
- क्या वाकई में भोगेन्द्र झा के सिर में बंदर की खोपड़ी लगी थी?
- जब भोगेन्द्र झा से रक्षा के लिए जनेऊ लेकर गांव में घूमे महंथ
- जब बौकू महतो ने भूखे भोगेन्द्र झा से कहा - ‘कामरेड अहाँ खाउ, आब गोहि मरै कि मुसहर... देख लेबै हमे सब’
- जब भोगेन्द्र झा की हत्या के लिए 100–150 हथियारबंद लोग पहुंच गए!
- भोगेन्द्र झा को बचाने वाला 3–4 साल का वह बच्चा आखिर कौन था?
- कम्युनिस्ट नेता भोगेन्द्र झा की मदद करने अस्पताल पहुंचे सोशलिस्ट नेता डॉ. बैद्यनाथ झा
- जब मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह ने संदेश भेजा.... ‘भाई भोगेन्द्र... मैं आ रहा हूं, बात करूंगा, तब तक अपना हाथ पैर समेट कर रहिए’
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बेनीपट्टी की मिट्टी ने कई ऐसे किरदार पैदा किए, जिनकी कहानियां इतिहास के बड़े पन्नों में भले दब गईं, लेकिन गांवों की स्मृतियों में आज भी जिंदा हैं।
एक सिर पर बंदर की खोपड़ी… एक महंथ के हाथ में जनेऊ… मदद के लिए पहुंचा विरोधी विचारधारा का नेता… और कौन था वह 3–4 साल का बच्चा! आखिर क्या है भोगेन्द्र झा की इस कहानी का सच? जानते हैं इस कड़ी में...
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भारत छोड़ों आंदोलन के बाद पनपा आक्रोश नियंत्रण में था, लेकिन आज़ादी की लड़ाई के साथ जमींदारी उन्मूलन का संघर्ष अंजाम की तरफ अग्रसर था। 1946 में कम्युनिस्टों ने जोरदार तरीके से भूमि–संघर्ष किया। अब तक कांग्रेस व सीपीआई की राहें अलग हो चुकी थी। कम्युनिस्टों के लिए जमीन पर चढ़ना, केवल नारा देने तक सीमित नहीं था, बल्कि चढ़ने का मतलब खेतिहर मजदूर गरीबों के द्वारा कब्जा करना था। यह लड़ाई 1946 में काफी उग्र हो गई। भारत छोड़ो आंदोलन के क्रम में दरभंगा से गिरफ्तार हुए भोगेन्द्र झा जेल से बाहर आ चुके थे। बेनीपट्टी प्रखंड के दामोदरपुर गांव से सटे अंधरी गांव में महंथाना था। महंथ आम तौर पर भूमिहार जाति के होते थे, लेकिन अंधरी महंथ ब्राह्मण थे। मूल रूप से सतलखा गांव के थे और वह परंपरागत रूप से महंथ बनने के बाद ‘झा’ से ‘दास’ बन गये थे। 1945 में हरभजन दास के बाद महंथी रामवेद दास को मिला। उनका मूल नाम वेदानंद झा था जो कि पहले से इस क्षेत्र से परिचित थे।
बात दिसंबर 1946 की है, सीपीआई कांग्रेस से अलग हो चुकी थी। अंधरी गांव के बौकू महतो, भोगेन्द्र झा के पास पहुंचे और बताया कि हमारी जोती हुई जमीन अंधरी के महंथ ने छीन ली है। गिरधारी महतो नाम के बुजुर्ग किसान की शिकायत थी कि महंथ जी रुपया में 26 सेर दूध लेते हैं और अगल–बगल में भाव 1 रुपया में 14–15 सेर है, कुछ कीजिये।
अंधरी महंथ व भोगेन्द्र झा के अच्छे संबंध थे। दोनों का आपस में कोई विद्वेष नहीं था, महंथ भोगेन्द्र झा की काफी इज्जत करते थे। 1942 में जब भोगेन्द्र झा जेल में थे तो उनके विद्यार्थी साथियों के जत्थे को महंथ हरभजन दास ने अपने यहां ठहरने का प्रबंध किया, भोजन कराया। जिसके कारण महंथ और उनके मैनेजर गिरफ्तार भी हुए थे।
अंधरी के बौकू महतो व गिरधारी महतो की बात सुन भोगेन्द्र झा जुलूस के साथ अंधरी पहुंचे, महंथ को बुलाया। महंथ व भोगेन्द्र झा एक दूसरे से परिचित थे। ऐसे में उस दिन जो जो भोगेन्द्र झा कहते,—महंथ मानते गये। जैसे कि जमीन वापस कर दीजिए, उन्होंने माना। गिरधारी महतो की शिकायत पर भोगेन्द्र झा ने कहा- ऐसा क्यों करते हैं ?
