भरत तिवारी की मौत पर पूरा बिहार सवाल पूछ रहा है...
जब भरत तिवारी जिंदा था और विस्थापितों की आवाज़ उठा रहा था, तब उसके साथ कितने लोग खड़े थे? आज उसके गांव में नेताओं, संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और फिल्मी सितारों की भीड़ उमड़ रही है। लेकिन क्या यह भीड़ पहले नहीं पहुंच सकती थी?
सवाल सिर्फ एक मौत का नहीं, उस व्यवस्था का है जो अक्सर किसी घटना के बाद जागती है। अगर समय रहते संवाद होता, समस्याएं सुनी जातीं और संघर्ष कर रहे लोगों को समर्थन मिलता, तो शायद आज हालात कुछ और होते।
कानून हाथ में लेना गलत है, हिंसा का कोई समर्थन नहीं हो सकता। लेकिन यह पूछना भी जरूरी है कि आखिर ऐसी परिस्थितियां क्यों पैदा हुईं?
क्या हम जिंदा लोगों की आवाज़ सुनने वाला समाज बनेंगे, या सिर्फ मौत के बाद संवेदनाएं व्यक्त करने वाला?
आपकी नजर में भरत तिवारी मामले का सबसे बड़ा सवाल क्या है? अपनी राय जरूर दें।
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