मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) को लेकर सियासी घमासान छिड़ चुका है, लेकिन क्या विपक्ष का यह विरोध तथ्यों पर आधारित है या सिर्फ सियासी नैरेटिव? 2024 के लोकसभा चुनाव और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों का ठीकरा मौजूदा CEC पर फोड़ा जा रहा है, जबकि रिकॉर्ड बताते हैं कि ज्ञानेश कुमार ने 19 फरवरी 2025 को 26वें CEC के रूप में पदभार संभाला था। जब वो फैसले लिए गए, तब वे केवल निर्वाचन आयुक्त थे। तो फिर पूरे पुराने तंत्र की व्यक्तिगत जवाबदेही आज के मुख्य निर्वाचन आयुक्त पर कैसे थोपी जा सकती है?
असली बहस नारों की नहीं, बल्कि संवैधानिक टाइमलाइन और आयोग के सामूहिक फैसलों की होनी चाहिए। यदि सवाल SIR और वोटर लिस्ट पुनरीक्षण का है, तो जांच और बहस 2025 के बाद के प्रशासनिक दस्तावेजों पर केंद्रित होनी चाहिए, न कि पुराने चुनावों की आड़ में एकतरफा नैरेटिव गढ़ने पर। क्या किसी संस्था के पुराने फैसलों की सजा मौजूदा कुर्सी को देना तथ्यों के साथ न्याय है? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।
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