महंथ ने जबाब दिया- मेरे पोखरे में पानी पीता है, मेरे ही खेत में इसकी भैंस घास चरती है, मैं कौन कम कीमत देता हूं ? मैं तो ज्यादा देता हूं। और जगह तो महंथ जमींदार कुछ नहीं देते हैं।
भोगेन्द्र झा को यह जवाब रास नहीं आया। उन्होंने वहीं नारा दे दिया। बोले- ठीक है, ना हम आपका पोखरा रहने देंगे, ना जमीन रहने देंगे, तो दूध का भाव तय हो जायेगा।
टकराव की शुरुआत यहीं से हुई। उस समय गांव में ब्राह्मण दो–चार घर ही थे, अधिसंख्य खतबे, मलाह, मुसलमान, जोलहा, कुर्मी, दुसाध, रंगरेज, धुनियां, यादव, सूड़ी थे। इधर भोगेन्द्र झा के नेतृत्व में हुजूम बनाकर महंथ की जमीन पर चढ़ाई की कोशिश हुई, भोगेन्द्र झा के साथ जितने लोग थे, उस समय सभी बचने के लिए इधर–उधर बिखर गये। भोगेन्द्र झा अकेले पड़ गये। भिड़ंत के बीच पास में 3–4 साल का एक नन्हा बच्चा रो रहा था, भोगेन्द्र झा ने बच्चे को कंधे पर ले लिया। वह गड़ांसा–भाले को देखकर इतना घबड़ा गया कि बंदर के बच्चे की तरह उसने भोगेन्द्र झा की गर्दन पकड़ ली। नागा बाबाजी लोग महंथ की हसेड़ी में काफी संख्या में थे। नागा हाथ से बच्चे को खींचने की कोशिश करता रहा, लेकिन बच्चे ने गर्दन नहीं छोड़ी। लाठी डंडों के सामने गड़ांसा–भाले की लड़ाई में सारे मर्द असहाय होकर भाग चुके थे।—इतने में औरतों ने मर्दों को गाली देते हुए—घरों से खपड़ी, घड़ा, मिट्टी फेंकना शुरू किया। हमलावर वापस चले गए। बाद में मालूम हुआ कि वह बच्चा महंथ के मैनेजर का पोता था। इसी वजह से उस दिन भोगेन्द्र झा की जान बच गई।
बाद में जो कुछ गांव के प्रमुख लोग थे, बौकू महतो सहित और लोग, उन लोगों ने भोगेन्द्र झा से हाथ जोड़ कर कहा कि हमारे गांव की किस्मत में यही लिखा है, आपको हम लोग बचा नहीं सकते, आप चले जाइए, कुछ हो जाएगा, मार देंगे तो कलंक लग जाएगा। तब तक राजकुमार पूर्वे भी पहुंच गये, उन्होंने भी गांव वालों की हां में हां मिलाई और बोले- महंथ 50 एकड़ दे रहा हेे, तो उसी को ले लीजिये, 5–5 कट्ठा 200 परिवार में बांट दीजिए, फिर बाद में देखा जाएगा। क्योंकि आप मारे जाएंगे तो फिर पार्टी का जिला में अस्तित्व खत्म हो जाएगा। इतने में गुस्से में भोगेन्द्र झा ने राजकुमार पूर्वे से कहा- दूसरे लोग भी भागे हैं, आप भी भाग जाइए। यहां से मैं या तो जीतकर जाऊंगा या मरकर जाऊंगा।
रात में भोगेन्द्र झा बौकू महतो के आंगन में खाना खाने बैठे, 10 परिवारों का एक आंगन था। भोगेन्द्र झा के कहने पर 20–25 औरतें आ गर्इं। भोगेन्द्र झा के आंखों से ओट होकर सभी बैठी। भोगेन्द्र झा ने उन महिलाओं से उस गांव के कुछ पुराने दास्तान, संस्मरण सुनाया। कैसे अमुक औरत की साड़ी खींची गई, कैसे अमुक को मारा गया, कैसे जुर्म हुआ। उन्होंने कहा पिछले कुछ दिनों में एक बुजुर्ग मरे हैं, आप लोगों में से कोई अमर नहीं है और मुझे बुलाया गया है तो मैं आया हूं सब अत्याचार समाप्त करने के लिए। आपके सभी मर्द आज भाग गये तो ऐसी हालत में मैं भाग नहीं जाऊंगा। ये मुझे कहने गये हैं कि आप हट जाइये, तो मैं हटूंगा नहीं। हो सकता है कल मर जाऊं। जब कल मर ही जाऊंगा तो आज खाने में क्या रखा है। इसलिए मै आज़ खाना नहीं खाऊंगा।
