सदियों पुरानी परंपरा का प्रतीक है चम्बा का रथ-रथनी मेला
भस्मासुर के प्रतीक रथ और भगवान विष्णु के मोहिनी स्वरूप की रथनी के टकराव से जुड़ी है मान्यता, आज भी पूरी श्रद्धा से निभाई जाती है प्राचीन परंपरा
चम्बा, 27 सितंबर।
करीब 1100 से 1200 वर्ष पुराने इतिहास को अपने भीतर समेटे चम्बा शहर की पहचान केवल अपने ऐतिहासिक मंदिरों और प्राकृतिक सौंदर्य तक सीमित नहीं है। यहां आज भी ऐसी अनेक प्राचीन धार्मिक एवं लोक परंपराएं जीवंत हैं, जिन्हें स्थानीय लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाते आ रहे हैं। इन्हीं प्राचीन परंपराओं में रथ-रथनी मेला भी शामिल है।
चम्बा रियासत के इतिहास में राजा साहिल वर्मन का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। माना जाता है कि 9वीं और 10वीं शताब्दी के मध्य राजा साहिल वर्मन ने भरमौर, जिसे उस समय ब्रह्मपुर के नाम से जाना जाता था, से स्थानांतरित होकर चम्बा नगरी को बसाया था। स्थानीय इतिहास और मान्यता के अनुसार अपनी पुत्री चम्पावती के नाम पर इस नगरी का नाम चम्बा रखा गया।
देवभूमि के रूप में प्रसिद्ध चम्बा धार्मिक, सांस्कृतिक और लोक परंपराओं से समृद्ध रहा है। वर्षभर यहां अनेक धार्मिक उत्सव और मेले आयोजित होते हैं, जो इस क्षेत्र की प्राचीन संस्कृति और लोक आस्थाओं की झलक प्रस्तुत करते हैं। इन्हीं आयोजनों में भाद्रपद माह में आयोजित होने वाला रथ-रथनी मेला विशेष महत्व रखता है।
हरिराय मंदिर से निकलता है भस्मासुर का प्रतीक रथ
रथ-रथनी मेले की शुरुआत चम्बा शहर के एक छोर पर स्थित भगवान हरिराय मंदिर से होती है। स्थानीय मान्यता के अनुसार यहां भस्मासुर के प्रतीक के रूप में रथ तैयार किया जाता है।
वहीं दूसरी ओर लक्ष्मी नारायण मंदिर से भगवान विष्णु के मोहिनी स्वरूप का प्रतीक मानी जाने वाली रथनी तैयार की जाती है। दोनों रथों को शहर के बीच लाकर आमने-सामने टकराया जाता है।
स्थानीय लोकमान्यता के अनुसार यह आयोजन भस्मासुर की कथा से जुड़ा हुआ है। रथ को भस्मासुर तथा रथनी को भगवान विष्णु के मोहिनी स्वरूप का प्रतीक माना जाता है। दोनों के बीच होने वाला टकराव बुराई के अंत और अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है।
रथ पर फेंकी जाती हैं सड़ी-गली सब्जियां और मक्की के टोटू
मेले के दौरान हरिराय मंदिर से भस्मासुर के प्रतीक रथ को उठाकर शहर के बीच लाया जाता है। इस दौरान स्थानीय परंपरा के अनुसार लोग रथ की ओर सड़ी-गली सब्जियां, अंडे और मक्की के टोटू आदि फेंकते हैं।
इसके बाद रथ को कंधों पर उठाकर शहर की परिक्रमा करवाई जाती है और अंत में चौगान में पहुंचकर भस्मासुर के प्रतीक रथ को नष्ट किया जाता है। स्थानीय आस्था में इसे भस्मासुर के अंत और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक माना जाता है।
पशु बलि की जगह अब निभाई जाती है नारियल फोड़ने की परंपरा
मेले की शुरुआत पंडितों द्वारा विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना से की जाती है। स्थानीय जानकारी के अनुसार पूर्व में इस आयोजन से पशु बलि की परंपरा भी जुड़ी हुई थी, लेकिन पशु बलि पर कानूनी प्रतिबंध के बाद अब इस परंपरा को नारियल फोड़कर निभाया जाता है।
यह बदलाव दर्शाता है कि समय के साथ धार्मिक परंपराओं के स्वरूप में परिवर्तन आया है, जबकि उनकी सांस्कृतिक और धार्मिक भावना आज भी स्थानीय समाज में कायम है।
राखियों से भी जुड़ी है एक लोकमान्यता
रथ-रथनी मेले से जुड़ी एक अन्य स्थानीय मान्यता रक्षाबंधन के पर्व से संबंधित है। कहा जाता है कि रक्षाबंधन के दिन बहनों द्वारा भाइयों की कलाइयों पर बांधी गई राखियों को इस दिन भस्मासुर के प्रतीक रथ पर उतारकर रखा जाता है।
स्थानीय लोगों की मान्यता है कि ऐसा करने से बुराई का अंत होता है तथा जीवन में सुख-शांति बनी रहती है।
रथ के नीचे से निकलकर बुराइयों से मुक्ति की कामना
मेले के दौरान कई लोग धार्मिक आस्था के तहत भस्मासुर के प्रतीक रथ के नीचे से निकलते हैं। इसे जीवन की नकारात्मकता और बुराइयों से मुक्ति की धार्मिक मान्यता से जोड़ा जाता है।
वहीं भगवान विष्णु के मोहिनी स्वरूप की प्रतीक रथनी की भी श्रद्धापूर्वक परिक्रमा की जाती है। कई परिवार अपने बच्चों को भी रथनी की परिक्रमा करवाते हैं और सुख-समृद्धि तथा बुराइयों से मुक्ति की कामना करते हैं।
चम्बा की सांस्कृतिक विरासत की जीवंत तस्वीर
रथ-रथनी मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि चम्बा की ऐतिहासिक स्मृतियों, लोकविश्वास और सांस्कृतिक विरासत को अपने भीतर समेटे हुए एक प्राचीन लोकपरंपरा है।
आधुनिक दौर में भी स्थानीय लोगों द्वारा इस परंपरा को श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाया जाना यह दर्शाता है कि चम्बा की सांस्कृतिक विरासत आज भी लोगों के जीवन का हिस्सा है।
बाइट: मंदिर के पुजारी युगल किशोर
बाइट: जसवीर नागपाल
बाइट: स्थानीय निवासी
Chamba, Chamba | Sep 27, 2026