फिरोजाबाद की तपती दोपहर में नगला चूरा के रहने वाले देवेंद्र के जीवन में केवल निराशा का अंधेरा था। उनके दोनों घुटने गठिया (आर्थराइटिस) के कारण पूरी तरह टेढ़े हो चुके थे। चलना तो दूर, उनका उठना-बैठना भी एक सजा जैसा बन गया था। उन्होंने शहर के तीन-चार बड़े निजी डॉक्टरों के चक्कर काटे, लेकिन हर जगह से उन्हें निराशा ही हाथ लगी। हर प्राइवेट डॉक्टर ने भारी-भरकम खर्च का डर दिखाते हुए उन्हें सीधे आगरा रेफर कर दिया था।
निजी अस्पतालों की तंग गलियों और मोटी रकम की मांग से थककर, देवेंद्र ने आखिरकार सरकारी सिस्टम पर भरोसा करने की सोची और वह राजकीय मेडिकल कॉलेज, फिरोजाबाद के ऑर्थोपेडिक विभाग में पहुंचे।
उम्मीद की पहली किरण
वहां उनकी मुलाकात डॉ. चंद्रकांत गौतम से हुई। डॉ. चंद्रकांत ने जब देवेंद्र के घुटनों के एक्स-रे (जैसा कि गंभीर स्थिति दिखाई देती है) को देखा, तो स्थिति वाकई चुनौतीपूर्ण थी।
लेकिन डॉक्टर की आंखों में एक अलग ही चमक और आत्मविश्वास था।
डॉ. चंद्रकांत ने मुस्कुराते हुए देवेंद्र का हाथ थामा और कहाः
"देवेंद्र जी, अब आपको आगरा या सैफई भागने की कोई जरूरत नहीं है। बड़े-बड़े प्राइवेट अस्पताल जो नहीं कर पाए, वो ऑपरेशन अब आपके अपने मेडिकल कॉलेज में ही होगा। और सबसे बड़ी बात, आपको एक पैसा भी खर्च नहीं करना पड़ेगा।"
यह आश्वासन सुनते ही देवेंद्र की आंखों में आंसू आ गए।
सरकारी अस्पताल के डॉक्टरों का यह जज्बा और अपनापन किसी चमत्कार से कम नहीं था।
मिशन "सफल ऑपरेशन"
इस बड़े और जटिल ऑपरेशन को अंजाम देने के लिए कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. योगेश गोयल ने तुरंत एक विशेष और अनुभवी डॉक्टरों की टीम गठित की। इस टीम में शामिल थेः
ऑपरेशन थिएटर (OT) के बाहर सन्नाटा था, लेकिन अंदर डॉक्टरों की उंगलियां जादू बिखेर रही थीं। यह सिर्फ एक सर्जरी नहीं थी, बल्कि एक गरीब मरीज को उसका आत्मसम्मान और सामान्य जीवन वापस लौटाने की जंग थी। आयुष्मान भारत योजना के तहत पूरी तरह से निःशुल्क दोनों घुटनों का 'नी रिप्लेसमेंट' सफलतापूर्वक पूरा किया गया।
एक नया सवेरा
कुछ ही हफ्तों बाद, जो पैर कभी सीधे नहीं हो पाते थे, वे अब बिल्कुल दुरुस्त थे (जैसा कि पोस्ट-ऑपरेशन एक्स-रे में सटीक रूप से फिट किए गए इम्प्लांट्स को देखा जा सकता है)। देवेंद्र अब अपने पैरों पर बिना किसी सहारे के खड़े थे।
डॉक्टरों की इस अभूतपूर्व सफलता ने यह साबित कर दिया कि सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों में वह काबिलियत और जज्बा है, जो बड़े से बड़े कॉर्पोरेट अस्पतालों को मात दे सकता है। मेडिकल कॉलेज का ऑर्थोपेडिक विभाग आज जिले के हजारों मरीजों के लिए उम्मीद का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है।
मुख्यमंत्री के मार्गदर्शन और जिलाधिकारी की नेतृत्व में सदैव इस बात का प्रयास रहता है कि सरकारी अस्पतालों में ही व्यक्तियों को कम खर्च पर अच्छा इलाज मिल सके और इसका बहुत बड़ा उदाहरण यह कहानी है निश्चित रूप से यह कहानी केवल देवेंद्र कि नहीं है ऐसे बहुत सारे व्यक्ति जो अपनी उम्मीद छोड़ चुके थे आज उनके लिए फिरोजाबाद का मेडिकल कॉलेज उम्मीदों का एकआश्रय बनकर उभरा है।