इतने में बौकू महतो की पत्नी मैथिली में बोली-‘कामरेड आहाँ खाउ, काल्हि हम सभ हथियार लेबै, मरदाबा सभ चूड़ी पहिरतै।’ इतने में दर्जनों युवतियां भी आंगन में आ गई, युवतियों ने भी कहा- ‘हमहूं चलब अहाँ सब संग’। सबों ने कहा कि आप खाइए खाना, कल हमलोग हथियार उठा लेंगे। तब बौकू महतो ने जोश में गाली देते हुए कहा- तोरे सब खातिर हम डरा रहल छलुओ..... जखनि तू सन छे त आब हमरा की डर। आगे उसनें भोगेन्द्र झा की तरफ देखते हुए कहा- ‘कामरेड अहाँ खाउ, आब गोहि मरै कि मुसहर।’
यह सुनने के बाद भोगेन्द्र झा ने दूसरे ग्रामीणों को भी बैठाने के लिए कहा, गांव में सभी सो गये थे। उनके कहने पर बौकू महतो सभी को जगाने गये। इतने में भोगेन्द्र झा ने भोजन किया। लोग जुटे, लेकिन सभी उदास थे। दिन में महंथ पर चढ़ाई के समय सभी भाग गये थे, उस शर्म से सभी सिर झुकाए थे। भोगेन्द्र झा ने सभी को जागृत करने का प्रयास किया और जैसे ही उन्होंने अपनी बात खत्म की। पहले व्यक्ति पल्टू यादव ने शपथ लेते हुए कहा-‘काल्हि जे भागए से अपन बेटीक मूत पीअए।’ बारी–बारी से लोग कसम लेने लगे। सुबह में फिर दूसरा नजारा था। सैकड़ों लोग हथियारों के साथ जोश–खरोश में तैयार थे। सुबह में पल्टू यादव, जिसकी घराड़ी जबर्दस्ती महंथ ने ले ली थी, चढ़ गये। महंथ या पुलिस वाले कुछ नहीं कर सके।
इस तरह से 3–4 बार महंथ की जमीन पर चढ़ाई हुई, धीरे–धीरे जमीनों पर कब्ज़ा होना शुरू हुआ। इसी क्रम में एक दिन गांव में जुलूस निकला तो जुलूस पर महंथ के लठैतों ने हमला बोल दिया। जुलूस तितर–बितर हो गया। बरहा गांव के रामेश्वर झा और घूरन झा के साथ राज कुमार पूर्वे को महंथ के लठैत घसीट कर महंथ के पास ले गये। नसीहत देकर बाद में छोड़ दिया गया।
इस जमीन की लड़ाई में महंथ की तरफ से रायबहादुर सुशील कुमार राय और 3–4 वकील थे। महंथ का महंथाना 700 एकड़ का था। जिसमें 75 एकड़ जमीन ऐसी थी, जिससे महंथ ने किसानों को बेदखल कर दिया था, लेकिन कागज पर कानूनन नीलाम नहीं करा सके थे। इसलिए 75 एकड़ को उन्होंने किसानों का मान लिया, अब बाकी 625 एकड़ पर उन्होंने अपना दावा कर दिया।
भोगेन्द्र झा ने उनसे मांग रखी कि पहले यह 75 एकड़ की डिग्री दे दीजिए। महंथ का कहना था कि 75 एकड़ की डिग्री दे देंगे, लेकिन बांकी बचे 625 एकड़ जमीन पर कोई विवाद ना हो। भोगेन्द्र झा का कहना था-—बाकी तो विवाद रहा, माने जप्त हो गया। भोगेन्द्र झा के जिद के आगे महंथ अपनी महंथाना वाली जमीन पर लगी धान की एक छंटाक नहीं काट सके।
भोगेन्द्र झा की हत्या की योजना इसके बाद से बनने लगी थी। रायबहादुर सुशील कुमार राय, एक रईस बंगाली, मधुबनी के वरिष्ठतम और अंधरी महंथाना के पुस्तैनी अधिवक्ता थे। भोगेन्द्र झा की हत्या के षड्यंत्र को रोकने में विफल होने पर उन्होंने यह कह कर त्यागपत्र दे दिया कि इस युवक का जीवन मेरी वकालत और आपकी जमींदारी से ज्यादा कीमती है। और यह भी नहीं है कि सभी अधिकारी भोगेन्द्र झा की हत्या के पक्ष में थे, क्योंकि एक दिन भोगेन्द्र झा बेनीपट्टी में ठहर गये, शाम हो गई थी। सिद्धेश्वर प्रसाद, मधुबनी के एक पुलिस इंस्पेक्टर थे, उन्होंने भोगेन्द्र झा से बातचीत करते–करते बहुत देर कर दी। रात के 9–10 बजे रहे होंगे, नबंबर का महीना था। देर हो गई तो उन्होंने कहा कि अब अंधेरे में मत जाइये, आपकी जान पर खतरा है, यहीं रह जाइए।
भोगेन्द्र झा ने कहा- मैं तो जाऊंगा ही।
जब वे अड़ गये तो इंस्पेक्टर ने कहा- ठीक है। आप यहीं बैठिये, मैं आता हूं, यह कहते हुए इंस्पेक्टर उठ गये।
उसी थाने का थानेदार थे श्रीकृष्ण सिंह, जो भोगेन्द्र झा की हत्या की योजना में शामिल थे। इतने में थानेदार कई बार उनके पास आता और पूछता- कब जाएंगे अंधरी ?
