इचाक: आधुनिकता की गूंज में खो गई बैलों की मीठी झंकार
आधुनिकता की गूंज में खो गई बैलों की मीठी झंकार कभी कभी खेतों में सुबह होते ही बैलों के गले में बंधी घंटियों की मधुर आवाज गूंज उठती थी। यह आवाज किसानों के जीवन का अटूट हिस्सा थी, जो बताती थी कि हल जुतने को तैयार हैं। लेकिन आज, उन घंटियों की खनक ट्रैक्टरों के शोर में कहीं दब सी गई है। अब खेतों में बैलों की जोड़ी है।