समीक्षा करने की अद्भुत सामर्थ्य और वास्तविक बौद्धिक पूंजी दमोह की माटी के पास ही विद्यमान है- पंचायत मंत्री श्री पटेल
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अहंकारमुक्त संगठन और सत्ता ही समाज को सही दिशा दे
सकते हैं- वरिष्ठ साहित्यकार पंडित श्री दुबे
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प्रहलाद सिंह पटेल मन, वचन और कर्म से
एक पदयात्री हैं- वरिष्ठ समीक्षक नरेंद्र दुबे
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मानस भवन में 'परिक्रमा: कृपा सार' पुस्तक विमर्श कार्यक्रम संपन्न
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प्रदेश के पंचायत एवं ग्रामीण विकास, श्रम मंत्री एवं वरिष्ठ साहित्यकार प्रह्लाद सिंह पटेल की कृति 'परिक्रमा: कृपा सार' पर जिला मुख्यालय स्थित मानस भवन में एक विशेष साहित्यिक विमर्श कार्यक्रम का भव्य आयोजन किया गया। मध्य प्रदेश लेखक संघ, दमोह के तत्वावधान में आयोजित इस गरिमामय कार्यक्रम में जिले के प्रबुद्ध जनों, साहित्यकारों, विचारकों और वरिष्ठ नागरिकों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया।
इस अवसर पर प्रदेश के पंचायत एवं ग्रामीण विकास, श्रम मंत्री प्रह्लाद सिंह पटेल ने कहा किसी भी गंभीर साहित्यिक रचना की समीक्षा के लिए उच्च सामर्थ्य और योग्यता वाले समीक्षकों की आवश्यकता होती है। उन्होंने दमोह की साहित्यिक धरा को नमन करते हुए कहा, मैं दमोह में 10 वर्षों तक राजनीतिक पदों पर रहा हूँ और मैंने करीब से देखा है कि यहाँ ऐसी साहित्यिक संस्थाएँ और मूर्धन्य विद्वान हैं जिन्होंने 50-50 वर्षों तक निस्वार्थ भाव से साहित्य की सेवा की है। वास्तव में इन समर्पित साधकों को समाज और सरकार से सर्वोच्च सम्मान मिलना चाहिए था।
मंत्री श्री पटेल ने कहा कि दमोह में इस समीक्षा कार्यक्रम के आयोजन के पीछे उनका यह भाव था कि यदि उनकी पुस्तक पर निष्पक्ष समीक्षा और मार्गदर्शन प्राप्त हो, तो वह दमोह के विद्वत जनों के माध्यम से ही संभव है। उन्होंने कहा इस कृति की समीक्षा के लिए देश भर में केवल दो स्थलों का चयन किया गया पहला जयपुर और दूसरा दमोह।
उन्होंने दमोह के बौद्धिक वातावरण पर गर्व व्यक्त करते हुए कहा कि समीक्षा करने की अद्भुत सामर्थ्य और वास्तविक बौद्धिक पूंजी दमोह की माटी के पास ही विद्यमान है। कार्यक्रम में उपस्थित साहित्यकारों और प्रबुद्ध जनों ने कृति के विभिन्न पहलुओं पर विचार-विमर्श कर अपने सारगर्भित विचार प्रस्तुत किए।
वरिष्ठ साहित्यकार पंडित श्याम सुंदर दुबे ने कहा परिक्रमा' केवल एक व्यक्तिगत अनुभव या दर्शन नहीं है, बल्कि यह सबको साथ लेकर चलने वाली वैचारिक और सामाजिक दृष्टि है। उन्होंने कहा यदि संगठन या सत्ता के भीतर अहंकार का समावेश होता है, तो वह गलत दिशा की ओर अग्रसर होकर क्रूरता को जन्म देता है, संगठन और सत्ता को अहंकारमुक्त होना चाहिए, तभी वे समाज कल्याण और सेवा के मार्ग पर निष्पक्ष रूप से आगे बढ़ सकते हैं।
श्री दुबे ने कहा भारतीय दर्शन सबको साथ लेकर चलने का सन्देश देता है। एक-दूसरे की संवेदनाओं को समझना और दूसरों के मन में प्रवेश कर उनके दुख-दर्द को बांटना ही इस दर्शन का मूल आधार है।
वरिष्ठ समीक्षक नरेंद्र दुबे ने पुस्तक और लेखक के व्यक्तित्व पर अपने विचार रखते हुए कहा 'चरैवेति-चरैवेति' (निरंतर चलते रहना) का सिद्धांत प्रह्लाद सिंह पटेल के जीवन और उनकी जीवन-दृष्टि पर सटीक बैठता है। वे मन, वचन और कर्म से एक पदयात्री हैं और निरंतर चलते रहना ही उनका स्वभाव है।
श्री नरेद्र दुबे ने कहा प्रह्लाद सिंह पटेल बचपन से ही चलते आ रहे हैं। उन्होंने सामाजिक, राजनीतिक, व्यसन मुक्ति और संस्कृति मंत्री रहते हुए कई यात्राएं की हैं। जैसे गांधी जी ने साबरमती से दांडी तक यात्रा की थी, वैसे ही प्रह्लाद जी ने भी जन-जागरण और सांस्कृतिक चेतना के लिए निरंतर यात्राएं की हैं। वे जहां भी जाते हैं, उनके साथ कारवां जुड़ता चला जाता है। 'जंगल में मंगल' बना लेना और विपरीत परिस्थितियों में भी लक्ष्य पथ पर अग्रसर रहना उनके व्यक्तित्व की बड़ी विशेषता है।
1 views | Damoh, Madhya Pradesh | Sep 17, 2026