भीषण गर्मी के बीच खुद बीमार है औरंगाबाद मॉडल अस्पताल
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औरंगाबाद- सदर अस्पताल जिससे मॉडल अस्पताल का दर्जा दिया गया है, इन दिनों खुद बीमार है। यहां आए दिन मरीज परेशान होते हैं । जहां जांच की सूचि तो बोर्ड पर लगा दी गई है लेकिन यहां अल्ट्रासाउंड समेत कई अन्य जांच नहीं होते हैं। वहीं आए दिन कभी एंबुलेंस खराब होता है तो कभी अस्पताल में दवा की कमी बनी रहती है। सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि अस्पताल प्रांगण में 10 मंजिला भवन बन बनकर तैयार है। उसमें अभी तक ओपीडी और इमरजेंसी शुरू नहीं किया गया है। जबकि तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 8 माह पहले ही इसका उद्घाटन कर चुके हैं।
औरंगाबाद जिला मुख्यालय पर स्थित सदर अस्पताल जिसे मॉडल अस्पताल का दर्जा दिया गया है, इन दिनों खुद समस्याओं से घिरा हुआ है। आए दिन नए-नए कारनामे उजागर हो रहे हैं। अभी कुछ ही दिन पहले ही रेफर मरीज को ले जाने के लिए धक्का लगाकर एंबुलेंस स्टार्ट किया जा रहा था। वहीं दो दिन पहले ही अस्पताल के बिल्डिंग में लिफ्ट फस गया था जिससे लगभग आधे घंटे तक लोग हवा में ही झूलते रहे। 8 महीने पहले ही तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 2 बहुमंजिला भवनों का उद्घाटन किया था। साथ ही इसे मॉडल अस्पताल का दर्जा दिया गया। लेकिन अभी तक यह भवन शोभा की वस्तु बने हुए हैं । जबकि मरीज आज भी खड़ा होकर लाइन में लगकर डॉक्टर से इलाज करने को मजबूर है। आपात स्थिति में मरीज की जान भगवान भरोसे है।
मॉडल अस्पताल का 34.47 करोड़ रुपये की परियोजना, फिर भी व्यवस्था में सुधार नहीं
औरंगाबाद के मॉडल सदर अस्पताल भवन का निर्माण लगभग 34.47 करोड़ रुपये की लागत से कराया गया था। जिसके लिए विशेष रूप से दो 09 मंजिला बिल्डिंग बनाये गए। इसका उद्देश्य जिले के लोगों को आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना और इलाज के लिए बाहर जाने की मजबूरी कम करना था। लेकिन अभी तक एक ही बिल्डिंग में काम शुरू हो सका है। जबकि दूसरा बिल्डिंग अभी भी कचरा घर बना हुआ है। जबकि 8 माह पूर्व ही तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दोनों बिल्डिंगों का विधिवत उद्घाटन किया था।
अव्यवस्थित है इमरजेंसी सेवा
इतने बड़े बिल्डिंग होने और मॉडल अस्पताल का दर्जा मिलने के बाद भी इमरजेंसी सेवा अभी भी अव्यवस्था का शिकार है। जहां कम जगह में मरीजों को डॉक्टर से दिखाने के लिए लाइन लगाकर खड़ा होना पड़ता है। जिससे मरीजों का एक दूसरे में संक्रमण फैलने का भी खतरा बना रहता है । साथ ही चिकित्सकीय स्टाफ को भी बैठने की पर्याप्त जगह मौजूद नहीं है। मरीज और उनके परिजन भी खड़े रहने को मजबूर हैं।
पीने की पानी की समस्या
इस भीषण गर्मी में 44 डिग्री के तापमान रहने के बावजूद सदर अस्पताल में पीने के पानी की व्यवस्था नहीं है। नगर पालिका द्वारा चलाए जा रहे हैं प्याऊ में सिर्फ सुख घड़े और काउंटर के अलावा पानी नजर नहीं आता है। अस्पताल के अंदर लगे वाटर प्यूरीफायर काम नहीं कर रहे हैं।
धक्का लगने के बाद चली एम्बुलेंस, मरीज की बढ़ी परेशानी
