मंगल ग्रह तक पहुँचने की रेस शुरू हो चुकी है। लेकिन अगर एक ही मंज़िल तक अलग-अलग रफ्तार से जाया जाए, तो सफर कितना बदल जाता है, इसका अंदाज़ा शायद आपने कभी नहीं लगाया होगा।
सबसे पहले बात करते हैं प्रकाश की। अगर किसी तरह प्रकाश की गति से मंगल की ओर जाया जा सके, तो पृथ्वी और मंगल की उस समय की दूरी के अनुसार वहाँ पहुँचने में सिर्फ़ 3 से 22 मिनट लगेंगे। लेकिन इंसानों के लिए यह फिलहाल असंभव है, क्योंकि कोई भी अंतरिक्ष यान प्रकाश की गति के करीब भी नहीं पहुँच सकता।
अब आते हैं असली अंतरिक्ष यात्रा पर। आज के आधुनिक रॉकेट, जैसे मंगल मिशनों में इस्तेमाल होने वाले अंतरिक्ष यान, आमतौर पर 6 से 9 महीने में मंगल तक पहुँचते हैं। यही वजह है कि हर मंगल मिशन की महीनों पहले से तैयारी करनी पड़ती है।
अब ज़रा सोचए... अगर वही सफर किसी हवाई जहाज़ से करना पड़े। क्योंकि उसकी गति रॉकेट से बहुत कम होती है, इसलिए मंगल तक पहुँचने में लगभग 20 से 30 साल लग सकते हैं।
अगर कोई 100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से कार चलाकर निकल जाए, तो यह सफर और भी हैरान कर देगा। मंगल तक पहुँचने में करीब 200 से 300 साल लग सकते हैं। यानी कई पीढ़ियाँ गुजर जाएँगी, लेकिन मंज़िल शायद तब भी दूर होगी।
और अगर कोई पैदल ही मंगल की ओर चल पड़े... तो यह यात्रा लगभग 4,000 से 6,000 साल तक खिंच सकती है।
हालाँकि, ये सभी आँकड़े अनुमानित हैं। क्योंकि पृथ्वी और मंगल के बीच की दूरी हमेशा एक जैसी नहीं रहती। दोनों ग्रह लगातार सूर्य की परिक्रमा करते रहते हैं, इसलिए मिशन का समय, चुना गया मार्ग और रॉकेट की तकनीक यात्रा की अवधि को बदल सकते हैं।
यानी अंतरिक्ष में सिर्फ़ दूरी ही नहीं, रफ्तार भी किस्मत बदल देती है।
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