कई अधिवक्ताओं ने मुझे फोन करके कहा कि कोई भी थाना प्रभारी किसी व्यक्ति का फर्जी आपराधिक रिकॉर्ड तैयार करके न्यायालय में प्रस्तुत करने का जोखिम नहीं उठाएगा। ऐसा करना गंभीर कानूनी परिणामों को आमंत्रित कर सकता है और यदि आरोप प्रमाणित होते हैं, तो संबंधित पुलिस अधिकारी की जवाबदेही भी तय हो सकती है।
लेकिन मेरा सवाल है—अगर किसी व्यक्ति के खिलाफ झूठी शिकायत पर पहले एससी_एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया हो और उसके बाद उसी व्यक्ति का कथित रूप से गलत आपराधिक रिकॉर्ड तैयार करके न्यायालय के सामने प्रस्तुत किया गया हो, तो इसे कैसे देखा जाना चाहिए?
आज मैं इस पूरे मामले से जुड़े दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतिलिपियां सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत कर रहा हूं, ताकि हर व्यक्ति स्वयं दस्तावेजों को देख सके और तथ्यों के आधार पर अपनी राय बना सके।
इन दस्तावेजों के माध्यम से मैं यह सवाल उठा रहा हूं कि क्या संबंधित व्यक्ति के आपराधिक रिकॉर्ड को न्यायालय के समक्ष सही तथ्यों के साथ प्रस्तुत किया गया था? क्या प्रस्तुत रिकॉर्ड की विधिवत जांच की गई थी? और यदि रिकॉर्ड में गलत तथ्य पाए जाते हैं, तो इसके लिए जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही कौन तय करेगा?
यह मामला केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच, पुलिस की जवाबदेही और न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता से जुड़ा है।
कानून के सामने हर व्यक्ति समान है। पुलिस को अपराध की जांच करने का अधिकार है, लेकिन किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध गलत तथ्य प्रस्तुत करने का अधिकार किसी को नहीं है।
अब सवालों से नहीं, दस्तावेजों और तथ्यों से बात होगी।
मैं संबंधित अधिकारियों से मांग करता हूं कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और यदि किसी भी स्तर पर जानबूझकर गलत रिकॉर्ड तैयार करने या न्यायालय के समक्ष गलत तथ्य प्रस्तुत करने की पुष्टि होती है, तो जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाए।