
नर्मदा के सीने से रेत का खेल!
प्रतिबंध के बावजूद घाटों पर धड़ल्ले से उत्खनन के आरोप
नावों से नदी के बीच से रेत निकालकर ट्रैक्टर-ट्रॉलियों में ढुलाई
देवास रेत मंडी में रेत से भरे हाईवा-डंपरों की कतार ने बढ़ाए सवाल—बारिश में जब खनन पर रोक, तो आखिर यह रेत आ कहां से रही है?
ग्रामीण सड़कों की हालत खराब, हादसों का खतरा बढ़ा;
खनिज अधिकारी से सवाल हुआ तो जवाब—‘ये रहने दो... गलत बात है’
दिलीप मिश्रा
देवास/खातेगांव। नर्मदा की अविरल धारा... किनारों पर बसे गांव... और इसी नदी के सीने से लगातार निकाली जा रही रेत। देवास जिले के नर्मदा घाटों पर रेत उत्खनन पर प्रतिबंध के बावजूद कथित अवैध उत्खनन और परिवहन की गतिविधियां जारी होने के आरोप सामने आ रहे हैं।
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि नावों के जरिए नदी के बीच से रेत निकाली जाती है और फिर घाटों पर खड़ी ट्रैक्टर-ट्रॉलियों में भरकर अलग-अलग इलाकों में पहुंचाई जा रही है।
लेकिन अब इस पूरे मामले में देवास की रेत मंडी और बायपास पर दिखाई देने वाले रेत से लदे भारी वाहनों ने एक नया और बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
रेत मंडी में सैकड़ों वाहन, बारिश में रेत का स्रोत क्या?
देवास की रेत मंडी और बायपास क्षेत्र में रेत से भरे हाईवा और डंपरों की लंबी कतारें दिखाई देना चर्चा का विषय बना हुआ है। सवाल इसलिए गंभीर है क्योंकि बारिश के मौसम में नर्मदा से सामान्य रेत उत्खनन गतिविधियों पर प्रतिबंध अथवा सीमाएं लागू रहती हैं।
ऐसे में सवाल सीधा है—जब नदी से रेत का खनन नहीं हो रहा, तो इतनी बड़ी मात्रा में रेत आखिर आ कहां से रही है?
क्या यह पूर्व में वैध रूप से भंडारित रेत है?
यदि हां, तो उसका वैध स्टॉक कितना है?
क्या मौके पर मौजूद स्टॉक और रिकॉर्ड का मिलान किया गया है?
क्या रेत से भरे इन वाहनों के पास वैध रॉयल्टी और परिवहन संबंधी दस्तावेज हैं?
यदि सब कुछ नियमानुसार है तो खनिज विभाग के लिए इन सवालों का जवाब देना मुश्किल नहीं होना चाहिए।
और यदि रिकॉर्ड और जमीन पर मौजूद रेत में अंतर है, तो मामला केवल रेत परिवहन का नहीं, बल्कि सरकारी राजस्व और खनिज निगरानी व्यवस्था का भी है।
नाव नदी में, ट्रैक्टर घाट पर... और हाईवा रेत मंडी में!
स्थानीय स्तर पर सामने आ रही तस्वीरें और ग्रामीणों की शिकायतें पूरे रेत परिवहन तंत्र को लेकर सवाल खड़े करती हैं। कथित तौर पर नदी के बीच से नावों द्वारा रेत निकालने से लेकर घाट पर ट्रैक्टर-ट्रॉलियों में भरने और फिर बड़े वाहनों के जरिए आगे परिवहन किए जाने की बात कही जा रही है।
यदि यह पूरा नेटवर्क नियमों के विरुद्ध संचालित हो रहा है, तो सवाल है कि घाट से लेकर रेत मंडी तक निगरानी तंत्र कहां है?
क्या विभाग को घाटों की गतिविधियों की जानकारी नहीं मिलती?
क्या रेत परिवहन करने वाले वाहनों की नियमित जांच होती है?
क्या रेत के स्रोत और उसके दस्तावेजों का सत्यापन किया जाता है?
पत्रकारों के सवाल पर खनिज अधिकारी की चुप्पी
बीते दिनों खातेगांव पहुंचीं जिला खनिज अधिकारी रश्मि पांडे से मीडियाकर्मियों ने नर्मदा घाटों पर चल रहे रेत उत्खनन को लेकर सवाल किया। सवाल के बाद कुछ देर की चुप्पी के पश्चात अधिकारी ने कहा—“ये रहने दो... गलत बात है।”
इसके बाद उन्होंने यह भी कहा कि उत्खनन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाती रहती है।
यहीं से सवाल और गंभीर हो जाता है—अगर कार्रवाई लगातार हो रही है, तो फिर नर्मदा घाटों पर रेत निकालने और उसके परिवहन की गतिविधियां कथित तौर पर लगातार कैसे दिखाई दे रही हैं?
कार्रवाई कितने मामलों में हुई? कितने वाहन जब्त हुए? कितनी रॉयल्टी वसूली गई? और कार्रवाई के बाद उन्हीं क्षेत्रों में गतिविधियां दोबारा क्यों दिखाई देती हैं?
