#बालाघाट जिले में डीएसआर पद्धति को मिल रहा बढ़ावा, किसानों ने सुपर सीडर से की धान की सीधी बुवाई
लालबर्रा और खैरलांजी विकासखंड के किसानों ने अपनाई आधुनिक तकनीक, कम लागत और अधिक उत्पादन की उम्मीद
बालाघाट जिले में कृषि विभाग द्वारा धान उत्पादन में आधुनिक तकनीकों को बढ़ावा देने के प्रयास लगातार रंग ला रहे हैं। किसानों के बीच डायरेक्ट सीडेड राइस (डीएसआर) पद्धति तेजी से लोकप्रिय हो रही है। इसी क्रम में मंगलवार को लालबर्रा एवं खैरलांजी विकासखंड के विभिन्न गांवों में किसानों ने सुपर सीडर मशीन की सहायता से धान की सीधी बुवाई कर आधुनिक खेती की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया।
उपसंचालक कृषि श्री फूलसिंह मालवीय ने बताया कि लालबर्रा विकासखंड के ग्राम नेवरगांव (व) में कृषक श्री अरुण रहांगडाले एवं श्री राजेश रहांगडाले के खेतों में सुपर सीडर मशीन के माध्यम से लगभग 12 एकड़ क्षेत्र में डीएसआर पद्धति से धान की बुवाई की गई। कृषि विभाग के अधिकारियों ने मौके पर पहुंचकर किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान किया तथा डीएसआर पद्धति के लाभों की जानकारी दी। इसी प्रकार खैरलांजी विकासखंड के ग्राम कुम्हली में कृषक श्री निकेश पांडे के खेत में डीएसआर तकनीक से धान की सीधी बोनी की गई। वहीं ग्राम सावरगांव में कृषक श्री पदमलाल लिल्हारे एवं श्री वीरू भंडारकर के लगभग 2 एकड़ क्षेत्र में सुपर सीडर मशीन से धान की बुवाई कराई गई।
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार डीएसआर पद्धति पारंपरिक रोपा विधि की तुलना में अधिक किफायती एवं श्रम बचाने वाली तकनीक है। इस पद्धति में खेत में सीधे बीज की बुवाई की जाती है, जिससे नर्सरी तैयार करने, पौध उखाड़ने और रोपाई करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। इससे मजदूरी लागत में कमी आती है तथा समय और पानी दोनों की बचत होती है। कृषि विभाग द्वारा किसानों को सुपर सीडर जैसी आधुनिक मशीनों के उपयोग के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। विभाग का मानना है कि डीएसआर तकनीक के व्यापक उपयोग से जिले में धान उत्पादन की लागत कम होगी और किसानों की आय में वृद्धि होगी। साथ ही जल संरक्षण एवं टिकाऊ कृषि को भी बढ़ावा मिलेगा।
कृषि अधिकारियों ने किसानों से अपील की है कि वे आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाकर खेती को अधिक लाभकारी बनाएं तथा विभाग द्वारा संचालित विभिन्न योजनाओं और यंत्रीकरण कार्यक्रमों का लाभ उठाएं। जिले में बढ़ते डीएसआर रकबे को देखते हुए यह माना जा रहा है कि आने वाले वर्षों में यह तकनीक धान उत्पादक किसानों के लिए एक प्रभावी विकल्प के रूप में स्थापित होगी।
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