*कारोपानी की सफलता*
*कारोपानी में कृष्णमृग संरक्षण की अनूठी मिसाल, ग्रामीणों के सहयोग से सुरक्षित 230 कृष्णमृग*
*जहां ग्रामीणों ने कृष्णमृगों को अपना समझकर बचाया, कारोपानी में 230 कृष्णमृगों का सुरक्षित संसार*
*डिंडौरी, 28 सितम्बर 2026*
सुबह की पहली किरण जैसे ही कारोपानी की पठारी धरती पर उतरती है, खुले मैदान में हलचल शुरू हो जाती है। कहीं कृष्णमृगों का झुंड धीरे-धीरे आगे बढ़ता दिखाई देता है, तो कहीं कोई कृष्णमृग कुछ क्षणों के लिए ठहरकर आसपास का जायजा लेता है। फिर अचानक पूरा झुंड तेजी से दौड़ पड़ता है। यह दृश्य किसी अभयारण्य की चारदीवारी के भीतर का नहीं, बल्कि गांव, खेत और प्रकृति के बीच खुले आसमान के नीचे बसे एक ऐसे संसार का है, जिसे यहां के ग्रामीणों ने वर्षों से अपनेपन के साथ संजोकर रखा है। यही है डिंडौरी का कारोपानी, जहां लगभग 230 कृष्णमृग आज भी प्राकृतिक रूप से निर्भय होकर विचरण कर रहे हैं।
*कृष्णमृगों को वन्यजीव नहीं, अपने परिवार का हिस्सा मानते हैं ग्रामीण*
सामान्य वनमंडल डिंडौरी के वन परिक्षेत्र उत्तर समनापुर अंतर्गत राजस्व ग्राम कारोपानी में लगभग ’’374.38 हेक्टेयर राजस्व एवं निजी भूमि क्षेत्र’’ कृष्णमृगों का स्थायी रहवास बना हुआ है। लगभग 3 हजार परिवारों वाले इस गांव के अधिकांश ग्रामीण कृषि एवं मजदूरी से जुड़े हैं। खेतों के आसपास विचरण करते कृष्णमृग यहां के लोगों के लिए कोई असामान्य दृश्य नहीं, बल्कि रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा हैं।
ग्रामीणों ने कृष्णमृगों को केवल जंगल के वन्यजीव के रूप में नहीं देखा, बल्कि उन्हें अपने आसपास की प्रकृति का हिस्सा माना। यही अपनापन इनके संरक्षण की सबसे मजबूत नींव बना। ग्रामीणों की जागरूकता और सहयोग से कृष्णमृगों को ऐसा वातावरण मिला, जहां वे बिना भय के खुले क्षेत्र में विचरण कर सकें। खेतों और प्राकृतिक आवास के बीच यह सह-अस्तित्व आज करोपानी की सबसे बड़ी पहचान बन चुका है।
*जब संरक्षण सरकारी प्रयास से आगे बढ़कर जनभागीदारी बना*
कृष्णमृगों के संरक्षण में वन विभाग के साथ ग्रामीणों की सहभागिता महत्वपूर्ण रही है। वन विभाग एवं वन सुरक्षा समिति द्वारा समय-समय पर ग्रामीणों के साथ बैठकें आयोजित कर कृष्णमृगों की सुरक्षा एवं संरक्षण के संबंध में आवश्यक दिशा-निर्देश दिए जाते हैं। ग्रामीण भी इनके संरक्षण के प्रति सजग रहते हैं।
यही सामूहिक प्रयास कारोपानी को एक ऐसी मिसाल बनाते हैं, जहां वन्यजीव संरक्षण किसी सीमा या दीवार तक सीमित नहीं है। यहां संरक्षण का अर्थ हैकृ’’प्रकृति के साथ रहना, उसे समझना और उसकी रक्षा को अपनी जिम्मेदारी मानना।
*230 कृष्णमृगों की छलांग में दिखाई देती है कारोपानी की कहानी*
