आखिर किसकी मेहरबानी से चल रहा आरआई पूनम रावत का 'कागजी खेल'?
कई सालों से एक ही जिले में पोस्टिंग से खड़े हुए सवाल
सतना: आम जनता को नियम और कानूनों का पाठ पढ़ाने वाली पुलिस व्यवस्था अब खुद सवालों के घेरे में खड़ी नजर आ रही है। सतना में लंबे समय से जमीं यातायात प्रभारी आरआई पूनम रावत की पदस्थापना को लेकर विभागीय गलियारों से लेकर आम चर्चाओं तक में सवाल गहराने लगे हैं। सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह उठ रहा है कि जब आधिकारिक रिकॉर्ड में उनकी पदस्थापना 'पुलिस लाइन' में दर्ज है, तो वे लंबे समय से जमीनी स्तर पर यातायात विभाग की कमान कैसे संभाल रही हैं?
यह मामला केवल एक अधिकारी के लंबे कार्यकाल का नहीं है, बल्कि सरकारी दस्तावेजों और वास्तविक जिम्मेदारियों के बीच बने इस बड़े अंतर का है। यदि कागजी आंकड़ों में स्थिति कुछ और है और धरातल पर नजारा कुछ और, तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर यह जानकारी किस स्तर पर तैयार की गई और किसके संरक्षण में इसे वरिष्ठ कार्यालयों तक भेजा गया?
आईजी से लेकर PHQ तक गूंजने लगे सवाल
सूत्रों का दावा है कि दस्तावेजों और हकीकत के इस अंतर की गूंज जल्द ही पुलिस मुख्यालय (PHQ), भोपाल तक पहुंचने वाली है। इस पूरे मामले ने प्रशासनिक पारदर्शिता पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। सवाल यह है कि यदि विभागीय रिकॉर्ड में इस तरह की विसंगति दर्ज है, तो इसकी निष्पक्ष जांच कौन करेगा और इस कागजी हेरफेर या प्रशासनिक अनदेखी के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर जवाबदेही कब तय होगी? जिस पुलिस महकमे के पास गलत जानकारी देने और नियमों का उल्लंघन करने वालों पर सख्त कार्रवाई का अधिकार है, क्या वह अपने ही विभाग के इस घालमेल पर वैसी ही सख्ती दिखाएगा?
नियम सबके लिए बराबर या रसूखदारों के लिए अलग?
सामान्य पुलिसकर्मियों के तबादले, पदस्थापना और ड्यूटी चार्ट को लेकर हमेशा विभागीय कड़े नियमों का हवाला दिया जाता है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या लंबे समय से एक ही महत्वपूर्ण पद पर डटे अधिकारियों के लिए ये नियम बदल जाते हैं?
बड़ा सवाल: अगर रिकॉर्ड सही है, तो व्यवस्था गलत कैसे? और यदि जमीनी व्यवस्था सही है, तो कागजों में हेरफेर क्यों? आखिर इतने लंबे समय से बिना स्पष्ट प्रशासनिक स्थिति के यातायात व्यवस्था संभालने के पीछे किस 'अदृश्य शक्ति' का हाथ है?
अब देखना यह होगा कि इस खबर के सामने आने के बाद पुलिस प्रशासन इस पर क्या रुख अपनाता है और क्या मामले की निष्पक्ष जांच कराकर जिम्मेदारी तय की जाती है या फिर यह 'कागजी खेल' यूं ही जारी रहेगा।