इन सवालों का जवाब अब केवल विभागीय बयान से नहीं, आंकड़ों और जमीन पर कार्रवाई से मिलना चाहिए।
रेत निकली तो सड़कें भी टूटने लगीं
मामला केवल खनिज संपदा तक सीमित नहीं है। भारी ट्रैक्टर-ट्रॉलियों की लगातार आवाजाही ने ग्रामीण संपर्क सड़कों की स्थिति पर भी सवाल खड़े किए हैं।
ग्रामीणों का आरोप है कि भारी वाहनों के कारण सड़कों पर जगह-जगह गड्ढे हो गए हैं। इन्हीं मार्गों से बच्चे स्कूल जाते हैं और ग्रामीण रोजमर्रा के कामों के लिए आवागमन करते हैं।
एक तरफ रेत से कमाई का आरोप और दूसरी तरफ सरकारी खर्च से बनी सड़कों की टूट-फूट—आखिर इस नुकसान की भरपाई कौन करेगा?
बरोठा-हाटपिपलिया की पहाड़ियों पर भी सवाल
रेत के साथ-साथ देवास जिले के बरोठा और हाटपिपलिया क्षेत्र में पहाड़ियों की कथित अवैध खुदाई और मोरम निकालकर परिवहन किए जाने की शिकायतें भी सामने आती रही हैं।
यदि बिना वैध अनुमति पहाड़ियों को काटकर मोरम निकाला जा रहा है, तो यह केवल खनिज नियमों का विषय नहीं बल्कि प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और पर्यावरणीय क्षति से जुड़ा गंभीर मामला है।
यहां भी वही सवाल है—जिम्मेदार विभाग की निगरानी कहां है?
ग्रामीण बोले—शिकायत करते हैं, लेकिन सुनवाई नहीं
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि रेत से भरे ट्रैक्टरों की आवाजाही से वे परेशान हैं। कई बार शिकायत करने के बावजूद समस्या का स्थायी समाधान नहीं हुआ।
ग्रामीणों के सामने समस्या दोहरी है। एक ओर खराब होती सड़कें हैं, तो दूसरी ओर भारी वाहनों की लगातार आवाजाही से बच्चों, बुजुर्गों और दोपहिया वाहन चालकों की सुरक्षा को लेकर चिंता बनी हुई है।
सिर्फ वाहन पकड़ना काफी नहीं
अवैध रेत उत्खनन के मामलों में कार्रवाई की जानकारी सामने आती रहती है, लेकिन असली सवाल कार्रवाई के बाद की स्थिति का है।
यदि किसी घाट पर लगातार शिकायतें मिल रही हैं तो केवल कभी-कभार वाहन पकड़ लेना पर्याप्त नहीं है। जरूरत है घाटवार निगरानी, नावों की जांच, वाहनों के दस्तावेजों का सत्यापन, रेत के स्टॉक का भौतिक मिलान और परिवहन की पूरी श्रृंखला की जांच की।
रेत के प्रत्येक स्टॉक का स्रोत स्पष्ट होना चाहिए और प्रत्येक वाहन के परिवहन संबंधी दस्तावेजों की जांच होनी चाहिए।
अब इन सवालों के जवाब कौन देगा?
• बारिश के दौरान रेत मंडी में इतनी बड़ी मात्रा में रेत कहां से आ रही है?
• देवास रेत मंडी में खड़े रेत से भरे वाहनों के पास वैध रॉयल्टी और परिवहन दस्तावेज हैं या नहीं?
• घोषित रेत स्टॉक और मौके पर मौजूद वास्तविक स्टॉक का भौतिक सत्यापन कब हुआ?
• नर्मदा घाटों पर नावों से रेत निकालने की निगरानी कौन करता है?
• अब तक कितने प्रकरण बनाए गए और कितने वाहन जब्त किए गए?
• कार्रवाई के बावजूद कथित अवैध गतिविधियां दोबारा क्यों दिखाई देती हैं?
• भारी वाहनों से क्षतिग्रस्त ग्रामीण सड़कों की जिम्मेदारी किसकी होगी?
• बरोठा और हाटपिपलिया क्षेत्र में पहाड़ियों से मोरम निकालने की शिकायतों पर क्या कार्रवाई हुई?
• क्या खनिज विभाग घाटवार कार्रवाई और जब्ती का सार्वजनिक रिकॉर्ड जारी करेगा?
सबसे बड़ा सवाल
अगर कार्रवाई हो रही है, तो रेत का उत्खनन और परिवहन कथित तौर पर लगातार कैसे जारी है?
देवास रेत मंडी में खड़े सैकड़ों वाहनों की कतार हो या नर्मदा घाटों पर नावों की गतिविधियां—इन सबका जवाब अब दावों से नहीं, दस्तावेजों और धरातल पर दिखाई देने वाली कार्रवाई से मिलना चाहिए।
क्योंकि नर्मदा की रेत केवल कारोबार का माल नहीं है। यह प्राकृतिक संपदा है और इसकी निगरानी सरकार की जिम्मेदारी है।
अब देखना यह है कि खनिज विभाग इन सवालों का जवाब देता है या फिर सवाल पूछने वालों से एक बार फिर यही कहा जाएगा—“ये रहने दो...”
Collector Dewas
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