पीलीबंगा अस्पताल का नया फरमान: 'दवा के साथ घर से टॉर्च, मोमबत्ती और पंखी लाना अनिवार्य!'
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पीलीबंगा (हनुमानगढ़)
अगर आप पीलीबंगा के राजकीय चिकित्सालय में इलाज कराने का मन बना रहे हैं, तो पर्ची कटवाने से पहले अपने झोले की जांच जरूर कर लें। जेब में दवा के पैसे हों न हों, लेकिन हाथ में एक दमदार टॉर्च, जेब में मोमबत्ती-माचिस और बगल में हाथ का पंखा होना बेहद जरूरी है। जी हां, कस्बे का सरकारी अस्पताल इन दिनों मरीजों को 'प्राकृतिक और पारंपरिक चिकित्सा' के नाम पर अंधेरे और पसीने का अनोखा पैकेज दे रहा है। जैसे ही मेन बिजली गुल होती है, करोड़ों के बजट से चमचमाता यह अस्पताल 'भूलभुलैया' और 'भूतिया महल' में तब्दील हो जाता है।
'मोबाइल टॉर्च' बनी जीवनदायिनी, मशीनों ने डाली चादर
बिजली कटते ही वार्डों, गैलरियों और इमरजेंसी में ऐसा घुप्प अंधेरा छाता है कि डॉक्टर को मरीज और मरीज को डॉक्टर ढूंढने के लिए मोबाइल की फ्लैशलाइट जलानी पड़ती है। गंभीर घायल दर्द से कराह रहा हो या किसी प्रसूता की डिलीवरी का नाजुक मामला—अस्पताल का भरोसा आधुनिक मशीनों पर नहीं, बल्कि डॉक्टरों के फोन की बैटरी पर टिका है। बैटरी बची तो जान बची, नहीं तो मरीज का भविष्य सीधे भगवान भरोसे!
अस्पताल की अल्ट्रा-मॉडर्न सेवाएं: जांचें बाहर से, राहत हवा से नदारद
बिजली जाने के बाद अस्पताल की कार्यप्रणाली कुछ इस तरह 'हाईटेक' हो जाती है:
* इमरजेंसी वार्ड में सस्पेंस थ्रिलर: बिजली कटते ही इमरजेंसी वार्ड में सन्नाटा और अंधेरा पसर जाता है। गंभीर मरीजों के तीमारदार सांसें थामे बिजली आने की मन्नतें मांगते हैं।
* लैब बंद, प्राइवेट सेंटरों की चांदी: बिजली गुल होते ही अस्पताल की जांच मशीनें गहरी नींद में सो जाती हैं। इसके बाद गरीब मरीजों को खून-पेशाब, ईसीजी और एक्स-रे जैसी बेहद बुनियादी जांचों के लिए बाहर निजी लैबों की तरफ दौड़ना पड़ता है।
* मुफ्त स्टीम बाथ सुविधा: उमस और भीषण गर्मी में पंखे बंद होते ही भर्ती मरीज, नवजात शिशु और तीमारदार पसीने से तर-बतर होकर तड़पने लगते हैं।
जनरेटर का डीजल फाइलों में दौड़ा या कागजों में जला?
जनता अब स्वास्थ्य विभाग से यह पूछने का साहस कर रही है कि क्या अस्पताल में रखे जनरेटर और इन्वर्टर केवल निरीक्षण के दिन अफसरों को दिखाने के लिए सजाए गए शो-पीस हैं? या फिर जनरेटर के डीजल का धुआं केवल कागजों और बिलों में ही उड़ रहा है? जब लाखों रुपये मेंटेनेंस के नाम पर खर्च होते हैं, तो बिजली जाते ही पूरा सिस्टम कोमा में क्यों चला जाता है?
कुंभकर्णी नींद में जिम्मेदार, क्या बड़े हादसे का है इंतजार?
स्वास्थ्य विभाग के आला अफसरों और जनप्रतिनिधियों की आंखें शायद तब तक नहीं खुलेंगी जब तक अंधेरे के चलते कोई गंभीर अनहोनी या जान का नुकसान न हो जाए। पीलीबंगा की जनता अब साफ कह रही है—मरीजों की जान से यह खिलवाड़ और अंधेरे का यह खेल तुरंत बंद होना चाहिए। अस्पताल प्रशासन को तत्काल प्रभाव से ऑटोमैटिक पावर बैकअप चालू करना होगा, ताकि मरीजों को इलाज के लिए अंधेरे से जंग न लड़नी पड़े।