
कागजों में पसीना बहाया, जमीन पर घास उगाई!
मनरेगा के 6 काम, 25 मस्टररोल और 228 मजदूरों की हाजिरी—जीपीएस लोकेशन पर पहुंची टीम तो चकमार्ग पर मिला घुटनों तक घास का बिछौना!
माधौगढ़ (जालौन)
फावड़े चले नहीं, मजदूर दिखे नहीं… फिर भी मस्टररोल दौड़ पड़ा! मनरेगा में गांवों के विकास और गरीब मजदूरों को रोजगार देने के सरकारी दावों के बीच ग्राम पंचायत अकबरपुरा से सामने आई ग्राउंड रिपोर्ट ने व्यवस्था पर तीखे सवाल खड़े कर दिए हैं।
ऑनलाइन पोर्टल पर आंकड़े देखिए तो लगता है मानो गांव में विकास की आंधी चल रही हो—6 काम, 25 मस्टररोल और 228 मजदूर!
लेकिन जब जीपीएस लोकेशन के सहारे धरातल पर पहुंचकर तस्वीर देखने की कोशिश की गई तो न मजदूर नजर आए, न फावड़े और न ही काम की वैसी तस्वीर दिखाई दी, जैसी कागजों में दर्ज हाजिरी से उम्मीद होती है।
मौके पर नजर आई तो लहलहाती घास और चकमार्ग पर पसरा सन्नाटा!
228 मजदूरों ने काम किया तो घास इतनी बेखौफ कैसे?
टीम राजू के खेत से गंधा की ओर जाने वाले चकमार्ग की जीपीएस लोकेशन पर पहुंची। सवाल सीधा था—अगर यहां मनरेगा के तहत बड़ी संख्या में मजदूरों ने काम किया है तो कार्य का असर जमीन पर कहां है?
मौके पर दिखाई दे रही घास ने पूरी कहानी पर सवालिया निशान खड़ा कर दिया।
आखिर 228 मजदूरों की मेहनत के बाद भी चकमार्ग पर घास इतनी बेखौफ कैसे खड़ी रही?
अगर मजदूरों ने फावड़े चलाए थे तो मिट्टी कहां दिखाई दी?
अगर सफाई हुई थी तो झाड़ियां किसने बचाईं?
अगर मस्टररोल में हाजिरी लगी तो मौके पर मजदूर कहां गए?
क्या कागजों में ही चल रहा विकास का फावड़ा?
सरकार डिजिटल व्यवस्था, जियो-टैगिंग और ऑनलाइन मॉनिटरिंग के जरिए मनरेगा में पारदर्शिता का दावा करती है।
लेकिन अकबरपुरा के इस मामले में रिकॉर्ड और धरातल के बीच कथित अंतर ने निगरानी व्यवस्था पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं।
यहां सवाल सिर्फ 228 मजदूरों का नहीं है। सवाल यह है कि—
मस्टररोल किस आधार पर भरा गया?
हाजिरी का सत्यापन किसने किया?
जियो-टैग फोटो किस स्थिति में अपलोड हुई?
काम की माप किस आधार पर दर्ज हुई?
और भुगतान हुआ तो किस सत्यापन के बाद?
कच्चे काम की हालत ने पक्के कामों पर भी डाल दी नजर!
चकमार्ग पर सामने आई स्थिति के बाद ग्राम पंचायत में कराए गए अन्य विकास कार्य भी चर्चा में आ गए हैं।
यदि कच्चे कार्यों की स्थिति पर सवाल उठ रहे हैं तो ग्रामीण यह जानना चाहते हैं कि इंटरलॉकिंग और अन्य कार्यों की गुणवत्ता की जांच आखिर किस तरह हुई?
कहीं ऐसा तो नहीं कि कागजों पर विकास की रफ्तार दौड़ रही हो और जमीन पर घास सरकारी योजनाओं का मजाक उड़ा रही हो?
ग्रामीण बोले—साहेब, एक बार कागज छोड़कर जमीन भी देखिए!
ग्रामीणों की मांग है कि अधिकारी वातानुकूलित कमरों में बैठकर फाइलों की जांच करने के बजाय सीधे मौके पर पहुंचें। मस्टररोल में दर्ज मजदूरों, ऑनलाइन हाजिरी, जियो-टैग फोटो, माप पुस्तिका और भुगतान रिकॉर्ड का आपस में मिलान कराया जाए।
क्योंकि—
कागजों में मजदूरों की कतार लगी,
मौके पर घास की सरकार मिली।
फावड़ा चला या कलम का खेल हुआ,
अब जांच में ही असली मेल हुआ!
अब देखना यह है—जांच होगी या फाइल फिर अलमारी में सोएगी?
अकबरपुरा का मामला अब सिर्फ एक चकमार्ग तक सीमित नहीं रह गया है। अगर रिकॉर्ड और मौके की स्थिति में वास्तव में अंतर मिलता है तो जिम्मेदारी तय करने और सरकारी धन की जांच की जरूरत होगी।
वहीं यदि सभी रिकॉर्ड सही पाए जाते हैं तो विभागीय सत्यापन से स्थिति साफ हो जाएगी।
228 मजदूरों की हाजिरी और जमीन पर घास—इन दोनों तस्वीरों के बीच की दूरी आखिर कितनी है?
अब निगाहें जिला प्रशासन और संबंधित विभाग की जांच पर हैं।
कागजों में पसीना बहाने वालों की कलम चलेगी या मौके पर जिम्मेदारों का फावड़ा?
अकबरपुरा की घास अब सिर्फ घास नहीं, मनरेगा के दावों का सबसे बड़ा सवाल बन चुकी है!
नोट: खबर में उठाए गए सवाल उपलब्ध रिकॉर्ड/ग्राउंड विजुअल के आधार पर हैं।
कथित अनियमितता की अंतिम पुष्टि सक्षम विभागीय जांच के बाद ही होगी। संबंधित अधिकारियों/ग्राम पंचायत का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रकाशित किया जाना चाहिए।
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Kalpi, Jalaun | Sep 24, 2026