
हमारे मांदर को मिला GI टैग, अब दुनिया में गूंजेगी झारखंड की माटी की आवाज
रांची। झारखंड के आदिवासी लोकजीवन, पर्व-त्योहार और अखरा की पहचान माने जाने वाले मांदर को आखिरकार GI टैग मिल गया है। भारत सरकार की भौगोलिक संकेतक (GI) रजिस्ट्री, चेन्नई ने मांदर को झारखंड के पारंपरिक लोकवाद्य के रूप में पंजीकृत किया है। इसके साथ ही सदियों पुरानी इस लोककला को कानूनी और भौगोलिक पहचान मिलने का रास्ता साफ हो गया है।
2021 से चल रही थी कवायद, अब मिली मंजिल। मांदर को GI टैग दिलाने की प्रक्रिया वर्ष 2021 में शुरू हुई थी। दूसरे राज्यों में मिलते-जुलते वाद्ययंत्र होने के कारण पंजीकरण की प्रक्रिया लंबी चली। आखिरकार मांदर को झारखंड के विशिष्ट पारंपरिक वाद्य के रूप में मान्यता मिल गई।
मांदर सिर्फ वाद्य नहीं, झारखंड की सांस्कृतिक धड़कन
'मांदर सम्राट' मनपूरन नायक के मुताबिक, मांदर महज एक वाद्ययंत्र नहीं, बल्कि झारखंड की सांस्कृतिक धरोहर है। इसके बिना अखरा की कल्पना अधूरी है। राज्य के 43 पारंपरिक वाद्यों में मांदर का विशेष स्थान है।
69 वर्षीय मनपूरन नायक पिछले 56 वर्षों से मांदर बजा रहे हैं। महज 13 वर्ष की उम्र में वर्ष 1970 में उनका चयन आकाशवाणी के लिए हुआ था। आज वे होटवार स्थित कला मंदिर में नई पीढ़ी के साथ-साथ महिलाओं को भी मांदर बजाने का प्रशिक्षण दे रहे हैं।
नायक कहते हैं कि गीत-संगीत के जन्म से ही मांदर झारखंड की माटी और संस्कृति के साथ जुड़ा रहा है। GI टैग को वे पुरखों की परंपरा और माटी का सम्मान मानते हैं।
Kanke, Ranchi | Sep 29, 2026