
आलू की माला पहनकर कलेक्ट्रेट पहुंचे किसान, बोले फसल का भाव नहीं मिला तो कर्ज में डूब जाएंगे; सरकार से आलू नीति की मांग
उन्नाव। खेत में मेहनत, मंडी में मायूसी और बढ़ता कर्ज आलू किसानों की इसी पीड़ा को लेकर मंगलवार को उन्नाव कलेक्ट्रेट में किसानों का आक्रोश दिखाई दिया। किसान आलुओं की माला पहनकर कलेक्ट्रेट पहुंचे और सरकार की कृषि नीतियों पर सवाल उठाते हुए प्रदर्शन किया।
किसानों का कहना है कि लागत लगातार बढ़ रही है, लेकिन तैयार फसल का उचित मूल्य नहीं मिल रहा। ऐसे में सिर्फ किसान ही नहीं, बल्कि आलू के कारोबार से जुड़े व्यापारी, आढ़ती, निर्यातक और शीतगृह संचालक भी आर्थिक दबाव झेल रहे हैं।
कलेक्ट्रेट पहुंचा किसान आंदोलन, मुख्यमंत्री के नाम सौंपा ज्ञापन
किसान आंदोलन उत्तर प्रदेश के प्रदेश अध्यक्ष अजय अनमोल के नेतृत्व में दोपहर करीब एक बजे प्रदर्शन किया गया। किसानों ने मुख्यमंत्री को संबोधित छह सूत्रीय ज्ञापन जिलाधिकारी के प्रतिनिधि को सौंपते हुए आलू किसानों के लिए अलग और प्रभावी नीति बनाने की मांग उठाई।
अजय अनमोल के मुताबिक, प्रदेश के कई जिलों में किसानों को आलू की उपज का लागत के अनुरूप मूल्य नहीं मिल पा रहा है। उनका आरोप है कि लगातार घाटे के कारण किसान आर्थिक संकट में फंसते जा रहे हैं और आलू का पूरा कारोबार भी इसका असर झेल रहा है।
फर्रुखाबाद से शुरू हुआ आंदोलन, अब उन्नाव में गूंजी किसानों की आवाज
किसान नेता ने बताया कि मांगों को लेकर 7 सितंबर से फर्रुखाबाद से प्रदेशव्यापी आंदोलन शुरू किया गया। इसके बाद 17 सितंबर को कन्नौज और 25 सितंबर को कानपुर कमिश्नरी में प्रदर्शन किया गया। इसी कड़ी में मंगलवार को उन्नाव कलेक्ट्रेट पहुंचकर किसानों ने सरकार तक अपनी मांग पहुंचाई।
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि जब तक आलू किसानों की समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं होगा, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।
आलू के लिए अलग नीति की मांग, शीतगृह का किराया सरकार दे
किसानों की सबसे प्रमुख मांग आलू के लिए अलग नीति लागू करने की है। उनका कहना है कि जब तक ऐसी नीति लागू नहीं होती, तब तक किसानों से शीतगृह का किराया न लिया जाए और इसका भुगतान सरकार की ओर से किया जाए।
किसानों ने मंडी शुल्क को लेकर भी सवाल उठाया। उनका कहना है कि जब दूसरे राज्यों में मंडी शुल्क में राहत दी गई है, तो उत्तर प्रदेश में भी किसानों और आलू कारोबार से जुड़े लोगों को राहत मिलनी चाहिए।
निर्यात खोलने से लेकर तय भाव तक—किसानों ने रखीं मांगें
आलू किसानों ने निर्यात को पूरी तरह मुक्त करने और निर्यात संबंधी प्रतिबंध हटाने की मांग भी उठाई। उनका कहना है कि बाजार का दायरा बढ़ेगा तो किसानों को अपनी उपज का बेहतर मूल्य मिलने की संभावना बढ़ेगी।
किसानों ने हाइब्रिड आलू का न्यूनतम समर्थन मूल्य ₹1,000 और चिप्सोना आलू का ₹1,500 प्रति क्विंटल घोषित करने की मांग रखी है। उनका कहना है कि यदि बाजार में इससे कम कीमत मिलती है तो सरकार भावांतर योजना के माध्यम से किसानों को कीमत के अंतर की भरपाई करे।
आखिरी सवाल—फसल उगाने वाला ही घाटे में क्यों?
किसानों का कहना है कि बीज, खाद, सिंचाई, मजदूरी, खुदाई, परिवहन और भंडारण की लागत लगातार बढ़ रही है। इसके बावजूद यदि तैयार फसल औने-पौने दाम में बिके, तो किसान के सामने घाटे और कर्ज के अलावा क्या बचेगा?
आलू किसानों ने सरकार से कर्ज के बोझ से राहत दिलाने के लिए ठोस कदम उठाने की मांग की है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि किसान सिर्फ राहत नहीं, बल्कि ऐसी स्थायी व्यवस्था चाहते हैं जिसमें उनकी मेहनत की फसल का उचित मूल्य सुनिश्चित हो सके।
अब नजर सरकार के अगले कदम पर है—क्या आलू किसानों की ये मांगें सिर्फ ज्ञापन बनकर फाइलों में दबेंगी या खेत से मंडी तक किसान के हित में कोई ठोस नीति जमीन पर दिखाई देगी?
Unnao, Unnao | Oct 6, 2026