एक समय होता था, जब लोकतांत्रिक तरीके से अनशन करने पर सरकारें संवेदनशील हो जाती थी। देश की भावनाएं संघर्षशील आदमी के साथ जुड़ जाती थी, लेकिन आज अघोषित तानाशाही का आलम ये है कि सोनम वांगचुक जैसा महान व्यक्तित्व 12 दिन से युवाओं की लड़ाई लड़ते हुए अनशन पर बैठा है, लेकिन न तो सरकार को फर्क पड़ रहा है और न ही देश को।
न मीडिया में न्यूज है और न सोशल मीडिया में, जबकि इसी मीडिया ने अन्ना आंदोलन से लेकर एक पूंजीपति बाबा के आंदोलन को दिन-रात कवरेज देकर भाजपा को सत्ता दिलाने में अहम भूमिका निभाई। लेकिन आज वो ही सरकार जनता के मन की बात सुनने की बजाय अपने मन की बात ही करती जा रही है।
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