भोगेन्द्र झा कहते थोड़ी देर में––—जब देर हो गयी तो भोगेन्द्र झा ने हवलदार से पूछा कि कब आयेंगे इंस्पेक्टर साहब ?—मुझे देर हो रही है।
जवाब मिला- वो अब नहीं आयेंगे, कल ही आएंगे।
यह सुन भोगेन्द्र झा ने कहा- तो मैं जाता हूं।
हवलदार ने कहा- आप गिरफ्तार हैं, आप नहीं जा सकते।
हवलदार ने उन्हें जबर्दस्ती गिरफ्तार कर लिया और सुबह होते ही छोड़ भी दिया। तब मालूम चला कि भोगेन्द्र झा बचाने ही के लिए गिरफ्तार किया गया था, ताकि रात में वह अंधरी नहीं जाएं। उनकी हत्या को लेकर बन रही योजना की बातें हवा में पहले से आ रही थी।
अब तक महंथ को इस बात की भनक लग गई थी कि जमीन पर कभी भी चढ़ाई हो सकती है, ऐसे में महंथ ने नागा बाबाओं के जत्थों को को खबर कर अंधरी बुला लिया। दरअसल महंथ अपने महंथाना क्षेत्र से गुजरने वाले नागा साधुओं की खूब आवोभगत सेवा सत्कार करते थे। उनमें धार्मिक उन्माद को जगाया गया था कि अंधरी नागा लोगों का अड्डा है, स्थान खत्म हो जाएगा तो फिर उनका एक खूंटा खत्म हो जाएगा। महंथ को इस बात का एहसास हो गया था कि यह आंदोलन उनके अस्तित्व को ख़त्म करने की शुरुआत कर चुकी है। छिटपुट झगड़े, शिकार, फसल–लूटबाजी आदि आम बात थी।
ऐसा होते–होते जब बहुत ज्यादा होने लगा तो महंथ दामोदरपुर गांव पहुंचे, आहपुर–दामोदरपुर के सभी चारों टोले में जनेऊ हाथ में लेकर हाथ जोड़ते हुए लोगों के दालान–दरबज्जा पर घुमने लगे। बोले- हमेशा से इस गांव ने हमारी रक्षा की है, वे लोग हमें उखाड़ना चाह रहे हैं, आप लोग मेरी मदद कीजिये। अगर ऐसा ही चलता रहा तो मैं यहां से चला जाऊंगा। जब महंथाना का संपत्ति ही नही रहेगी, उपर से मार–दंगा, फिर क्यों रहना यहां। रुंधे गले से निकले महंथ के स्वर ने दामोदरपुर गांव के लोगों को उद्देलित कर दिया। महंत को सदमे में देख पूरे गांव ने उनकी मदद करने का फैसला किया। गांव वाले बोलने लगे- ‘अंधरी आब अन्हेर क’ रहलैए, बहुत गलत क’ रहलैए! अरे धर्मे–कर्म पर त’ ई संसार टिकल छै। ई महंथाना हमर सभक क्षेत्रक गुमान छी!’ आदि–आदि। अब तो आर पार की लड़ाई हो गई—
# अंधरी में मरकर जिंदा हुए भोगेन्द्र झा!
भोगेन्द्र झा 3 जनवरी की शाम को मधुबनी से अंधरी गांव जाने वाले थे, लेकिन महंथ के वकील रहे रायबहादुर सुशील कुमार राय, जिन्हें भोगेन्द्र झा सुशील बाबू कहते थे। वह मधुबनी में रहते थे और ठीक 9 बजे सोने के आदी थे, लेकिन उन्होंने भोगेन्द्र झा को 1 बजे रात तक बातचीत में लगाये रखा। इस मंशा से कि भोगेन्द्र झा शाम को ही अंधरी जाने के लिए तैयार थे, उन्हें कैसे भी रोका जाय, इन्हें नींद लग जाएगी तो सो जायेंगे। लेकिन भोगेन्द्र झा पर तो अलग ही धुन सवार थी।
4 जनवरी 1947 की सुबह भोगेन्द्र झा मधुबनी से साईकिल से निकले। सूड़ी स्कूल के छात्रावास से छात्र नेता कामरेड राजकुमार पूर्वे को बुलाकर बोले- शायद यह जिंदगी की आखिरी भेंट हो। राजकुमार पूर्वे ने नाश्ता का आग्रह किया लेकिन वे नहीं रूके। उसी साईकिल से अंधरी पहुंच गये। अभी पहुंचे ही थे कि बौकू महतो की पत्नी ने कहा-—कामरेड खेने त नय हेब ? चूड़ा ध’ दय छिये पइन में फूलय लेल!—भोगेन्द्र झा बोले- हाँ, भुखले छी।
पहले भोगेन्द्र झा अंधरी की तरफ जाते थे तो कैंप पर पुलिस पार्टी के लोग इज्जत में खड़े हो जाते थे, बात करते थे। उस दिन सब तैयारी कर रहे थे कोई उनसे बात नहीं कर रहा था। अंधरी गांव के पूरब एक तालाब था और उसके चारों ओर एक जगह थी। मालूम हुआ कि हंसेड़ी आ रहा है भोगेन्द्र झा की हत्या करने के लिए। इतने में हथियारबंद लोग आते हुए दिखे। तब तक भोगेन्द्र झा के कुछ कामरेड साथी कटैया गांव के श्रीमोहन झा, माझी साह पहुंचे। ये लोग भोगेन्द्र झा को पकड़कर पीछे करना चाहे। भोगेन्द्र झा से 20–25 गज सामने 100–150 लोग हथियारबंद गंड़ासे के साथ, सैनिकों और नागाओं का समूह और उनके साथ पूरा दामोदरपुर, 22 राइफलधारी, बाकी सभी भाला वगैरह से लैस हसेड़ी आगे की तरफ बढ़ रही थी।
20–30 गज पीछे गरीबों की बस्ती थी। भोगेन्द्र झा के साथ पीछे कुछ औरत–मर्द थे। रोकने वाले भी 2–4 ही थे, वहीं दूसरी तरफ हमलावर की हसेड़ी बढ़ते ही जा रही थी। हरिदेव ठाकुर, बगल के दामोदरपुर गांव के किसान थे, जिनकी जमीन पोखरौनी महंथ से लड़कर भोगेन्द्र झा के कारण ही हासिल हुई थी, ऐसे में वह एहसानमंद थे। हालांकि उनका भतीजा उसी में सिपाही था। उन्होंने भोगेन्द्र झा का पैर पकड़कर रोकने की कोशिश की और बोले कि पीछे हो जाइए अब बचना संभव नहीं है, ये लोग कब्ज़ा रोकने नहीं, आपकी हत्या करने आ रहे हैं। यह सुन भोगेन्द्र झा बोले-—मैं दूसरों को कहता हूं तैयार होने के लिए और मैं खुद हट जाऊं ?
यह कहते हुए उन्होंने पैर झाड़ दिया, छोड़िये पैर। हरिदेव ठाकुर के नाक में चोट लग गयी, खून गिरने लंगा। वह हाथ से नाक झांपे अपने गांव भाग गये, ताकि महंथ का आदमी खून बहते हुए नहीं देख लें और आक्रोशित होकर भोगेन्द्र झा पर हमला न कर दे। एक तरफ भोगी झा के नेतृत्व में अंधरी गांव का जनसमूह दूसरी तरफ महंथ के सिपाही, नागा बाबाओं का जत्था और दामोदरपुर गांव।
अंधरी तरफ से नारेबाजी शुरू हुई-
खटतै कोइ, खयतै कोइ, नै चलतै..... नै चलतै!
हर जोर–जुलुम के टक्कर में, संघर्ष हमारा नारा है!
अब सभे भूमि गोपाल के, तखन किए महंथान के!
आने–माने नै जानै छी, हम जोतइ छी, हक माँगै छी!
दुनिया के मजदूरों, एक हो, एक हो!
भोगेन्द्र झा वहीं धरने पर बैठ गये। इतने में महंथ के हमलावरों ने उन पर लाठी, फरसा, गंड़ासे से एक साथ हमला कर दिया।—लाठी सिर पर लगा, गंड़ासे को उन्होंने रोकने की कोशिश की। गंड़ासा उनके हाथ पर लगते हुए हाथ को दो भाग में चीर दिया। खून की धारा पानी की तरह बहने लगी। बाएं हाथ की दो अंगुली एक तरफ, तीन अंगुली एक तरफ लटक गई।
खून से सने हुए भोगेन्द्र झा बेसुध होकर गिर पड़े। गिरने के बाद भी हमलावरों का बड़ा गुट उन पर ताबड़तोड़ वार करता रहा। बाकी भोगेन्द्र झा के पीछे खड़े अंधरी के महिला पुरुषों पर हमला करने लगे। अंधरी वालों के पास अधिक लाठियां थी ऐसे में फरसा, गंड़ासे के सामने खून की धारा तेज हो गई। भोगेन्द्र झा जहां गिरे वहां खून से जमीन की मिट्टी लाल हो गई। फिर भी हमला जारी था। भोगेन्द्र झा को बचाने के लिए संत खतबे ने मोर्चा संभाला। भोगेन्द्र झा पर हो रहे हमले को अपने उपर लेते हुए आगे बढ़े लेकिन फरसे की वार से वह भी मरणासन्न हो गये। इधर भोगेन्द्र झा का सिर से लेकर पैर तक कोई हिस्सा नहीं बचा, जहां फरसा और लाठी से हमला नहीं हुआ। भोगेन्द्र झा होश कर उठने को कोशिश करते, खड़े होते लेकिन फिर लुढ़क जाते। जब एक बार अधिक समय तक जमीन पर पड़े रहे तो भीड़ से आवाज आई- मरि गेले भोगेन्द्र....
