
डीएवी छात्रवृत्ति घोटाला: करोड़ों की हेराफेरी मामले में ED ने कोर्ट में दाखिल की चार्जशीट! ⚖️
🔥 गरीब छात्रों के हक पर डाका: 2.27 करोड़ रुपये के गबन मामले में ईडी की बड़ी कार्रवाई; कॉलेज के पूर्व कर्मचारी और अन्य जांच के दायरे में! 👇
देहरादून: राजधानी के प्रतिष्ठित डीएवी (पीजी) कॉलेज में हुए बहुचर्चित छात्रवृत्ति घोटाले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने शिकंजा कस दिया है। जांच एजेंसी ने स्पेशल पीएमएलए कोर्ट में अभियोजन शिकायत (चार्जशीट) दाखिल कर दी है, जिससे घोटाले से जुड़े कई चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं।
📋 घोटाले के मुख्य बिंदु:
क्या था मामला?: वर्ष 2009 से 2014 के बीच SC, ST और OBC छात्रों के लिए आई करीब 2.27 करोड़ रुपये की छात्रवृत्ति राशि का गबन किया गया।
कैसे हुआ खेल?: कॉलेज प्रबंधन द्वारा अधिकृत बैंक शाखा के बजाय जीएमएस रोड स्थित एक 'अनधिकृत खाते' का संचालन किया गया।
आरोपियों की कार्यप्रणाली: छात्रवृत्ति प्रभारी पीयूष चंद्र भटनागर पर आरोप है कि उसने खाते की प्रक्रिया में हेरफेर कर इसे अपने नियंत्रण में लिया।
42.50 लाख रुपये नकद निकाले गए।
66.50 लाख रुपये चेक के जरिए विभिन्न व्यक्तियों को ट्रांसफर किए गए।
99.43 लाख रुपये सीधे पीयूष भटनागर के व्यक्तिगत खातों में डाले गए।
दुरुपयोग: इस राशि को बीमा पॉलिसियों, नकद निकासी और निजी खर्चों में उड़ाया गया।
अन्य भूमिकाएं: कॉलेज खातों की अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता रंजना रावत की भूमिका भी संदेह के घेरे में है, जिन्होंने कथित तौर पर खाली चेकों पर हस्ताक्षर किए थे।
🏛️ ED की अब तक की कार्रवाई:
बीते 27 मई को ईडी ने आरोपी पीयूष भटनागर की 7.86 लाख रुपये की चल संपत्तियां (बैंक बैलेंस, बीमा पॉलिसियां और एक होंडा एक्टिवा वाहन) अस्थायी रूप से कुर्क की थीं।
अब साक्ष्यों और बयानों के आधार पर विशेष अदालत में चार्जशीट दाखिल कर दी गई है।
💡 गंभीर सवाल:
यह मामला सीधे तौर पर आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के उन छात्रों के भविष्य से जुड़ा है, जिन्हें अपनी पढ़ाई के लिए इस सहायता की सख्त आवश्यकता थी। इतने लंबे समय तक चली इस धांधली ने शिक्षण संस्थानों में वित्तीय निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
कानूनी कार्रवाई: अब मामले की सुनवाई कोर्ट की निगरानी में होगी, जिससे दोषियों तक कानून के हाथ पहुंचना तय माना जा रहा है।
💬 आपकी राय: क्या आपको लगता है कि शिक्षा के मंदिरों में इस तरह की धांधली रोकने के लिए ऑडिट प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी बनाने की आवश्यकता है?
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