हिमाचल के भविष्य के लिए ग्रीन इंजीनियरिंग, जल संरक्षण और कचरा प्रबंधन पर देना होगा जोर : शहरी विकास मंत्री
युवाओं को आधुनिक तकनीक, व्यावसायिक कौशल और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ने का आह्वान, उपभोक्तावाद पर नियंत्रण और सतत विकास को बताया समय की जरूरत
हिमाचल प्रदेश को आपदाओं के प्रति सक्षम और मजबूत बनाने के लिए केवल कंक्रीट की इमारतों और सड़कों का निर्माण पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसके लिए हरित इंजीनियरिंग, पारिस्थितिक समझ, आपदा से निपटने की तैयारी और सतत पर्वतीय विकास को प्राथमिकता देनी होगी। युवाओं को पर्यावरण विज्ञान, जलवायु नीति, आधुनिक कृषि और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में आगे आकर अपनी भूमिका निभानी चाहिए। 21वीं सदी में करियर की संभावनाएं तेजी से बदल रही हैं, ऐसे में विद्यार्थियों को पारंपरिक शिक्षा के साथ व्यावहारिक कौशल भी विकसित करने होंगे। यह बात शहरी विकास मंत्री ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कही।
उन्होंने कहा कि आज के दौर में सफलता हासिल करने के लिए केवल औपचारिक शिक्षा या डिग्री पर्याप्त नहीं है, बल्कि व्यावहारिक ज्ञान, व्यावसायिक कौशल और बदलती परिस्थितियों के अनुरूप खुद को ढालने की क्षमता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। विद्यार्थी इंजीनियर, डॉक्टर, प्रशासनिक अधिकारी, उद्यमी, पर्यावरणविद् या डिजिटल नवाचार के क्षेत्र में अपना करियर बनाना चाहते हों, उन्हें आधुनिक तकनीक और नए अवसरों को अपनाने के लिए तैयार रहना चाहिए। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, हरित प्रौद्योगिकी, जन स्वास्थ्य और रचनात्मक समस्या समाधान जैसे क्षेत्रों में युवाओं को अपनी क्षमता विकसित करनी होगी।
मंत्री ने कहा कि हिमाचल प्रदेश और देश के भविष्य के नेतृत्वकर्ता होने के नाते युवाओं की जिम्मेदारी केवल व्यक्तिगत करियर में सफलता प्राप्त करने तक सीमित नहीं है। उन्हें जिम्मेदार नागरिक बनकर समाज के प्रति अपने दायित्वों को भी समझना होगा। युवाओं को नशे जैसी सामाजिक बुराइयों के प्रति सतर्क रहना चाहिए, सतत जीवनशैली को बढ़ावा देना चाहिए और प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का सम्मान करते हुए न्याय एवं समानता के लिए आवाज उठानी चाहिए।
जल संकट और कचरे का निपटान बनेंगे बड़ी चुनौतियां
शहरी विकास मंत्री ने कहा कि कम उम्र में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभालना उनके लिए भी सीखने और अनुभव प्राप्त करने का अवसर है। प्रदेश में शहरी विकास से जुड़ी समस्याओं को समझने के दौरान यह महसूस हुआ है कि शिमला सहित हिमाचल प्रदेश के विभिन्न शहरों में शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों के बीच लगातार टकराव की स्थिति सामने आती है। विशेष रूप से कचरे के निपटान के लिए स्थानों की उपलब्धता और सीवरेज संयंत्रों की स्थापना जैसे मुद्दे बड़ी चुनौती बने हुए हैं।
उन्होंने कहा कि 21वीं सदी में दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में ताजे पानी का संकट और कचरे का उचित निपटान प्रमुख होंगे। इन समस्याओं से निपटने के लिए अभी से गंभीरता के साथ योजनाबद्ध प्रयास करने की आवश्यकता है। सतत विकास की बात करते समय यह भी समझना होगा कि हम उद्योगों से उत्पादित वस्तुओं का किस प्रकार उपभोग कर रहे हैं और हमारी जीवनशैली का पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ रहा है।
बढ़ते उपभोक्तावाद पर नियंत्रण जरूरी
मंत्री ने कहा कि ऑनलाइन खरीदारी की बढ़ती सुविधा और देश-दुनिया में उपभोक्तावाद के विस्तार के कारण लोग लगातार अधिक वस्तुओं की ओर आकर्षित हो रहे हैं। ऐसे में विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों को यह समझना होगा कि आवश्यकताओं और अनावश्यक इच्छाओं के बीच सीमा कहां निर्धारित की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि बच्चों की बुनियादी जरूरतें पूरी करना जरूरी है, लेकिन इसके साथ ही अनावश्यक उपभोग पर नियंत्रण रखना भी आवश्यक है।
उन्होंने आगाह किया कि वस्तुओं की बढ़ती खपत के साथ कचरे की मात्रा भी बढ़ती है, जिससे उसके निपटान की समस्या गंभीर होती जाती है। इसलिए पर्यावरण संरक्षण के लिए जिम्मेदार उपभोग, संसाधनों का विवेकपूर्ण इस्तेमाल और कचरे के उचित प्रबंधन को जीवनशैली का हिस्सा बनाना होगा।
विद्यार्थियों को कचरा निपटान स्थल का दौरा करने की सलाह
शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच कचरा प्रबंधन को लेकर पैदा होने वाले टकराव का उल्लेख करते हुए मंत्री ने विद्यालय के प्रधानाचार्य से आग्रह किया कि समय मिलने पर विद्यार्थियों को शिमला के कचरा निपटान स्थल का दौरा करवाया जाए। इससे विद्यार्थियों को कचरे के निपटान से जुड़ी वास्तविक चुनौतियों को समझने और पर्यावरण संरक्षण के महत्व को व्यावहारिक रूप से जानने का अवसर मिलेगा।
उन्होंने कहा कि शिमला सहित प्रदेश के विभिन्न शहरी क्षेत्रों में सीवरेज संयंत्र स्थापित करना भी एक बड़ी चुनौती है। शहरों में रहने वाले लोग स्वच्छ पेयजल चाहते हैं, लेकिन सीवरेज संयंत्रों और कचरा निपटान से जुड़ी व्यवस्थाओं को लेकर शहरी तथा ग्रामीण क्षेत्रों के बीच अक्सर मतभेद सामने आते हैं। इन समस्याओं का समाधान निकालने के लिए पर्यावरणीय संतुलन, जनहित और सतत विकास को ध्यान में रखते हुए सामूहिक प्रयास करने होंगे।