उरई नगर पालिका की जांच से मचा प्रशासनिक भूचाल
संयुक्त मजिस्ट्रेट रिंकू सिंह राही ने घंटों खंगाले अभिलेख, जांच के अधिकार, पुराने आदेश और अभिलेख उपलब्ध कराने को लेकर गरमाई बहस;
नगर पालिका परिषद उरई में कथित वित्तीय, प्रशासनिक एवं विकास कार्यों में अनियमितताओं की जांच बुधवार को पूरे जनपद की सबसे चर्चित प्रशासनिक कार्रवाई बन गई।
संयुक्त मजिस्ट्रेट (न्यायिक) आईएएस रिंकू सिंह राही अपनी टीम के साथ नगर पालिका परिषद कार्यालय पहुंचे और लगभग चार घंटे तक विभिन्न शाखाओं में रखे अभिलेखों, भुगतान संबंधी दस्तावेजों, रजिस्टरों तथा प्रशासनिक पत्रावलियों का परीक्षण किया।
जांच के दौरान नगर पालिका परिसर में अधिकारियों, कर्मचारियों, सभासदों, अधिवक्ताओं, मीडिया प्रतिनिधियों और बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों की मौजूदगी के कारण पूरे समय हलचल बनी रही।
इस कार्रवाई ने इसलिए भी विशेष महत्व प्राप्त कर लिया क्योंकि पिछले कई सप्ताह से नगर पालिका परिषद उरई में कथित भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अनियमितताओं को लेकर शिकायतें चर्चा का विषय बनी हुई थीं।
सभासदों द्वारा पहले सामूहिक शिकायत और उसके बाद जांच के दायरे को और विस्तृत करने की मांग ने इस पूरे प्रकरण को जिले के सबसे बड़े प्रशासनिक मामलों में ला खड़ा किया है।
अभिलेखों की गहन पड़ताल, कई दस्तावेजों पर हुई जांच
जांच टीम ने नगर पालिका के विभिन्न अनुभागों में पहुंचकर भुगतान फाइलों, निर्माण कार्यों से जुड़े अभिलेखों, स्टॉक रजिस्टर, कार्यालयीय पत्रावलियों तथा अन्य रिकॉर्ड का परीक्षण शुरू किया।
इस दौरान कुछ अभिलेख तत्काल उपलब्ध नहीं हो सके, जबकि कुछ कर्मचारियों की अनुपस्थिति को लेकर भी चर्चा होती रही।
हालांकि नगर पालिका प्रशासन की ओर से इस संबंध में समाचार लिखे जाने तक कोई विस्तृत आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी नहीं किया गया।
अभिलेख उपलब्ध कराने को लेकर हुई बहस की चर्चा
जांच के दौरान अधिशासी अधिकारी राम अचल कुरील और जांच टीम के बीच अभिलेख उपलब्ध कराने को लेकर कथित रूप से तीखी बहस होने की चर्चा रही।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार कुछ रिकॉर्ड तत्काल प्रस्तुत करने को लेकर दोनों पक्षों के बीच मतभेद की स्थिति बनी।
वहीं तकनीकी शाखा से जुड़े अधिकारी गणेश प्रसाद भी मीडिया से दूरी बनाए हुए दिखाई दिए।
हालांकि इस पूरे घटनाक्रम पर किसी भी अधिकारी ने आधिकारिक बयान जारी नहीं किया।
निजी कंप्यूटर ऑपरेटरों की मौजूदगी पर भी उठे सवाल
जांच के दौरान बड़ी संख्या में कंप्यूटर ऑपरेटरों की मौजूदगी भी चर्चा का विषय बनी रही।
मौके पर मौजूद लोगों के अनुसार इनकी सहायता से अभिलेखों की स्कैनिंग एवं डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करने की व्यवस्था की गई थी।
इस संबंध में संयुक्त मजिस्ट्रेट द्वारा जिलाधिकारी को पूर्व में भेजे गए पत्र का भी उल्लेख किया जा रहा है, जिसमें अभिलेखों के डिजिटलीकरण की योजना का जिक्र किया गया था ताकि रिकॉर्ड सुरक्षित रखा जा सके और किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ की संभावना समाप्त हो।
सोशल मीडिया पोस्ट ने बढ़ाई राजनीतिक और प्रशासनिक हलचल
जांच के दौरान SDM Judicial Orai नाम से संचालित सोशल मीडिया अकाउंट पर एक पोस्ट वायरल हुई, जिसमें कहा गया कि यदि जांच रोकने का कोई लिखित आदेश प्राप्त नहीं होता है तो अभिलेख प्राप्त करने की कार्रवाई नियमानुसार जारी रहेगी।
पोस्ट में मीडिया प्रतिनिधियों से मौके पर उपस्थित होकर पूरी प्रक्रिया का लाइव कवरेज करने का अनुरोध भी किया गया। इस पोस्ट के बाद जांच को लेकर चर्चाओं का दायरा और बढ़ गया।
17 जुलाई के आदेश और 10 जुलाई के निर्देश बने सबसे बड़ा विवाद
पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू जांच समिति के अधिकार क्षेत्र को लेकर सामने आया।
उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार 18 जून 2026 को जिलाधिकारी द्वारा नगर पालिका परिषद उरई की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की गई थी। समिति में अपर जिलाधिकारी (नमामि गंगे) प्रेमचंद्र मौर्य अध्यक्ष, तत्कालीन एसडीएम जालौन रिंकू सिंह राही सदस्य तथा अधिशासी अभियंता अमित कुमार सक्सेना सदस्य बनाए गए थे।
बाद में 17 जुलाई 2026 के कार्यालय ज्ञापन में रिंकू सिंह राही के स्थानांतरण के कारण उनके स्थान पर वर्तमान एसडीएम जालौन को सदस्य नामित किए जाने का उल्लेख सामने आया।
यह आदेश बाद में सार्वजनिक होने पर नए सवाल खड़े हो गए।
दूसरी ओर संयुक्त मजिस्ट्रेट रिंकू सिंह राही का कहना है कि उन्हें 10 जुलाई को जिलाधिकारी द्वारा जांच जारी रखने के निर्देश दिए गए थे और वे उसी आदेश के अनुपालन में नगर पालिका पहुंचे।
इस कारण जांच के अधिकार और आदेशों की व्याख्या को लेकर प्रशासनिक स्तर पर बहस तेज हो गई है।
अंतिम स्थिति स्पष्ट किया जाना अभी शेष है।
13 नए बिंदुओं को जांच में शामिल करने की मांग
इस बीच नगर पालिका के कई सभासदों ने जांच अधिकारी को विस्तृत प्रार्थना पत्र सौंपकर जांच में 13 अतिरिक्त बिंदुओं को शामिल करने की मांग की है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यदि इन बिंदुओं की जांच नहीं की गई तो पूरी जांच अधूरी मानी जाएगी।
प्रार्थना पत्र में वर्ष 2023-24, 2024-25 और 2025-26 के दौरान कराए गए निर्माण कार्यों, भुगतान, निविदा प्रक्रिया, माप पुस्तिकाओं, स्टॉक रजिस्टर, आउटसोर्सिंग कर्मचारियों के भुगतान, गौशाला संचालन, शेल्टर होम, विद्युत सामग्री खरीद, फर्नीचर खरीद, पार्क निर्माण, नाला निर्माण, सार्वजनिक शौचालय, ई-मार्केट की दुकानों के आवंटन तथा अन्य विकास कार्यों की जांच कराने की मांग की गई है।
शिकायतकर्ताओं ने यह भी अनुरोध किया है कि सभी संबंधित मूल अभिलेख, भुगतान वाउचर, बैंक विवरण, निविदा फाइलें और स्टॉक रजिस्टर तलब कर उनकी गहन जांच कराई जाए।
पूर्व पत्र में अभिलेख उपलब्ध न कराने का उल्लेख
संयुक्त मजिस्ट्रेट द्वारा जिलाधिकारी को भेजे गए पत्र में कहा गया था कि नगर पालिका परिषद से कई बार पत्राचार और अनुस्मारक भेजे जाने के बावजूद अपेक्षित अभिलेख उपलब्ध नहीं कराए गए, जिससे जांच प्रभावित हो रही है।
पत्र में यह भी उल्लेख किया गया कि यदि निर्धारित समय तक अभिलेख उपलब्ध नहीं कराए जाते हैं तो नगर पालिका कार्यालय पहुंचकर विधिक प्रक्रिया के तहत अभिलेखों का संकलन, डिजिटलीकरण और आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।
पत्र में जांच प्रक्रिया की पारदर्शिता बनाए रखने के लिए मीडिया की उपस्थिति, लाइव प्रसारण तथा आवश्यक पुलिस बल उपलब्ध कराने का भी अनुरोध किया गया था।
आरोप और प्रत्यारोप का दौर जारी
जांच के बाद कुछ लोगों ने आरोप लगाए कि शिकायत से जुड़े सभी बिंदुओं की जांच नहीं हुई तथा कुछ निजी व्यक्तियों द्वारा नगर पालिका परिसर में वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर प्रसारित किए गए।
वहीं दूसरी ओर बड़ी संख्या में नागरिकों और सभासदों का कहना है कि जांच पूरी निष्पक्षता और पारदर्शिता के साथ होनी चाहिए ताकि यदि किसी स्तर पर कोई अनियमितता हुई है तो उसकी वास्तविकता सामने आ सके।
इन आरोपों और दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
अब सबकी निगाहें अंतिम रिपोर्ट पर
नगर पालिका परिषद उरई में चल रही जांच ने पूरे जनपद का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है।
अब लोगों की नजर इस बात पर है कि जांच समिति किन निष्कर्षों पर पहुंचती है, शिकायतों में लगाए गए आरोपों की जांच किस प्रकार होती है और यदि किसी स्तर पर नियमों के उल्लंघन या अनियमितता के प्रमाण मिलते हैं तो सक्षम प्राधिकारी द्वारा क्या कार्रवाई की जाती है।
फिलहाल जांच जारी है और अंतिम निष्कर्ष आधिकारिक जांच रिपोर्ट आने के बाद ही सामने आएगा।
जब तक जांच पूरी नहीं होती और सक्षम प्राधिकारी अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं करता, तब तक किसी भी अधिकारी या कर्मचारी पर लगे आरोप सिद्ध नहीं माने जा सकते।
(पाठकों की राय)
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Kalpi, Jalaun | Jul 30, 2026