भोगेन्द्र झा को यह आवाज सुनाई दी। चैंक कर वह फिर से उठने की कोशिश करने लगे इतने में उनकी सांसें चलता देख फिर से हमला हुआ। पल्टू यादव, भोगेन्द्र झा को उठाने की कोशिश कर रहे थे। महंथ के तरफ से हुजूम में चुल्हाई झा नाम के एक व्यक्ति थे। जो भोगेन्द्र झा के रिश्ते में आते थे, वह यह कहते हुए भोगेन्द्र झा के तरफ बढ़े कि... हे–हे... जानसँ नै मारहक, छोड़ि दै जाहक! मरि जेतै.... मरि जेतै।
चुल्हाई झा को भोगेन्द्र झा की तरफ आता देख पल्टू यादव उन्हें दुश्मन मान उनके गर्दन पर फरसा से वार कर दिया। फरसा गर्दन पर नहीं लगके चुल्हाई झा के कंधे पर लगी। वो जमीन पर गिरे, खून का फव्वारा निकलने लगा, जिसे देख तेजू झा ने पल्टू यादव पर लकड़ी का चेरा फेंका। जब तक पल्टू यादव प्रतिकार करते तब तक नागा बाबा ने मौका देख उसके पेट में भाला घोंप दिया। पल्टू यादव की मौत मौके पर ही हो गई।
फिर भी खून खराबा मार काट जारी था। इसी बीच महंथ के हसेड़ी में से किसी ने भोगेन्द्र झा को मरा हुआ समझ उन पर गोइठा जलावन रख आग लगाने की बात कही। मार–काट मचाने के बाद महंथ के हमलावर लौटने लगे तो कुछ ही दूरी तय हुई होगी। भोगेन्द्र झा उठते, फिर गिरते। यह सिलसिला कुछ देर तक चला, जिसे दूर से देख महंथ के लोगों ने प्राण छूटने से पहले शरीर की क्रिया बताया और चलते चले गये। अंधरी के लोग भी उन्हें मृत समझ चुके थे। इधर गांव के लोग चुल्हाई झा को उठा ले गये। वहीं अंधरी के लोग पल्टू यादव व भोगेन्द्र झा को मरा हुआ समझ उठाने आये तो किसी ने देखा उनका शरीर हिल रहा था हल्ला हुआ- भोगी बाबू जिंदा हैं, सांस चल रही है, हिल रहे हैं। जिसके बाद खून से लथपथ भोगेन्द्र झा टांगकर बेनीपट्टी अस्पताल लाये गये। कई दिनों तक आंखें नहीं खुली। सिर के उपर सैकड़ों लाठियां, गंड़ासे लगे थे। सिर की हड्डी चकनाचूर हो गई थी।
इस घटना को याद करते हुए भोगेन्द्र झा ‘क्रांति योग’ में बताते हैं 4 तारीखकेँ हमला भेलै। संज्ञाशून्य भेला बाद हल्का होश सन बुझायल कि सुनलिए- मरि गेलौ, चलै चल! कि हमरा मोनमे आयल, अरे के मरि गेलै ?
से आँखि फुजल त’ देखलिऐ लोक गराँस, लाठी, भाला संग भागल जा रहल छै! त’ ई सभ कोना भ’ गेलै! हम त’ खून–खराबा नै चाहैत रही!
हम फेर उठक चेष्टा कयलौं, मुदा नै उठल भेल! लागल जे आब शरीर माटि संग बन्हा गेल अछि! माथ टिका क जमीन पर पड़ल रही। तैयो उठबाक प्रयास करिते रहलिऐ कि माथ पर तखने दू–तीन गंड़ास फेर लागल।
तैयो साहस कैलिऐ पर खूने–खून! फेर ओंघरा गेलिऐ! फेर त’ निष्प्राण सन! आ से बड़ी काल धरि!