2 जून 2026 को सदर अस्पताल से एक गंभीर मरीज को बेहतर इलाज के लिए हायर सेंटर रेफर किया जाना था। परिजन मरीज को लेकर एम्बुलेंस तक पहुंचे, लेकिन वाहन स्टार्ट ही नहीं हुआ। अस्पताल कर्मियों और मौजूद लोगों ने कई बार कोशिश की, मगर इंजन ने जवाब दे दिया।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार करीब 15 से 20 मिनट तक एम्बुलेंस को धक्का लगाया गया, तब जाकर वह स्टार्ट हो सकी। इसके बाद मरीज को हायर सेंटर के लिए रवाना किया गया। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि आपातकालीन चिकित्सा में हर मिनट महत्वपूर्ण होता है।
पुलिस की डायल 112 भी बनी ‘धक्कामार सेवा’
स्वास्थ्य विभाग की एम्बुलेंस के बाद पुलिस विभाग की आपात सेवा भी सवालों के घेरे में आ गई है। हाल ही में सदर अस्पताल परिसर में डायल 112 की एक गाड़ी सड़क दुर्घटना में घायल व्यक्ति को पहुंचाने के बाद वापस लौटने लगी, लेकिन वाहन स्टार्ट नहीं हुआ। काफी देर तक प्रयास करने के बाद वाहन को धक्का लगाकर चालू करना पड़ा। स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर किसी आपराधिक घटना, सड़क हादसे या अन्य आपात स्थिति में ऐसी तकनीकी समस्या सामने आए तो राहत और सुरक्षा कार्य प्रभावित हो सकते हैं। कई सरकारी वाहनों की बैटरियां पुरानी हो चुकी हैं और समय पर उनका रिप्लेसमेंट नहीं हो रहा है। नतीजतन वाहन बंद होने के बाद दोबारा स्टार्ट करने में परेशानी हो रही है।
अस्पताल की लिफ्ट में फंसे मरीज और परिजन
आपात सेवाओं की बदहाली की तीसरी तस्वीर मॉडल सदर अस्पताल की लिफ्ट से सामने आई। 2 जून को अस्पताल भवन की एक लिफ्ट अचानक तकनीकी खराबी का शिकार हो गई। उस समय लिफ्ट में मरीज और उनके परिजन मौजूद थे। लिफ्ट रुकते ही अफरा-तफरी का माहौल बन गया। करीब 30 मिनट तक लोग अंदर फंसे रहे। बाद में तकनीकी कर्मचारियों की मदद से सभी को सुरक्षित बाहर निकाला गया। जानकारी के अनुसार यह पहली बार नहीं है जब अस्पताल की लिफ्ट में खराबी आई हो। इससे पहले भी निरीक्षण के दौरान तकनीकी खामियां सामने आ चुकी हैं। इसके बावजूद स्थायी समाधान नहीं निकल पाने से अस्पताल प्रबंधन की कार्यशैली पर सवाल उठ रहे हैं।
अल्ट्रासाउंड जांच नहीं
औरंगाबाद सदर अस्पताल में ना तो अल्ट्रासाउंड जांच की व्यवस्था है नहीं अन्य जटिल जांच की कोई व्यवस्था है । इतना ही नहीं कई ऐसी दवाइयां हैं जो कि अस्पताल के काउंटर पर नहीं मिलते हैं।
इस संबंध में लोजपा रामविलास के जिला अध्यक्ष सोनू सिंह बताते हैं कि अस्पताल में कई तरह की समस्याएं हैं लेकिन धीरे-धीरे सबको सुधार किया जाएगा । उन्होंने बताया कि इस संबंध में सरकार को सारी शिकायत भेजी गई है और जल्द ही सुधार देखने को मिलेंगे।
वहीं सदर अस्पताल के संबंध में समाजसेवी और मुखिया विजेंद्र यादव ने बताया कि वे लोग सदर अस्पताल की व्यवस्था सुधारने को लेकर के एक समय तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे को काला झंडा दिखाये थे। जिसके कारण उन्हें जेल भी भेजा गया था। फिर भी अस्पताल की स्थिति जस की तस है। मॉडल अस्पताल का बोर्ड तो लगा दिया गया है लेकिन अभी तक यहां किसी भी प्रकार की सुविधा शुरू नहीं कराई गई है।
अस्पताल के समस्याओं के बारे में जब सिविल सर्जन कृष्ण कुमार से बात की गई तो उन्होंने किसी भी प्रकार की जानकारी देने से मन कर दिया। उन्होंने बताया कि उन्हें इस संबंध में किसी भी तरह की जानकारी देने का अधिकार नहीं है। #thesilencemedianews #abhilashasharmaias #aurangabad #औरंगाबाद #LJPRamvilas #BiharHealthDepartment #BiharHealth