सफलता की कहानी: प्राकृतिक खेती से आत्मनिर्भरता की ओर
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विदिशा के औलिंजा ग्राम की श्रीमती नर्वदी कुशवाह अपने क्षेत्र में प्राकृतिक खेती की प्रेरक पहचान बनीं
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मध्यप्रदेश की मेहनती और प्रगतिशील महिला कृषक श्रीमती नर्वदी कुशवाह आज अपने गांव में प्राकृतिक खेती और महिला
सशक्तिकरण की एक प्रेरणादायक मिसाल बन चुकी हैं। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया है कि यदि किसान प्रकृति के साथ जुड़कर खेती करे, तो कम लागत में बेहतर उत्पादन के साथ आत्मनिर्भरता भी प्राप्त की जा सकती है।
ग्यारसपुर विकासखंड के ग्राम औलिंजा निवासी श्रीमती नर्वदी कुशवाह कृषि विभाग की आत्मा परियोजना से जुड़कर प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दे रही हैं। इसके साथ ही वे कृष्णा स्वसहायता समूह की सक्रिय सदस्य हैं और समूह के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं एवं किसानों को आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित कर रही हैं।
प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ते कदम -
पहले उनके खेत में रासायनिक खाद और कीटनाशकों का उपयोग किया जाता था, जिससे खेती की लागत लगातार बढ़ रही थी और मिट्टी की उर्वरता भी कम हो रही थी ATMA परियोजना के अंतर्गत प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद उन्होंने प्राकृतिक खेती अपनाने का निर्णय लिया। आज वे अपने खेत में प्राकृतिक विधि से विभिन्न फसलों एवं सब्जियों का उत्पादन कर रही हैं। उन्होंने रासायनिक उर्वरकों की जगह जैविक एवं प्राकृतिक उत्पादों का उपयोग शुरू किया, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार हुआ और उत्पादन लागत भी कम हुईं।
देशी गाय आधारित प्राकृतिक उत्पाद निर्माण -
नर्बदी कुशवाह अपने घर पर देसी गाय के गोबर एवं गौमूत्र से प्राकृतिक खेती में उपयोग होने वाले कई जैविक उत्पाद तैयार करती हैं, जैसे- जीवामृत, घनजीवामृत, बीजामृत, नीमास्त्र। इन उत्पादों का उपयोग वे स्वयं अपनी खेती में करती हैं तथा अन्य किसानों को भी उपलब्ध कराती हैं। उनके द्वारा तैयार किए गए उत्पाद गांव में काफी लोकप्रिय हो रहे हैं।
अन्य किसानों को कर रहीं जागरूक -
वे केवल स्वयं प्राकृतिक खेती नहीं कर रहीं, बल्कि गाँव-गाँव जाकर अन्य किसानों को भी रसायन मुक्त खेती अपनाने के लिए प्रेरित कर रही हैं किसानों को वे प्राकृतिक उत्पाद बनाने की विधि, कम लागत वाली खेती और मिट्टी संरक्षण के बारे में जानकारी देती हैं। उनकी प्रेरणा से कई किसान अब रासायनिक खेती छोड़कर प्राकृतिक खेती की ओर कदम बढ़ा रहे हैं।
महिला समूह से आत्मनिर्भरता -
कृष्णा स्वसहायता समूह से जुड़ने के बाद दीदी अन्य महिलाओं को प्रशिक्षण और सहयोग दे रहीं हैं। प्राकृतिक खेती के माध्यम से उन्होंने न केवल अपनी आय बढ़ाई, बल्कि गाँव की अन्य महिलाओं को भी रोजगार एवं आत्मनिर्भरता की राह दिखाई।
कम लागत अधिक लाभ -
प्राकृतिक खेती अपनाने से उनकी खेती की लागत में कमी आईं है तथा गिट्टी की उर्वरता और जल धारण क्षमता में सुधार हुआ है। अब उन्हें अपनी उपज के अच्छे दाम भी मिल रहे हैं क्योंकि लोग रसायन मुक्त उत्पादों को अधिक पसंद कर रहे हैं।
प्रेरणादायक संदेश -
प्राकृतिक खेती मिट्टी, पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य तीनों के लिए लाभकारी है। "देशी गाय आधारित खेती किसानों को आत्मनिर्भर बना सकती है। "जब महिलाएँ खेती में नेतृत्व करती हैं, तब पूरा गाँव प्रगति करता है। "कम लागत और प्राकृतिक संसाधनों के सही उपयोग से खेती लाभकारी बन सकती है।
निष्कर्ष -
श्रीमती नर्वदी कुशवाह की सफलता कहानी यह दर्शाती है कि सही मार्गदर्शन, मेहनत और प्राकृतिक खेती के प्रति विश्वास से किसान आत्मनिर्भर बन सकते हैं ये आज अपने क्षेत्र में प्राकृतिक खेती की प्रेरक पहचान बन चुकी हैं और अन्य किसानों को भी टिकाऊ एवं लाभकारी खेती अपनाने के लिए प्रेरित कर रही हैं। "प्राकृतिक खेती केवल खेती की पद्धति नहीं बल्कि स्वस्थ जीवन, समृद्ध किसान और सुरक्षित भविष्य की दिशा है।
Jansampark Madhya Pradesh
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