन को अदालत के आदेश का इंतजार था? सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि सफाई कर्मचारियों की हड़ताल का समाधान बातचीत के जरिए निकालने के बजाय हालात इतने बिगड़ने क्यों दिए गए कि मामला हाईकोर्ट तक पहुंच गया और शहर में कचरा उठाने के लिए पुलिसबल लगाना पड़ा?
आज कुरुक्षेत्र में सरकार और कर्मचारी नेताओं की बातचीत
इसी बीच प्रदेश में सफाई कर्मचारियों की हड़ताल को लेकर सरकार ने बातचीत का रास्ता भी खोला है। कुरुक्षेत्र में कैबिनेट मंत्री कृष्ण बेदी नगरपालिका कर्मचारी संघ के प्रदेश अध्यक्ष नरेश शास्त्री और प्रतिनिधिमंडल के साथ बातचीत करेंगे। बैठक में मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव अरुण गुप्ता सहित स्थानीय निकाय विभाग के अधिकारी भी मौजूद रहेंगे। अब निगाहें इस बैठक पर हैं कि सरकार कर्मचारियों की मांगों पर क्या ठोस निर्णय लेती है या फिर बातचीत एक और आश्वासन तक सीमित रह जाती है।
अदालत की सख्ती ने खोली व्यवस्था की पोल
पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल सफाई कर्मचारियों की हड़ताल से भी आगे का है। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों को बुनियादी सफाई सुविधा के लिए 17 दिन इंतजार करना पड़े और फिर अदालत की सख्ती के बाद प्रशासन हरकत में आए, तो जवाबदेही तय होना जरूरी है। अदालत ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया है कि राज्य कानून के तहत उपलब्ध उपायों का इस्तेमाल कर सकता है। लेकिन इसके साथ ही सरकार के सामने असली चुनौती केवल कचरा उठाना नहीं, बल्कि उस गतिरोध का स्थायी समाधान निकालना है जिसने पूरे प्रदेश की सफाई व्यवस्था को ठप कर दिया। जनता का सवाल अब यही है—क्या शासन-प्रशासन को लोगों की परेशानी दिखाई नहीं दी, या फिर कोर्ट का डर ही वह वजह बना जिसने 17 दिन बाद कचरा उठाने की मशीनरी को जगा दिया?
Sirsa, Sirsa | Aug 22, 2026