सत्संग से ही जीवन को मिलती है सही दिशा, नाम-सुमिरन ही आत्मा का वास्तविक धन : परम संत हुजूर कंवर साहेब महाराज
दिनोद (भिवानी)। राधास्वामी मुख्यालय, दिनोद में आयोजित विशाल सत्संग में परम संत हुजूर कंवर साहेब जी महाराज ने एक माह के विदेश सत्संग प्रवास से लौटने के बाद साध-संगत को संबोधित करते हुए कहा कि सत्संग वह दिव्य पाठशाला है, जहाँ प्रत्येक क्षण जीवन जीने की नई शिक्षा मिलती है। मनुष्य जीवन में घटने वाली घटनाओं के परिणाम तो देखता है, लेकिन उनके कारणों पर विचार नहीं करता। हम वर्तमान पल को जीते हैं, पर अगले ही पल से अनजान रहते हैं। एक क्षण पूरे जीवन की दिशा बदल सकता है, फिर भी मनुष्य कई जन्मों की योजनाएँ और संग्रह करने में लगा रहता है। यह भी निश्चित नहीं कि हाथ से तोड़ा हुआ निवाला मुँह तक पहुँचेगा या नहीं।
उन्होंने कहा कि संगत का प्रभाव मनुष्य के जीवन को बना भी सकता है और बिगाड़ भी सकता है। रामायण इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। जिस रामराज्य की आज भी चर्चा होती है, उसकी नींव सत्य, प्रेम और श्रेष्ठ संगति पर थी। भगवान श्रीराम के वनवास के बाद चौदह वर्षों तक अयोध्या में दीप नहीं जले, लेकिन एक व्यक्ति के दूषित विचारों ने पूरे राज्य का वातावरण बदल दिया। वहीं लंका जैसे राक्षसी वातावरण में भी विभीषण प्रभु-भक्ति और सत्य पर अडिग रहे। इससे स्पष्ट है कि पवित्र विचारों वाला व्यक्ति बुरे वातावरण में भी अपने संस्कार नहीं छोड़ता, जबकि अपवित्र विचारों वाला व्यक्ति सत्संग में बैठकर भी नहीं बदलता।
हुजूर कंवर साहेब जी महाराज ने कहा कि मन में एक समय में या तो भक्ति, प्रेम, सेवा और सत्संग बस सकते हैं या फिर बुराइयाँ। इसलिए हृदय को पवित्र बनाना आवश्यक है। नाम की कमाई तभी फल देती है जब रहनी-सहनी और आचरण शुद्ध हों। जिस प्रकार चंदन के वृक्ष के पास खड़े अन्य वृक्ष भी उसकी सुगंध ग्रहण कर लेते हैं, उसी प्रकार संत-महात्माओं की संगति से सामान्य व्यक्ति के जीवन में भी सद्गुणों का विकास होने लगता है।
उन्होंने कहा कि जिसका दृष्टिकोण नहीं बदलता, उसका कल्याण भी कठिन है। नाम में अपार शक्ति है। साधक जिस भावना के साथ नाम-सुमिरन करता है, उसी भावना की वृद्धि उसके जीवन में होती है। यदि मन में प्रेम, सेवा और सत्य का भाव होगा तो नाम उसकी आध्यात्मिक उन्नति का आधार बनेगा।
गुरु महिमा का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि मनमुख कभी सच्ची भक्ति नहीं कर सकता, भक्ति केवल गुरुमुख ही कर सकता है। मनमुख अपने मन और विषय-वासनाओं के पीछे चलता है, जबकि गुरुमुख गुरु की आज्ञा को जीवन का आधार बनाता है। सद्गुरु ही जीव को अज्ञान से निकालकर सत्य के प्रकाश तक पहुँचाते हैं। गुरु की कृपा और नाम-सुमिरन से ही जीवन का वास्तविक परिवर्तन संभव है।
उन्होंने कहा कि यदि अंतःकरण में सच्चाई है तो संसार की कोई शक्ति मनुष्य को डिगा नहीं सकती। जैसे सूर्य निकलने पर अंधकार स्वतः मिट जाता है, वैसे ही नाम रूपी सूर्य हृदय में उदित होने पर मोह, भ्रम और अज्ञान का अंधकार समाप्त हो जाता है। संसार नश्वर है, जबकि प्रभु का नाम शाश्वत सत्य है। इसलिए सब कुछ भूल जाएँ, लेकिन नाम को कभी न भूलें।
हुजूर महाराज ने संगत को प्रेरित करते हुए कहा कि जीवन का लक्ष्य केवल परमात्मा की प्राप्ति होना चाहिए। मार्ग में आने वाले आकर्षणों और विषय-वासनाओं में उलझकर मंज़िल को नहीं भूलना चाहिए। जन्म-जन्मांतरों के कर्म एक दिन में समाप्त नहीं होते; नियमित नाम-सुमिरन, सेवा, सत्संग और सदाचार से ही कर्मों का बोझ हल्का होता है।
अपने प्रवचन के समापन में उन्होंने कहा कि मनुष्य सत्य का व्यापार करने आया था, लेकिन विषय-वासनाओं में उलझकर अपने अमूल्य श्वास व्यर्थ गँवा रहा है। परमात्मा द्वारा मिली इस अनमोल पूँजी को नाम-सुमिरन, सेवा, सत्संग और गुरु आज्ञा के पालन में लगाकर ही मानव जीवन को सफल बनाया जा सकता है।