उदयपुर शहर के कलश मार्ग स्थित ठाकुर जी श्री गोवर्धननाथ स्वामी मंदिर (जल साँझी मंदिर) पर जल साँझी महोत्सव पंचम और अंतिम दिवस अमावस्या शनिवार 10 अक्टूबर को मुख्य आकर्षण के रूप में माँ दुर्गा के छठे स्वरुप माँ कात्यायनी का जल पर चित्रण किया गया।
विशेष रूप से कुछ वर्षों से यह कार्य इसलिए किया जा रहा है क्यूंकि हमेशा से ही भक्तों, दर्शनार्थियों का एक प्रश्न होता था कि साँझी माता या संध्या देवी कौन है स्वयं राधा जी है या और कोई देवी?
तो कलाकार राजेश जी बताते है कि माँ दुर्गा के छठे स्वरुप माँ कात्यायनी को ही संध्या देवी या लोक देवी साँझी माता कहा गया है.. "द्वापर युग में राधा जी भगवान श्री कृष्ण को पाने, मोहने और रिझाने के लिए इन्हीं साँझी माता की आराधना किया करती थी और अलग अलग प्रकार की साँझी बनाया करती थी इसलिए आज भी कुंवारी कन्याओं द्वारा मन चाहे फल की प्राप्ति और मन चाहे वर की कामना हेतु अलग अलग प्रकार की साँझी बनाई जाती है जिसमें गोबर की, फ़ूलों की, पत्तों की, अनाज की, सूखे रंगों की साँझी प्रसिद्ध है।
कुछ लोक मत और कथायें यह भी कहती हैं कि साँझी माता स्वयं बृज की अधिष्ठात्री देवी श्यामा जी.. राधा जी ही है, साथ ही कुछ मान्यताओं के अनुसार माना जाता है कि साँझी माता ब्रह्मा जी की मानस पुत्री है, साथ ही यह भी कहा जाता है कि माँ कात्यायनी ही एक रूप में राधा जी है, और राधा जी ही स्वयं भगवान श्री कृष्ण है.. वास्तव में यह जगतपति त्रिलोकीनाथ भगवान श्री कृष्ण की एक लीला है जो मनुष्य की समझ से परे है। अनेकों रुप में भी भगवान परमब्रह्म एक है।
राजेश जी ने इस साँझी में बृज में राधा जी के साथ उनकी सखियों को साँझी पूजन करते और जल में प्रकट हुई साँझी माता के रुप को दर्शाया है, माता के एक हाथ में खड़ग, दूसरे हाथ मे पद्म, तीसरे हाथ को अभय मुद्रा में और चौथे हाथ को वरद मुद्रा में दर्शाया, साथ ही दूरी पर स्थित श्री कृष्ण को भी दर्शाया गया।
जय श्री कृष्ण।