
प्रतापगढ़ के लालगंज तहसील के भटनी में जन्में पूरे विश्व में धर्म और गो संरक्षण की अलख जगाने वाले प्रातः स्मरणीय पूज्य स्वामी करपात्री जी के बारे में.... लोग विश्वास नहीं करेंगे कि इस भौतिक युग में कुछ दशकों पहले वह एक ऐसे संत थे जो समस्त शास्त्रो के सशरीर थे अर्थात विद्वता इतनी थी लगता था शास्त्र ही शरीर धारण करके सामने है । संतों की श्रेणी में अग्रणीय, जीवन भर त्याग का, धर्म का पालन । भोजन के लिए एक हाथ को ही अपना पात्र बना कर ग्रहण किया। जितना आ गया उतने में काम चलाया। उनके इस स्वभाव के कारण उनका नाम पड़ा श्री करपात्री जी महाराज।स्वामी करपात्री जी महाराज का संन्यासी नाम स्वामी हरिहरानन्द सरस्वती था जो ग्रहण करते वक्त उनके गुरु अनंत श्री विभूषित स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाराज ने दिया था, परन्तु एक हाथ को अपना पात्र बनाकर उसी में भोजन ग्रहण करने की प्रवृत्ति के कारण वो श्री करपात्री जी महाराज के नाम से सम्पूर्ण विश्व में प्रसिद्ध हुए। वो त्याग की प्रतिमूर्ति थे जिन्होंने शंकराचार्य जैसा गौरवमयी पद स्वीकार नहीं किया, जीवन भर भिक्षा से काम चलाया। दो दो शंकराचार्य उनके शिष्य रहे, परन्तु कभी भी शंकराचार्य की उपाधि ग्रहण नहीं की। वर्तमान में पुरी पीठ के शंकराचार्य स्वामी श्री निश्चलानंद सरस्वती, ज्योर्तिमठ के पूर्व शंकराचार्य भी स्वरूपानंद सरस्वती उनके शिष्य हैं। जीवनभर शास्त्रों का अध्ययन, शास्त्रो के अनुरूप कार्य और व्यवहार। गौसेवा और गौ संरक्षण के लिए इंदिरा गांधी और सत्ता से लङने वाले पहले संत। ऐसे संत जिनका गांधी परिवार को दिया हुआ श्राप पीढ़ियों तक लगा । श्री पुज्य करपात्री जी महाराज ज्ञान के अथाह सागर थे, उनके प्रवचनों में शास्त्रार्थ होते थे। भारतीय ज्ञान परम्परा के सबसे बड़े प्रचारक । श्री करपात्री जी महाराज का चित्रकूट से घनिष्ठ संबंध था। चित्रकूट तप और त्याग की भूमि है। स्वामी करपात्री जी महाराज ने अपने कई चातुर्मास चित्रकूट की भूमि में बिताए। वे रामचरित मानस को इस युग की सर्वश्रेष्ठ रचना मानते थे।भारतीय संस्कृति वेद वेदांत और दर्शन के सर्वश्रेष्ठ प्रचारक । उनके प्रवचनों में ढेर सारी मीमांसा, ग्रन्थ, दर्शन, साहित्य, पुराण सब सम्मिलित थे। वो समस्त हिन्दूओ के आदर्श थे सच्चे भारत रत्न। लेकिन दुर्भाग्य देखिए कारसेवकों पर गोली चलवाने वाले को पद्म विभूषण मिलता है परन्तु राष्ट्र और धर्म के लिए अपना जीवन लगाने वाले संन्यासी को उपेक्षा और तिरस्कृत किया जाता है, किस मुंह से हम खुद को हिन्दू बोलते हैं जब बीसवीं सदी के धर्मसम्राट स्वामी श्री करपात्री जी महाराज के बारे में हम न जानते हैं और न अपने बच्चों को बता पाते हैं।