
अस्पताल पर फर्जीवाड़े का आरोप | SA News Chhattisgarh
दिल्ली | 22-06-2026: दिल्ली के रहने वाले दंपत्ति राहुल राठौर और उनकी पत्नी मीनू राठौर ने संतान सुख के लिए आईवीएफ (IVF) तकनीक का सहारा लिया था। उन्होंने मैक्स हॉस्पिटल द्वारका की डॉक्टर से परामर्श लिया, जिसके बाद उन्हें ग्रेटर कैलाश स्थित एससीआई (SCI) आईवीएफ हॉस्पिटल रेफर किया गया। यहाँ मई 2025 में भ्रूण प्रत्यारोपण (Embryo Implantation) की प्रक्रिया पूरी की गई। इसके बाद 5 जनवरी 2026 को मीनू राठौर ने जुड़वां बच्चों को जन्म दिया।
नवजात बच्चों के शारीरिक रूप-रंग को देखकर माता-पिता को कुछ संदेह हुआ, जिसके बाद उन्होंने DNA जांच करवाई। 14 जनवरी 2026 को आई रिपोर्ट में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ कि दोनों बच्चों का डीएनए न तो माँ से और न ही पिता से मेल खाता है।
पीड़ित दंपत्ति का आरोप है कि इलाज या डिलीवरी के दौरान उनके असली बच्चे बदल दिए गए हैं। दूसरी ओर, अस्पताल प्रबंधन ने अपने बचाव में यह दलील दी कि दंपत्ति ने खुद 'डबल डोनर' (अंडाणु और वीर्य दोनों बाहर से लेने) का विकल्प चुना था। दंपत्ति ने अस्पताल के इस दावे को सिरे से खारिज करते हुए आरोप लगाया है कि अस्पताल ने उनके फर्जी हस्ताक्षर करके जाली सहमति पत्र तैयार किए हैं। कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद 31 मार्च 2026 को मामले की FIR दर्ज हो सकी थी। बीच में जांच पर रोक भी लगी, लेकिन 5 जून 2026 को कोर्ट ने दोबारा जांच शुरू करने का आदेश दिया।
मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने इसमें चाइल्ड ट्रैफिकिंग की आशंका जताते हुए ART विभाग को सख्त जांच के निर्देश दिए हैं। पुलिस द्वारा बच्चों का Sibship Test कराने के लिए AIIMS में सैंपल भेजे गए हैं ताकि यह पुष्टि हो सके कि दोनों बच्चे आपस में सगे भाई-बहन हैं या नहीं, जिसकी रिपोर्ट आना अभी बाकी है।
पीड़ित माता-पिता पिछले 6 महीनों से न्याय के लिए दफ्तरों और अदालतों के चक्कर काट रहे हैं और गहरे मानसिक तनाव से गुजर रहे हैं। वे प्रशासन से केवल एक निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं ताकि उनके अपने बच्चे उन्हें वापस मिल सकें।
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