
करोड़ों की सड़क, सवालों में पुलिया! और भ्रष्टाचार की बू...
निर्माण पूरा होने से पहले ही उखड़ने लगी पुलिया, ग्रामीणों का फूटा गुस्सा; पीडब्ल्यूडी पर भ्रष्टाचार के आरोप, लिखित आश्वासन के बाद खत्म हुआ धरना
दिलीप मिश्रा | देवास
सुनवानी महाकाल गांव में करोड़ों रुपये की लागत से बन रही सड़क और पुलिया अब सवालों के घेरे में है। जिस निर्माण से गांव की तस्वीर बदलने की उम्मीद थी, वही अब ग्रामीणों के लिए चिंता का विषय बन गया है। आरोप है कि पुलिया के भराव में तकनीकी मानकों के विपरीत मिट्टी का उपयोग किया गया, जिसके कारण निर्माण कार्य पूरा होने से पहले ही पुलिया में क्षति के संकेत दिखाई देने लगे हैं।
यदि ये आरोप सही साबित होते हैं, तो यह केवल निर्माण में लापरवाही का मामला नहीं, बल्कि सरकारी धन के दुरुपयोग और संभावित भ्रष्टाचार का भी गंभीर संकेत हो सकता है। इसी मुद्दे को लेकर गुरुवार को ग्रामीण भारतीय किसान संघ के नेतृत्व में लोक निर्माण विभाग (PWD) कार्यालय पहुंच गए और करीब डेढ़ घंटे तक धरना देकर जवाब मांगा।
निर्माण शुरू, लेकिन भरोसा खत्म
ग्रामीणों के अनुसार गांव में लगभग 800 मीटर सीसी रोड, एक किलोमीटर डामरीकरण और तीन पुलियाओं का निर्माण कराया जा रहा है। शुरुआत से ही निर्माण सामग्री और गुणवत्ता पर सवाल उठ रहे थे।
भारतीय किसान संघ के जिला मंत्री शेखर पटेल का कहना है कि कई बार विभागीय अधिकारियों को शिकायतें दी गईं, लेकिन किसी ने गंभीरता से ध्यान नहीं दिया। जब लगातार अनदेखी होती रही, तब ग्रामीणों को आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ा।
सबसे बड़ा आरोप – पुलिया में मिट्टी भरकर किया निर्माण
ग्रामीणों का आरोप है कि पुलिया के अप्रोच और भराव में निर्धारित गुणवत्ता वाली सामग्री की जगह मिट्टी भर दी गई। उसके ऊपर मुरम, गिट्टी और आरसीसी डालकर निर्माण को पूरा करने का प्रयास किया गया।
यदि यह आरोप तकनीकी जांच में सही पाया जाता है, तो यह निर्माण गुणवत्ता के साथ गंभीर समझौता माना जाएगा।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि निर्माण कार्य अभी पूरा भी नहीं हुआ और पुलिया में क्षति दिखाई देने लगी है।
यही वह सवाल है जो पूरे मामले को सामान्य शिकायत से कहीं अधिक गंभीर बना देता है।
सबसे बड़ा सवाल
जो पुलिया अभी बनी भी नहीं, वह टूटने कैसे लगी?
सरकारी निर्माण कार्य वर्षों तक टिकाऊ रहने के लिए बनाए जाते हैं।
ऐसे में यदि निर्माण के दौरान ही पुलिया में दरार, धंसाव या क्षति के संकेत दिखाई देने लगें तो यह कई गंभीर सवाल खड़े करता है—
• क्या निर्माण में मानक सामग्री का उपयोग हुआ?
• क्या तकनीकी निरीक्षण केवल कागजों तक सीमित रहा?
• क्या विभागीय इंजीनियरों ने गुणवत्ता परीक्षण किया?
• क्या जनता के पैसे से बनने वाला निर्माण केवल औपचारिकता बनकर रह गया?