खुले मैदान में जब कृष्णमृगों का झुंड दौड़ता है, तो उनकी तेज रफ्तार के साथ जैसे कारोपानी की पूरी कहानी सामने आती है। कभी खेतों के किनारे चरते हुए, कभी एक साथ दौड़ते हुए और कभी दूर तक फैली हरियाली में शांत खड़े कृष्णमृग इस क्षेत्र की प्राकृतिक सुंदरता को जीवंत बना देते हैं।
नर्मदा नदी की निकटता, पठारी भू-भाग, आसपास के कृषि क्षेत्र और खुला प्राकृतिक वातावरण कृष्णमृगों के लिए अनुकूल परिस्थितियां उपलब्ध कराते हैं। यहां प्रकृति और ग्रामीण जीवन अलग-अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे के साथ कदम मिलाकर चलते दिखाई देते हैं।
*कृष्णमृगों ने करोपानी को पर्यटन के नक्शे पर दी नई पहचान*
कृष्णमृगों की प्राकृतिक मौजूदगी ने करोपानी को पर्यटन की दृष्टि से भी विशेष पहचान दिलाई है। प्रतिवर्ष लगभग ’’5 से 6 हजार पर्यटक’’ यहां कृष्णमृगों को देखने पहुंचते हैं। डिंडौरी मुख्यालय से लगभग 15 किलोमीटर और डिंडौरी-अमरकंटक राष्ट्रीय राजमार्ग से लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित होने से यहां पहुंचना भी सहज है। यहां आने वाला पर्यटक केवल कृष्णमृगों को देखकर वापस नहीं लौटता, बल्कि वह ग्रामीण जीवन, कृषि, नर्मदा और वन्यजीवन के बीच बने उस संतुलन को भी महसूस करता है, जिसने कारोपानी को विशिष्ट बनाया है।
*एक गांव, जिसने बता दियाकृप्रकृति बचाने के लिए संवेदना जरूरी है*
कई जगहों पर वन्यजीवों और मानव बस्तियों के बीच दूरी बढ़ती जा रही है, लेकिन कारोपानी की कहानी एक अलग तस्वीर सामने रखती है। यहां ग्रामीणों और कृष्णमृगों के बीच बना सह-अस्तित्व बताता है कि संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं और व्यवस्थाओं से नहीं, बल्कि ’’स्थानीय लोगों की संवेदनशीलता और सहभागिता’’ से भी मजबूत होता है।
कृष्णमृगों की यह सुरक्षित मौजूदगी कारोपानी के ग्रामीणों के उस विश्वास की कहानी है, जिसमें प्रकृति को बचाना अपने भविष्य को बचाने के समान है। वन विभाग के मार्गदर्शन और ग्रामीणों की सहभागिता से यह प्राकृतिक विरासत आज भी सुरक्षित है।
*कृष्णमृगों की दौड़ में दौड़ती है कारोपानी की उम्मीद*
शाम ढलती है। खेतों पर सूरज की सुनहरी रोशनी बिखरने लगती है। आसपास की हलचल धीमी पड़ती है और खुले मैदान में कृष्णमृगों का झुंड धीरे-धीरे आगे बढ़ता है। कुछ क्षण बाद कोई कृष्णमृग तेज छलांग लगाता है और उसके पीछे पूरा झुंड दौड़ पड़ता है। यह केवल वन्यजीवों का एक दृश्य नहीं है। यह उस भरोसे की तस्वीर है, जिसमें ’’ग्रामीणों ने प्रकृति को अपना माना और प्रकृति ने उन्हें अपनी अनमोल विरासत सौंप दी।’’
कभी केवल खेतों और गांव के रूप में पहचाना जाने वाला करोपानी आज 230 कृष्णमृगों के सुरक्षित प्राकृतिक संसार के रूप में अपनी अलग पहचान बना चुका है।
जहां संरक्षण किसी दीवार के भीतर नहीं, बल्कि लोगों के दिलों में सुरक्षित है।
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32 views | Dindori, Madhya Pradesh | Sep 28, 2026