फेर त’ जेना ओ सभ बुझि गेलै जे भोगी झा गेलौ, काल टरलौ। फेर जानि नै कोना, हमरा प्रज्ञा घुरल! हम उठी, खसी, ओंघरा जाइ—फेर।
एना होइत देखि, जे किछु लोक तखनो अंतिम खेल देख’ चाहै, कहब शुरू क’ देलकै, आब बाइ पर एना करै छौ, आब जएह घड़ी सएह घड़ी! आब एक पाँत गोरहा लेने आबै! सलाइ त’ अछिये, एखने खरड़ि दय छिये—
तखने एकटा बूढी माई राम चिचियाइत बजलीह- कते गेलय मरदवा सभ ? महंथकेँ आदमीसँ कामरेड के लाश फूंके लेल आबय हय।
कानमे ई आवाज गूंजल त’ बेसुध देहमे चेतना जागल, ककर लाश ? होशमे एबाक कोशिश केलहुँ।
कोशिश करैत–करैत, उठिक’ ठाढ़ भ’ गेलिऐ! आब त’ सभक अन्दर आदंक ध’ लेलकै! कियो कहै भूत, त’ कियो भगवान! फेर वएह सभ भगवान छौ, भोगी भगवान छौ, अनघोल करब शुरू क’ देलकै—आ फेर हमर भक् टूटल अस्पतालमे।
भोगेन्द्र झा का इलाज बेनीपट्टी अस्पताल में होना शुरू हुआ, उन्हें देख किसी को एहसास नहीं था कि यह अब बच पाएंग। आंखें बंद थी। इशारों में बातें कर रहे थे। घटना की जानकारी आम होते ही दूर–दूर से लोग इकट्ठा होने लगे। उनके गांव बरहा, नानी गांव जरैल तक खबर पहुंची। अगल बगल के गांवों के सैकड़ों लोग बेनीपट्टी में उमड़ पड़े। सभी के मन में आक्रोश था। सभी प्रतिकार में महंथ की हत्या करने व अंधरी दामोदरपुर गांव को फूंक देने की योजना बनाने लगे।
जब भोगेन्द्र झा होश में आये तो उन्हें पल्टू यादव व संत खतबे के मौत की खबर दी गई। साथ ही इस घटना के प्रतिकार में बन रही योजना के बारे में जानकारी मिली।
भोगेन्द्र झा बोले- अगर किसी ने गांव को फूंका या किसी की हत्या हुई तो मैं सिर पटक कर, जो–भी बचने की आशा है, मर जाऊंगा। भोगेन्द्र झा की जिद के आगे सभी चुप हो गये। बेनीपट्टी में भोगेन्द्र झा तीन दिनों तक रहे, लोगों का जमावड़ा लगता रहा। हर गांव चैक चैराहों पर इसी घटना की चर्चा। और चर्चा यह भी होनी शुरू हो गई थी कि अब महंथाना अधिक दिन नहीं चलने वाली है। इसी दौरान अस्पताल में दामोदरपुर के हरिदेव ठाकुर उनकी जिज्ञासा करने पहुंचते थे। उनके जरिए भोगेन्द्र झा महंथ के लिए खबर देते कि ‘अब भी महंथ से कहिए कि जो समझौते की बात पहले चल रही थी, उसको वह मान लें, तब मैं मुकदमा ही नहीं करूंगा’।
वहीं इस घटना को लेकर नालिसी 6 तारीख, यानी तीन दिन बाद हुई। भोगेन्द्र झा ‘क्रांति योग’ में बताते हैं, जब मेरी नालिसी हुई उस समय मैं लिखने लायक नहीं था। आखें देख नहीं सकती थीं, सूजन भी आ गया था और थोड़ा सा पस भी हो गया था। सोशलिस्ट नेता डॉ बैद्यनाथ झा मेरी मदद करने पहुंचे, उन्होंनें मेरा बयान लिखा और लिखने में अपने दो–तीन दुश्मनों का भी नाम घुसेड़ दिया। दस्तखत तो मेरा हो गया। उसमें जो नाम घुसेड़ दिया उसमें एक थे रामेश्वर जी। जिंदगी में उन्होंने कभी मेरा समर्थन नहीं किया। वह मेरे पास अस्पताल पहुंच गये और मेरे पास आकर बोले- भोगेन्द्र जी, आपने मुझको खून करने वालों में देखा है ? तब तो मैं आंख से देख नहीं सकता था, आवाज से पहचाना। मेरे मुंह से गलत नाम कहलाया जायेगा, यह उलझन मेरे दिमाग में थी। आदमी ये बड़े ### थे, मगर वह उसमें थे नहीं। इसलिए मैं चाहता था और स्वभाविक भी है कि झूठ नहीं कहना पड़े। नालिसी से किसी का नाम छांट दूंगा तो केस ही कमजोर हो जायेगा, यह उलझन थी।
इस बीच उन्हें इलाज के लिए बेनीपट्टी से मधुबनी अस्पताल भेजा गया, जहां कांग्रेस मिनिस्टरी बनने के बाद पंडित विनोदानंद झा, अब्दुल कयूम अंसारी, दोनों तत्कालीन मंत्री, उन्हें देखने आये। पंडित विनोदानंद झा बाद में बिहार के मुख्यमंत्री भी बनें। उन लोगों को डॉक्टरों ने बताया कि सिर में काफी चोट है, ठीक होगा भी नहीं इसकी कोई गारंटी नहीं है। ऐसे में तत्काल भोगेन्द्र झा को पटना में नामी सर्जन कर्नल भार्गव के यहां भेजा गया, जहां उनका इलाज शुरू हुआ।
