जब तक आम जनता धूल-कीचड़ फांके और गड्ढों में गिरकर हड्डियां तुड़वाती रहे, तब तक सिस्टम को सांप सूंघा रहता है; लेकिन जैसे ही किसी वीआईपी की चमचमाती गाड़ी दलदल में धंसती है, अचानक कुंभकर्णी नींद टूट जाती है। अम्बिकापुर-रायगढ़ मार्ग पर भाजपा संगठन महामंत्री पवन साय और फिर प्रतापपुर मार्ग पर खुद कैबिनेट मंत्री रामविचार नेताम की गाड़ी कीचड़ में लटकी, तब जाकर माननीयों को अहसास हुआ कि सड़कें चलने लायक नहीं हैं। अब कैमरे के सामने अफसरों पर ठीकरा फोड़ा जा रहा है कि 'बजट की कमी नहीं है, अफसर कुंडली मारकर बैठे हैं।' सवाल यह है कि पिछले ढाई साल से सत्ता में बैठे जनप्रतिनिधि क्या भांग खाकर सो रहे थे?
सरगुजा संभाग की धरती से खुद मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय आते हैं और इसी अंचल से सरकार में तीन-तीन कद्दावर मंत्री बैठे हैं, फिर भी नेशनल हाईवे-43 और 343 मौत के कुएं में तब्दील हैं। हर साल बारिश का बहाना बनाकर फाइलों का पेट भरने वाले अड़ियल अफसर और जनता को सिर्फ रटा-रटाया भाषण देने वाले नेता मिलकर पूरे संभाग को नरक बना चुके हैं। जब बजट है, सरकार अपनी है, तो फिर सड़कें गड्ढों में तब्दील क्यों हैं? अफसरों के सिर पर टोपी पहनाकर जनप्रतिनिधि अपनी नाकामी से पल्ला नहीं झाड़ सकते।
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