ग्रामीण बोले – कार्रवाई नहीं हुई तो होगा चक्काजाम
गुरुवार दोपहर 12:30 बजे से दो बजे तक ग्रामीणों ने पीडब्ल्यूडी कार्यालय के बाहर धरना दिया।
ज्ञापन में केवल पुलिया की गुणवत्ता ही नहीं बल्कि कई अन्य समस्याएं भी उठाई गईं—
• वैकल्पिक मार्ग का समुचित निर्माण नहीं किया गया।
• किसानों को खेतों तक पहुंचने में परेशानी हो रही है।
• निर्माण के दौरान पेयजल पाइपलाइन क्षतिग्रस्त हो गई।
• विभाग शिकायतों पर कार्रवाई नहीं कर रहा।
ग्रामीणों ने साफ कहा कि यदि समय रहते सुधार नहीं हुआ तो आंदोलन तेज होगा और चक्काजाम किया जाएगा।
लिखित आश्वासन मिलने पर खत्म हुआ आंदोलन
शुरुआत में अधिकारियों ने केवल मौखिक आश्वासन दिया, लेकिन ग्रामीण लिखित भरोसे पर अड़े रहे।
अंततः विभाग ने लिखित पत्र जारी कर आश्वासन दिया कि—
• दो सप्ताह के भीतर क्षतिग्रस्त पेयजल पाइपलाइन ठीक कराई जाएगी।
• वर्षा समाप्त होने के बाद पुलिया के अप्रोच में डाली गई मिट्टी हटाई जाएगी।
• शेष निर्माण स्वीकृत तकनीकी मानकों के अनुसार कराया जाएगा।
इसके बाद ग्रामीणों ने धरना समाप्त किया, लेकिन स्पष्ट कर दिया कि यदि वादे पूरे नहीं हुए तो आंदोलन और उग्र होगा।
क्या यह भ्रष्टाचार की आहट है?
यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि निर्माण में भ्रष्टाचार हुआ है, क्योंकि इसकी पुष्टि तकनीकी जांच के बाद ही हो सकती है।
लेकिन यदि निर्माण कार्य पूरा होने से पहले ही पुलिया क्षतिग्रस्त होने लगे और ग्रामीण लगातार घटिया निर्माण सामग्री के आरोप लगाएं, तो निष्पक्ष तकनीकी जांच अनिवार्य हो जाती है।
सरकारी निर्माण में गुणवत्ता सुनिश्चित करना केवल ठेकेदार ही नहीं, बल्कि संबंधित इंजीनियरों और विभागीय अधिकारियों की भी जिम्मेदारी है।
अब इन सवालों के जवाब जरूरी
• पुलिया निर्माण की तकनीकी गुणवत्ता की जांच कौन करेगा?
• क्या निर्माण सामग्री की लैब टेस्टिंग होगी?
• यदि मानकों का उल्लंघन मिला तो ठेकेदार पर क्या कार्रवाई होगी?
• क्या संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी भी तय होगी?
• क्या पूरे निर्माण कार्य का स्वतंत्र गुणवत्ता ऑडिट कराया जाएगा?
पक्ष जानने का प्रयास
इस संबंध में लोक निर्माण विभाग के कार्यपालन यंत्री से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन वे उपलब्ध नहीं हुए।
जवाब देही पर प्रश्न चिन्ह
सरकारी धन से बनने वाली सड़कें और पुलियां जनता की सुविधा के लिए होती हैं, न कि कुछ वर्षों या महीनों में मरम्मत की नौबत आने के लिए। यदि निर्माण कार्य के दौरान ही गुणवत्ता पर सवाल उठ रहे हैं और पुलिया में क्षति दिखाई देने लगी है, तो यह मामला केवल एक गांव तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि पूरे निर्माण तंत्र की जवाबदेही पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
Jitu Patwari Dr Mohan Yadav Collector Dewas PRO Jansampark Dewas