लोक संस्कृति में लोकगीत केवल मनोरंजन के साधन नहीं हैं, बल्कि लोकसमाज के इतिहास, अनुभव, संवेदना, रीति-रिवाज और सामूहिक स्मृतियों के जीवंत दस्तावेज हैं। इनमें हमारी पीढ़ियों का जीवन-दर्शन और सामाजिक संबंधों की गहरी बुनियाद छिपी हुई है।
विशेषकर गोदना गोदवाने से जुड़े लोकगीत हमारी सांस्कृतिक परंपरा का एक विशिष्ट पक्ष प्रस्तुत करते हैं। गोदना केवल शरीर पर उकेरी गई आकृति नहीं, बल्कि लोकजीवन में स्त्री की सांस्कृतिक पहचान, सौंदर्यबोध, आस्था और परंपरा से जुड़ाव का प्रतीक भी रहा है। सावन के अवसर पर गोदना गोदवाने का आग्रह, गीतों में स्त्री मन की चंचलता, उसकी इच्छाओं और पारिवारिक-सामाजिक जीवन की सहज अभिव्यक्ति बन जाता है। इन गीतों में पति-पत्नी के संबंधों की आत्मीयता के साथ परिवार के विभिन्न सदस्यों के बीच प्रेम, संवाद और अपनत्व की झलक भी मिलती है।
आज जब आधुनिक जीवन की आपाधापी में परिवार एकल होते जा रहे हैं, सामूहिकता कम हो रही है और रिश्तों के बीच दूरियां बढ़ती दिखाई दे रही हैं, तब ये लोकगीत हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने का आत्मीय आमंत्रण देते हैं। वे याद दिलाते हैं कि जीवन की वास्तविक समृद्धि केवल भौतिक सुख-सुविधाओं में नहीं, बल्कि परिवार के साथ, रिश्तों की गर्माहट, परस्पर प्रेम, सहयोग और सम्मान में निहित है।
आइए, अपनी लोक परंपराओं, लोकगीतों और सांस्कृतिक विरासत को केवल स्मृतियों तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें अगली पीढ़ी तक पहुंचाएं। क्योंकि लोकगीतों को जीवित रखना दरअसल अपनी संस्कृति, अपनी सामूहिक पहचान और रिश्तों की उस खूबसूरत दुनिया को जीवित रखना है, जो हमें एक-दूसरे से जोड़ती है। लोकगीतों में केवल सुर और शब्द नहीं होते, उनमें हमारा समाज, हमारी संस्कृति, हमारी स्मृतियां और हमारी पूरी जीवन परंपरा सांस लेती है।
Information & Public Relations Department, Government of Bihar
General Administration Department, Govt. of Bihar
Home Department, Govt. of Bihar
Art, Culture and Youth Department, Government of Bihar
Department of Tourism, Government of Bihar
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Jamui, Bihar | Nov 1, 2026