सूखे तालाब से समृद्धि की राह: सकवाह कला ने रचा जल संरक्षण का नया इतिहास
एक ट्यूबवेल ने बदल दी गाँव की तस्वीर: सूखते तालाब से बारहमासी जलस्त्रोत तक का प्रेरक सफर
जहाँ कभी गर्मियों में सूखे तालाब और पानी की किल्लत ग्रामीणों की सबसे बड़ी चिंता हुआ करती थी, वहीं आज ग्राम सकवाह कला पूरे जिले के लिए जल संरक्षण और सामुदायिक सहभागिता का प्रेरणादायक मॉडल बनकर उभरा है। एक मछुआ सहकारी समिति की दूरदर्शिता, मेहनत और सामूहिक संकल्प ने न केवल एक मौसमी तालाब को बारहमासी जलस्त्रोत में बदल दिया, बल्कि पूरे गाँव के जीवन में नई खुशहाली का संचार कर दिया।
विकासखंड नैनपुर के ग्राम सकवाह कला में स्थित 3.40 हेक्टेयर का पंचायत तालाब वर्षों तक केवल बारिश के पानी पर निर्भर था। हर साल मार्च आते-आते तालाब सूख जाता था, जिससे मत्स्य पालन, पशुपालन और ग्रामीणों की दैनिक जरूरतें प्रभावित होती थीं। पानी की कमी गाँव के विकास में सबसे बड़ी बाधा बन चुकी थी।
वर्ष 2015 में गठित कबीर चौक मछुआ सहकारी समिति मर्यादित ने इस समस्या को चुनौती के रूप में स्वीकार किया। 45 सदस्यों वाली समिति ने ग्राम पंचायत से तालाब को मत्स्य पालन के लिए पट्टे पर लिया और एक संकल्प किया, “मछली भी पालेंगे, पानी भी बचाएंगे।”
समिति ने किसान क्रेडिट कार्ड ऋण और स्वयं के अंशदान से लगभग 1.40 लाख रुपये की लागत से तालाब किनारे 250 फीट गहरा ट्यूबवेल एवं 3 एचपी मोटर स्थापित की। गर्मियों में जब तालाब का जलस्तर कम होने लगता है, तब ट्यूबवेल से पानी डालकर तालाब को जीवित रखा जाता है।
इस छोटे से नवाचार ने बड़ा परिवर्तन ला दिया। तालाब की जल भंडारण क्षमता में लगभग 40 प्रतिशत वृद्धि हुई, भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा मिला और तालाब पूरे वर्ष पानी से भरा रहने लगा। परिणामस्वरूप मत्स्य उत्पादन में भी करीब 40 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जिससे समिति सदस्यों की आय बढ़ी और उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हुई।
आज यह तालाब केवल मछली उत्पादन का केंद्र नहीं है, बल्कि ग्रामीणों के लिए वर्षभर पानी का भरोसेमंद स्त्रोत बन चुका है। निस्तार, कपड़े धोने, स्नान और पशुओं की प्यास बुझाने जैसी जरूरतें अब बिना किसी परेशानी के पूरी हो रही हैं।
समिति के अध्यक्ष श्री नारायण झारिया गर्व से कहते हैं,
हमने ट्यूबवेल अपने संसाधनों से लगवाया, क्योंकि पानी रहेगा तभी मछली रहेगी और तभी गाँव आगे बढ़ेगा। आज यह तालाब हमें कमाई भी दे रहा है और जीवन भी।
एक सफलता से मिली दूसरी प्रेरणा
पहले तालाब की सफलता ने समिति का आत्मविश्वास बढ़ाया। इसके बाद सदस्यों ने गाँव के दूसरे पंचायत तालाब को भी पुनर्जीवित करने का निर्णय लिया। लगभग 0.21 हेक्टेयर क्षेत्रफल वाला यह तालाब वर्षों से उथला होने के कारण केवल बरसात के चार महीने ही पानी रोक पाता था।
जनवरी 2026 में समिति ने बिना किसी सरकारी सहायता के अपने संसाधनों और सदस्यों के सहयोग से लगभग 1.30 लाख रुपये खर्च कर तालाब का गहरीकरण कराया। इस कार्य से तालाब की जल धारण क्षमता बढ़ी और गाँव में जल सुरक्षा को नई मजबूती मिली।
समिति के सचिव श्री सरवन कुमार झारिया कहते हैं,
सरकार से मदद लेने से पहले हमने खुद करके दिखाया। तालाब गहरा हुआ तो गाँव की सोच भी गहरी हो गई। अब पानी के लिए संघर्ष नहीं, बल्कि पानी बचाने के लिए एकजुटता दिखाई दे रही है।
पूरे जिले के लिए बना प्रेरणा का मॉडल
सकवाह कला की यह कहानी बताती है कि सीमित संसाधनों के बावजूद सामुदायिक इच्छाशक्ति, दूरदर्शिता और सहभागिता से बड़े बदलाव संभव हैं। यहाँ तालाबों का पुनर्जीवन केवल जल संरक्षण का कार्य नहीं, बल्कि ग्रामीण विकास, पर्यावरण संवर्धन और आजीविका सशक्तीकरण का माध्यम बन गया है।
आज सकवाह कला का मॉडल जिले के अन्य गाँवों के लिए प्रेरणास्त्रोत बन रहा है। यह संदेश दे रहा है कि यदि समाज स्वयं आगे बढ़कर जिम्मेदारी उठाए, तो पानी की हर बूंद भविष्य की समृद्धि का आधार बन सकती है।
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