18 दिन बाद जागा प्रशासन, कोर्ट के डर से शहर की सुध लेनी की शुरू
- शिकायतों के जरिए आखिर प्रशासन की नाक तक पहुंची डंपिंग प्वाइंटों की दुर्गंध
- नगर अायुक्त ने ली नगर पार्षदों की बैठक, सफाई व्यवस्था को सुचारु बनाने पर किया मंथन, 27 को है हाई कोर्ट की तारीख
सिरसा।
शहर की सफाई व्यवस्था को लेकर प्रशासन की सक्रियता आखिरकार 18 दिन बाद दिखाई दी। नगर पालिका कर्मचारी संघ की हड़ताल के कारण शहर में जगह-जगह कूड़े के ढेर लगते रहे, दुर्गंध और गंदगी से लोग परेशान होते रहे, लेकिन जिला प्रशासन और नगर परिषद की ओर से समस्या का स्थायी समाधान तलाशने के बजाय हालात को लगातार बिगड़ने दिया गया। अब हाई कोर्ट की सख्ती और कार्रवाई के डर के बाद प्रशासन ने शहर की सुध लेनी शुरू की है। शनिवार और रविवार को कुछ डंपिंग प्वाइंटों से कूड़ा उठाए जाने के बाद जिला नगर आयुक्त सुरेंद्र बेनीवाल ने नगर पार्षदों के साथ बैठक कर सफाई व्यवस्था को सुचारु बनाने पर मंथन किया। डोर-टू-डोर कूड़ा संग्रहण, हड़ताल के दौरान पैदा हुए हालात और शहर की मौजूदा सफाई व्यवस्था पर चर्चा हुई। पार्षदों से भी स्वच्छता अभियान में सहयोग मांगा गया। इसके बाद शहर के सभी डंपिंग प्वाइंटों पर चूना और दवा के छिड़काव के निर्देश दिए गए। शनिवार और रविवार को छिड़काव करवाया गया। गलियों और बाजारों में जमा कूड़े के कारण मच्छर-मक्खियों की आशंका को देखते हुए सभी वार्डों में फॉगिंग करवाने की भी बात कही गई है। लेकिन सवाल यह है कि ये सक्रियता 18 दिन तक कहां थी? जब शहर में रोजाना कूड़े के ढेर बढ़ रहे थे, लोग दुर्गंध और गंदगी के बीच रहने को मजबूर थे, तब प्रशासन ने ऐसी तत्परता क्यों नहीं दिखाई? क्या शहर की सफाई व्यवस्था की सुध लेने के लिए हाई कोर्ट की फटकार और सख्ती जरूरी थी?
सबसे बड़ा सवाल सरकार और प्रशासन की कार्यशैली पर है। यदि प्रशासन के पास डंपिंग प्वाइंटों पर चूना-दवा छिड़कने, फॉगिंग करवाने और वैकल्पिक सफाई व्यवस्था बनाने के उपाय मौजूद थे, तो इन्हें पहले दिन से लागू क्यों नहीं किया गया? 18 दिनों तक शहरवासियों को उनके हाल पर छोड़ने के बाद अब बैठकों और निर्देशों के जरिए व्यवस्था संभालने की कोशिश जवाबदेही से बचने का रास्ता तो नहीं? लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन प्रशासन की जिम्मेदारी उससे भी बड़ी है। पार्षदों से सहयोग मांगना अच्छी पहल है, मगर मूल प्रश्न यह है कि सफाई कर्मचारियों की हड़ताल के दौरान वैकल्पिक व्यवस्था बनाने की जिम्मेदारी किसकी थी। शहरवासियों से सहयोग की अपील करने से पहले प्रशासन और सरकार को यह बताना चाहिए कि 18 दिनों तक शहर को कूड़े के हवाले क्यों रखा गया।
कुछ डंपिंग प्वाइंटों से कूड़ा उठ जाना भी शहर के पूरी तरह साफ होने का प्रमाण नहीं है। शहर की गलियों, बाजारों और अन्य स्थानों पर फैला कूड़ा अब भी प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती है। ऐसे में चूना और दवा का छिड़काव तथा फॉगिंग जरूरी कदम हैं, लेकिन इन्हें 18 दिन बाद की गई मजबूरी की कार्रवाई के बजाय नियमित व्यवस्था का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। शहरवासियों को अब आश्वासन नहीं, जवाब चाहिए-18 दिन तक सफाई व्यवस्था को यूं ही क्यों बिगड़ने दिया गया और अगर हाई कोर्ट का हस्तक्षेप नहीं होता तो प्रशासन कब जागता? सरकार और प्रशासन को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि अदालत की सख्ती खत्म होते ही व्यवस्था फिर पुराने ढर्रे पर न लौटे। आखिर सिरसा की सफाई किसी अदालत के डर से नहीं, प्रशासन की जिम्मेदारी और सरकार की जवाबदेही से होनी चाहिए।
Sirsa, Sirsa | Aug 23, 2026