
SIR का सबसे खूबसूरत पार्ट ही बदसूरत हो गया! 😐
मतदाता सूची के शुद्धिकरण की प्रक्रिया का मकसद अगर फर्जी नाम हटाना और सही मतदाताओं का सत्यापन करना है, तो शिकायतों की प्रारंभिक जांच-पड़ताल भी उतनी ही जरूरी है।
हरिद्वार की मंगलौर विधानसभा सीट से कांग्रेस विधायक काजी निजामुद्दीन को मिले एक नोटिस ने पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए। आपत्ति में विधायक और उनके पिता की उम्र के बीच महज 15 साल का अंतर बताया गया। जबकि उपलब्ध जानकारी के अनुसार काजी निजामुद्दीन का जन्म 1974 में हुआ और उनके पिता मोहम्मद मोइउद्दीन उसी वर्ष विधायक बने थे।
सवाल सीधा है क्या 1974 में 15 साल की उम्र में विधानसभा चुनाव लड़ना संभव था?
अगर नहीं, तो फिर ऐसी आपत्ति किस आधार पर दर्ज हुई और बिना पर्याप्त परीक्षण के नोटिस कैसे जारी हो गया?
कहा जा रहा है कि उत्तराखंड में बड़ी संख्या में लोग ऐसे नोटिस लेकर अपने अस्तित्व और मतदाता होने का प्रमाण देने के लिए परेशान हो रहे हैं। अगर शिकायतें व्यक्तिगत रंजिश या राजनीतिक द्वेष में की जा रही हैं और उनका प्राथमिक स्तर पर परीक्षण किए बिना नोटिस जारी हो रहे हैं, तो यह पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल है।
SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध करना है, लोगों को अनावश्यक रूप से परेशान करना नहीं।
चुनाव आयोग को ऐसी शिकायतों के निस्तारण की प्रक्रिया की पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
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