इधर भोगेन्द्र झा अस्पताल में थे, उधर इस घटना के विरोध में अंधरी गांव में सभा की घोषणा उनके साथियों ने कर दी। सभा पर सरकारी रोक लगा दी गई। बावजूद सभा का आयोजन हुआ, जिसके कारण आदेश उल्लंघन के आरोप में श्रीमोहन झा, तेज नारायण झा, राजकुमार पूर्वे, माझी साह, गोकुलानंद चैधरी को गिरफ्तार कर पुलिस ने बेनीपट्टी थाना हाजत में बंद कर दिया। दूसरे दिन सभी को मधुबनी जेल भेज दिया। रास्ते में कई जगहों पर रोक कर लाल झंडों के साथ लोगों ने इन सभी को जेल जाने के क्रम में स्वागत किया। बरहा गांव के गोकुलानंद चैधरी बाद के वर्षों में रघेपुरा पंचायत के मुखिया व माझी साह मधवापुर प्रखंड के प्रमुख निर्वाचित हुए।
भोगेन्द्र झा ठीक होकर पटना से अगस्त 1947 से पहले लौटे। लेकिन कई सालों तक वह ठीक से बोल नहीं पाते थे। इशारों में ही बातें करते थे। बावजूद उनकी क्रांति मंद नहीं पड़ी थी। इस घटना के बाद ठीक होकर क्षेत्र में लौटे भोगेन्द्र झा के बारे में यह चर्चाएं आम थी कि उनके सिर में बंदर की हड्डी लगी हुई है। अक्सर भोगेन्द्र झा इस घटना को याद कर अपना सर दिखाते हुए कहते थे- ‘मेरे सिर पर हाथ रखने से धड़कन सुनाई देती है। धूप में जाने से मनाही है, सिर पर बर्फ बर्दाश्त कर सकता हूं लेकिन धूप नहीं’ जिसकी वजह से वह सोलर हैट पहना करते थे।
इस घटना ने उन्हें ‘भोगी भगवान’ के नाम से अलग पहचान दिया। ‘भोगी भगवान’ ना सिर्फ उनके चाहने वाले उन्हें कहा करते थे, बल्कि विरोधियों ने भी यह चलाया। जिसमें सबसे अधिक फैलाव बिहार के प्रधानमंत्री डॉ श्रीकृष्ण सिंह के एक कार्यक्रम से हुआ। दरअसल श्रीकृष्ण सिंह पंडौल आये हुए थे, जब व्यापक आंदोलन फैल गया था तो एक खत श्रीकृष्ण सिंह ने पंडित धनराज शर्मा के जरिए भोगेन्द्र झा को भेजा था कि भाई भोगेन्द्र... मैं आ रहा हूं, बात करूंगा, तब तक अपना हाथ पैर समेट कर रहिए।
इस बीच भोगेन्द्र झा गिरफ्तार कर लिये गये। बाद में श्रीकृष्ण सिंह पंडौल आये, वहां की रैली में भोगेन्द्र झा के स्वयंसेवक लाल पैंट, लाल शर्ट, लाल टोपी पहन गये थे, इन लोगों ने नारा लगाया- भोगेन्द्र झा को रिहा करो, जमींदारी मिटाओ, वीर भोगेन्द्र जिंदाबाद।
यह सुन श्रीकृष्ण सिंह ने डीएम से पूछा, तो डीएम ने बताया- हमनें गिरफ्तार कर लिया है।
तब श्रीकृष्ण सिंह ने सभा में मंच से कहा- भोगेन्द्र झा अपने आप को मार्क्सवाद का विद्वान कहते हैं, मगर ‘भोगी भगवान’ कहलाते हैं, अंधविश्वास फैलाते हैं।—उस रैली से ‘भोगी भगवान’ बात और फैल गयी। भोगेन्द्र झा के नेतृत्व में अंधरी गांव में हुए जमींदारी विरोधी आंदोलन का असर अभूतपूर्व हुआ, जो कि बाद के दशकों तक इसकी चिंगारी आग का रूप लेती रही। अंधरी से हुआ यह आंदोलन सलेमपुर, कटैया, धकजरी होते हुए कई गांवों तक पहुंची।
भोगेन्द्र झा की जिंदगी से जुड़े ये प्रसंग जितने रोचक हैं, उतने ही सवाल छोड़ जाते हैं। इन सवालों के जवाब बेनीपट्टी के उसी स्थानीय इतिहास में छिपे हैं, जिसे धीरे-धीरे आधुनिकता के इस युग में स्थानीय इतिहास के प्रति जिज्ञासा की कमी सहित अन्यन्य कारणों से हमारी स्मृति से दूर होता जा रहा है।
मैंने ‘बेनीपट्टी 0 KM’ पुस्तक में ऐसे ही अनेक प्रसंगों, घटनाओं, संघर्षों और बेनीपट्टी के सामाजिक-राजनीतिक इतिहास को दस्तावेज के रूप में संकलित करने का प्रयास किया है।
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