
बारां में दो निजी प्रेस क्लब और दोनों ही नेताओं के गुलाम जहां मोटा माल मिले वहीं गुलामी करने पहुंच जाओ यह पत्रकारिता नहीं सिर्फ कमाने का धंधा है और राज्य राजधानी में इन निजी क्लब की कोई मानता नहीं नेताओं की हां हुजूरी करके प्रशासन पर दबाव बनाते हैं और पत्रकार पर कोई आपदा आ जाए और प्रशासनिक अधिकारी मिलने वाला हो या उससे कोई फायदा मिल रहा हो तो निजी प्रेस क्लब मौन हो जाते हैं इसीलिए इस जिले में 80% मीडिया गुलाम है सीधा-सीधा नेताओं की रखैल बन चुका है
🚨 बारां में प्रशासनिक रवैये पर उठे गंभीर सवाल!
बारां के दीपांशु गेरा को लेकर सामने आए मामले ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि एक थाना अधिकारी द्वारा दीपांशु से कथित तौर पर अपशब्द कहे गए। यदि ऐसा हुआ है तो सवाल है—क्या किसी नागरिक से इस तरह का व्यवहार करने का अधिकार किसी अधिकारी को है?
दीपांशु पत्रकार हों या न हों, गौरक्षक हों या सामाजिक कार्यकर्ता—उन्हें भी प्रशासनिक अधिकारियों से सवाल पूछने और अपनी बात रखने का लोकतांत्रिक अधिकार है।
वहीं विधायक राधेश्याम बैरवा की वायरल बाइट में दिखाई दे रहे विभिन्न सोशल मीडिया/डिजिटल मीडिया माइक भी चर्चा का विषय बने हुए हैं। सवाल यह है कि जिले में वास्तविक पत्रकारिता और डिजिटल प्लेटफॉर्म के बीच प्रशासनिक स्तर पर क्या स्पष्ट व्यवस्था है?
एक तरफ सवाल पूछने वाले नागरिक पर कथित दबाव, दूसरी तरफ बड़ी संख्या में डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म—आखिर नियम सबके लिए समान क्यों नहीं?
👉 एक्सपोज न्यूज़ इंडिया का सवाल:
अगर किसी अधिकारी ने अपशब्द कहे हैं तो निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोषी पाए जाने पर कार्रवाई भी।
सवाल पूछना अपराध नहीं, लोकतंत्र की पहचान है।
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Ladpura, Kota | Aug 18, 2026