
एक तरफ सोने और हीरों का ढेर है, और दूसरी तरफ एक लहलहाता हुआ हरा-भरा पेड़। दुनिया जिसे 'दौलत' कहती है, वह उस सूखे बंजर ज़मीन पर पड़ी चमकती चीज़ें हैं। लेकिन हमारी नज़र में 'असली धन' वह पेड़ है, जिसकी जड़ों में हमारी संस्कृति और जिसकी टहनियों में हमारा भविष्य सुरक्षित है।
प्रकृति ही हमारी पूँजी है
आदिवासियत का मतलब ही है प्रकृति के साथ एकाकार होकर जीना। हमारे लिए पेड़ सिर्फ लकड़ी का ढांचा नहीं हैं; वे हमारे 'देव' हैं, हमारे रक्षक हैं, हमारे विरासत है। आज की दुनिया विकास की अंधी दौड़ में कंक्रीट के जंगल बना रही है, जहाँ ताजी हवा और सुकून की छाया के लिए भी तरसना पड़ता है। वे भूल गए हैं कि तिजोरी में रखे सोने से फेफड़ों को ऑक्सीजन नहीं मिलती और न ही जलते हुए सूरज की तपिश में हीरे छाया दे सकते हैं।
"जब आखिरी पेड़ काट दिया जाएगा, आखिरी नदी ज़हरीली हो जाएगी और आखिरी मछली पकड़ ली जाएगी, तब इंसान को समझ आएगा कि वह पैसों को खा नहीं सकता।"
इस वर्ष का संदेश: प्रकृति से प्रेरणा और हमारा भविष्य
इस साल का विश्व पर्यावरण दिवस हमारे लिए और भी खास और प्रासंगिक हो जाता है, क्योंकि इस वर्ष की थीम है:
“Inspired by Nature. For Climate. For Our Future” (प्रकृति से प्रेरित। जलवायु के लिए। हमारे भविष्य के लिए।) इसके साथ ही दुनिया भर में #NowForClimate का नारा गूँज रहा है।
जब मैं इस थीम को देखता हूँ, तो मुझे लगता है कि पूरी दुनिया आज उसी बात को दोहरा रही है जिसे आदिवासियत ने हमेशा से अपना मूलमंत्र माना है।
• प्रकृति से प्रेरणा (Inspired by Nature): आदिवासियों ने हमेशा प्रकृति को अपना गुरु माना है। हम जानते हैं कि जलवायु संकट का समाधान वातानुकूलित (AC) कमरों की बहसों में नहीं, बल्कि प्रकृति के पास ही है। जंगल कार्बन सोखते हैं, नदियाँ जीवन देती हैं और पहाड़ मौसम को संतुलित रखते हैं।
• जलवायु और भविष्य के लिए: आज जब वैश्विक तापमान बढ़ रहा है और भीषण गर्मी से इंसानी जीवन बेहाल है, तब यह थीम हमें चेतावनी देती है कि अब हमारे पास रुकने का समय नहीं है। यदि हमें अपना भविष्य सुरक्षित करना है, तो हमें अपनी जीवनशैली को बदलना होगा।
जल, जंगल और ज़मीन का रिश्ता
हम आदिवासियों का नाता ज़मीन से सिर्फ मालिकाना हक का नहीं, बल्कि श्रद्धा का है। हम जानते हैं कि अगर जंगल है, तो हम हैं। पेड़ हमें ऑक्सीजन देते हैं, फल देते हैं, दवाइयां देते हैं और सबसे बढ़कर जीने का आधार देते हैं।
आदिवासियत: वैश्विक संकट का एकमात्र समाधान
आज जब पूरी दुनिया 'क्लाइमेट चेंज' और 'ग्लोबल वार्मिंग' से त्रस्त है, तब मेरी संस्कृति का महत्व और बढ़ जाता है। हमने कभी ज़रूरत से ज़्यादा प्रकृति से नहीं लिया। हमने पेड़ को काटना नहीं, उसे पूजना सीखा है।
मेरे लिए हीरा या सोना महज़ पत्थर हैं। अगर कल को अकाल पड़े या प्यास लगे, तो ये धातुएं किसी काम की नहीं। असली जीवन तो उस हरियाली में है जो बारिश लाती है, जो पंछियों को घर देती है और हमें शुद्ध हवा। इस पर्यावरण दिवस का महत्व यही याद दिलाने में है कि हम प्रकृति के मालिक नहीं, बल्कि उसके बच्चे हैं।
यह लेख लिखते हुए मेरा मन भावुक है। मैं बस यही कहना चाहता हूँ कि आइए, हम अपनी जड़ों की ओर लौटें। प्रगति ज़रूरी है, लेकिन ऐसी प्रगति किस काम की जो हमें हमारी जीवनदायिनी प्रकृति से ही दूर कर दे?
हमें अपनी 'आदिवासियत' की इस सोच को पूरी दुनिया में फैलाना है, क्योंकि हम ही इस धरती के असली पहरेदार हैं। सोना-चांदी तो हाथों का मैल है, असली विरासत तो वे पेड़ हैं जो हम अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए छोड़कर जाएंगे।
पेड़ लगाइए, जीवन बचाइए। क्योंकि प्रकृति है, तो ही हम हैं।
#NowForClimate #WorldEnvironmentDay
रबिन्द्र गिलुवा
सचिव
आदिवासी युवा मित्र मण्डल, चक्रधरपुर
Kanke, Ranchi | Jun 4, 2026