हमारी खबर का असर: पचपेड़वा में झोलाछाप डॉक्टर की फर्जी स्पेशलिस्ट क्लीनिक हुई सील, लेकिन संचालक पर अब तक एफआईआर दर्ज क्यों नहीं?
स्वास्थ्य विभाग की 'आधी-अधूरी' कार्रवाई: सीएचसी अधीक्षक ने क्लीनिक पर जड़ा ताला, पर पुलिस केस दर्ज कराने से आखिर क्यों बच रहा महकमा?
हमारी खबर का असर: फर्जी तौर पर संचालित बच्चों के स्पेशलिस्ट क्लीनिक पर सील, पर कानूनी कार्रवाई अब भी नदारद
बलरामपुर जिले के पचपेड़वा में धड़ल्ले से चल रहे फर्जी क्लीनिक के खिलाफ बलरामपुर पोस्ट द्वारा प्रमुखता से उठाई गई खबर का बड़ा असर हुआ है। मामले के तूल पकड़ने के बाद हरकत में आए स्वास्थ्य विभाग ने कार्रवाई करते हुए पचपेड़वा स्थित इस अवैध क्लीनिक को सील कर दिया। पचपेड़वा सीएचसी के अधीक्षक डॉ. अनिल कुमार चौधरी और उनकी टीम ने मौके पर पहुंचकर यह कार्रवाई की। लेकिन इस पूरे मामले में विभाग की कार्यशैली पर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। सवाल यह है कि मासूमों की जान से खुलेआम खिलवाड़ करने वाले इस अस्पताल को सील तो कर दिया गया, लेकिन इसके संचालक के खिलाफ अब तक सुसंगत धाराओं में एफआईआर क्यों नहीं दर्ज कराई गई?
सामने आई तस्वीरों में साफ देखा जा सकता है कि स्वास्थ्य विभाग की टीम ने मौके पर पहुंचकर नीले रंग के शटर वाले इस अवैध क्लीनिक को बंद करवा दिया है। एक व्यक्ति शटर के ताले पर सरकारी कागज की सील लगाता हुआ नजर आ रहा है, जबकि सफेद शर्ट पहने अधिकारी और उनकी टीम पूरी प्रक्रिया की निगरानी कर रही है। क्लीनिक के शटर के दोनों ओर छोटे बच्चों और आंखों की जांच से जुड़े पोस्टर और बैनर लगे हुए हैं, जो इस बात की ओर संकेत करते हैं कि यहां बिना वैध अनुमति के चिकित्सा सेवाएं संचालित की जा रही थीं।
कार्रवाई देखने में भले ही सख्त लग रही हो, लेकिन एफआईआर न होने के कारण यह केवल खानापूर्ति का हिस्सा प्रतीत होती है। केवल शटर गिरा देने और उस पर सील लगा देने से झोलाछाप डॉक्टरों का हौसला नहीं टूटता। जब तक संचालक के खिलाफ संबंधित कानूनों के तहत पुलिस में नामजद मुकदमा दर्ज नहीं होता, तब तक यह कार्रवाई अधूरी मानी जाएगी। बिना पुलिस केस के ऐसे संचालक अक्सर कुछ दिनों बाद किसी दूसरी जगह से अपना धंधा फिर शुरू कर देते हैं।
ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि क्या स्वास्थ्य विभाग सिर्फ दबाव कम करने के लिए यह 'सील' करने की औपचारिकता निभा रहा है? डॉ. अनिल कुमार चौधरी की टीम आखिर किस कारण एफआईआर दर्ज कराने से बच रही है? जब तक दोषियों पर कानूनी शिकंजा नहीं कसता, तब तक पचपेड़वा में मरीजों, विशेषकर बच्चों की सुरक्षा पर सवाल बने रहेंगे। अब देखना होगा कि उच्चाधिकारी इस मामले में संज्ञान लेकर मुकदमा दर्ज कराते हैं या मामला यहीं तक सीमित रह जाता है।
सूत्रों के अनुसार, यह जानकारी सामने आई है कि इस फर्जी अस्पताल का संचालक कथित डॉक्टर सिद्धार्थ यादव, बलरामपुर सदर ब्लॉक के सिसई गांव स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में तैनात फार्मेसिस्ट परम स्वरूप यादव का बेटा है। इसी कारण स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं। चर्चा यह भी है कि प्रभाव के चलते अब तक फर्जी तरीके से संचालित क्लीनिक और फार्मेसी पर कठोर कार्रवाई नहीं हो सकी।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस तरह विभाग बीएएमएस, बीयूएमएस या बीएचएमएस चिकित्सकों द्वारा एलोपैथी प्रैक्टिस करने के मामलों में कार्रवाई करता है, क्या उसी तरह इस मामले में भी क्लीनिक सील करने के साथ एफआईआर दर्ज कराई जाएगी? या फिर यह मामला समय के साथ ठंडे बस्ते में चला जाएगा और कुछ दिनों बाद कथित डॉक्टर दोबारा बच्चों के विशेषज्ञ के रूप में अपनी गतिविधियां शुरू कर देगा।
खबर लिखे जाने तक बलरामपुर पोस्ट पर प्रकाशित इसी खबर जुड़े मामले को लगभग , 1,लाख 80,हज़ार से अधिक लोगों ने देखा है। बड़ी संख्या में पाठक इस मामले पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं और स्वास्थ्य विभाग से सख्त कानूनी कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। उम्मीद की जा रही है कि आने वाले समय में भी लोग इस मुद्दे को लगातार देखेंगे, साझा करेंगे और अपनी राय देकर जनहित के इस अभियान को मजबूत करेंगे।