
जट-जटिन: विरह, मिलन और मिटती लोक परंपरा
एक समय था, जब उत्तर बिहार के कोसी-सीमांचल और मिथिलांचल के इलाकों में सावन-भादो आते ही नवविवाहिताओं की आंखें सड़कों की ओर निहारने लगती थीं। उन्हें आस होती थी कि मायके से कोई न कोई उनकी विदाई कराने जरूर आएगा।
परंपरा के अनुसार, ससुराल पक्ष भी बड़े आदर और स्नेह के साथ अपनी पुतोह (बहू) को सावन-भादो में खेलने के लिए नैहर भेज दिया करता था। सावन-भादो में निभाई जाने वाली इसी लोक परंपरा को ‘जट-जटिन’ लोक नृत्य के नाम से जाना जाता है।
परिवार का पेट पालने के लिए इस इलाके के युवा अपनी प्यारी नई-नवेली दुल्हन को किवाड़ की ओट में सिसकते छोड़कर दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और कोलकाता जैसे शहरों की ओर पलायन कर जाते थे। विरह की वही गहरी टीस, आंखों से छलकती पीड़ा और गरीबी का दंश जट-जटिन लोक नृत्य में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
सावन-भादो की मध्य रात्रि में जब चांदनी अपनी छटा बिखेरती और पेड़ों के झुरमुटों से छिपकर गांव की ओर निहारती, तो लगता था मानो वह सभी को जट-जटिन खेलने के लिए पुकार रही हो।
महिलाएं और नवयुवतियां अपने-अपने घरों से निकलकर एक आंगन में जमा हो जाती थीं। ननद-भौजाई के हंसी-ठिठोले और सहेलियों के मिलन के बीच चूड़ियों की खनखनाहट और पायलों की छनकार से पूरा आंगन गूंज उठता था। ढोलक की थाप और सामूहिक गायन आसपास के वातावरण में एक अद्भुत समां बांध देते थे।
उस पल ऐसा प्रतीत होता, मानो धरती भी ठहरकर इनका दीदार कर रही हो।
इसके बाद शुरू होता था गीत-संगीत, नृत्य और अभिनय का असली दौर, जहां महिलाएं पारंपरिक पोशाक पहनकर अभिनय करती थीं। वे दो टोलियों में बंट जाती थीं—एक टोली ‘जट’ और दूसरी ‘जटिन’ बनती थी।
नाटक और गीतों के माध्यम से जट-जटिन के विरह, रूठने-मनाने और नोक-झोंक को जीवंत किया जाता था। इस लोक नृत्य के जरिए सामाजिक मुद्दों, बाढ़, सूखा और प्राकृतिक आपदाओं को भी रेखांकित किया जाता था। मान्यता थी कि जट-जटिन के नृत्य से प्रकृति प्रसन्न होकर फसलों के लिए बारिश करती है।
ढोल की थाप पर मुखौटा लगाकर, हाथों में हाथ डाले चार कदम आगे और चार कदम पीछे थिरकती महिलाओं का यह नृत्य अत्यंत सजीव लगता था।
कथा के अनुसार, झगड़े के कारण जब जटिन रूठकर घर छोड़कर चली जाती है, तो जट उसे ढूंढते हुए राहगीरों से पूछता है—“क्या आपने मेरी जटिनिया को देखा है?”
फिर गीत के माध्यम से वह अपनी जटिनिया की सुंदरता का बखान करता है—
“सुंदरी हमर जटिनियां हो बाबूजी,
पातरी बांस के छोकनियां हो बाबूजी।”
“गोरी हमर जटिनियां हो बाबूजी,
चाननी रात के इंजोरिया हो बाबूजी।”
विरह, मिलन और खट्टे-मीठे अहसासों से सजा होता था यह पूरा लोक नृत्य।
हालांकि, आज जट-जटिन लोक नृत्य बिहार के सांस्कृतिक कार्यक्रमों, सामान्य ज्ञान और प्रतियोगिता परीक्षाओं का महज एक प्रश्न बनकर रह गया है। इस इलाके की नई पीढ़ी भी इसे अक्सर सिर्फ परीक्षा पास करने के लिए गूगल पर ढूंढती है।
आधुनिकता की दौड़ और अश्लील गीतों के बढ़ते प्रभाव के बीच हमारी यह समृद्ध लोक परंपरा विलुप्ति की कगार पर पहुंचती जा रही है। हम अपनी ही सांस्कृतिक धरोहरों से दूर होते जा रहे हैं।
परंपराएं हमारे पूर्वजों की अमूल्य निशानी हैं। उनका इस तरह हमारे जीवन से ओझल हो जाना निश्चित रूप से बेहद चिंताजनक है। जरूरत है कि जट-जटिन जैसी लोक परंपराओं को केवल किताबों और प्रतियोगी परीक्षाओं तक सीमित न रखकर नई पीढ़ी के बीच फिर से जीवंत किया जाए।
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